किसानों की किस्मत गढ़ रहा दिव्यायन

2019-01-02

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-दयानंद राय

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कभी छह हजार रुपये प्रतिमाह कमाने वाला फलींद्र महतो आज 45,000 रुपये प्रतिमाह से अधिक कमा रहा है। वहीं रामगढ़ का तपेंद्र महतो हर महीने अपने पिग फार्म से दस से बारह हजार रुपये प्रतिमाह से अधिक कमा लेता है। अपने काम और दिव्यायन के सहयोग से किस्मत बदलने की ऐसी कहानियां रोज रची जा रही हैं। कृषि में नयी तकनीक का उपयोग और गांव के बेरोजगार युवकों को कौशल विकास की शिक्षा देकर दिव्यायन अपने नाम को सार्थक कर रहा है। दिव्यायन में कृषि के नवोन्मेष की कहानी बताते हुए संस्थान के सचिव स्वामी भावेशानंद कहते हैं कि हमलोग चार शून्य के सिद्धांत पर काम कर रहे हैं। इसमें पहला है- खेती में रासायनिक 
खाद और कीटनाशकों का शून्य इस्तेमाल। इनकी जगह जैविक खाद का उपयोग करने के लिए हम किसानों को प्रोत्साहित कर रहे हैं। इस पूरी कवायद के पीछे वजह यह है- रसायनिक खाद भूमि की उपजाऊ क्षमता पर बुरा असर तो डालती ही है, इससे कृषि कार्य की लागत भी बढ़ जाती है। साथ ही पर्यावरण पर भी रासायनिक खाद के उपयोग का दुष्प्रभाव पड़ता है। ये कृषि के सतत् माध्यम भी नहीं हैं। इसलिए हम संस्थान के खेतों में और किसानों को भी आर्गेनिक फार्मिंग के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं।
अनगड़ा प्रखंड के तिरिलकोचा और बूढ़ाकोचा में दो आर्गेनिक विलेज बनाए गए हैं और वहां आॅर्गेनिक खेती हो रही है। इसके अलावा गेतलसूद के दस गांवों में भी ऑर्गेनिक और पर्यावरण अनुकूल खेती करने के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसके अलावा किसानों को पॉल्ट्री, डेयरी, मछली पालन और कृषि बागवानी करना भी बताया जा रहा है। इनसे किसानों की आमदनी बढ़ रही है। संस्थान से जुड़कर जो मधुमक्खी पालन का काम कर रहे हैं, उनके लिए विवेकानंद हनी प्रोड्यूसर्स सेल्फ सपोर्ट को- ऑपरेटिव सोसायटी बनाई गई है। इसका मकसद गांव के लोगों को आत्मनिर्भर बनाना है। कृषि में एक और पहल हमारे संस्थान की ओर से की गई है और उसका नतीजा बहुत अच्छा निकला है। प्रोटेक्शन ऑफ प्लांट वेरायटीज एंड फार्मर्स राइट एक्ट के तहत झारखंड में पाए जानेवाले परंपरागत बीजों का संरक्षण किया जा रहा है। बीज-संरक्षण के अभाव में परंपरागत बीजों का लोप होता जा रहा है। इनमें धान, गेहूं, रागी और सब्जियों के बीज शामिल हैं। ऐसे बीजों की 21 वेरायटीज संरक्षित की गई है और ये इनका संरक्षण करनेवाले किसानों के नाम पर रजिस्टर्ड हो गई है।
सौर उर्जा को दे रहे प्रोत्साहन
दूसरे शून्य का सिद्धांत बताते हुए स्वामी भावेशानंद थोड़े मुस्कुराते हैं और कहते हैं कि भगवान सूर्य हमें इतनी बड़ी मात्रा में सौर ऊर्जा देते हैं, लेकिन उसका उचित उपयोग नहीं हो पाता। इसलिए दूसरे शून्य में हम ऊर्जा के परंपरागत साधनों का उपयोग न करके बायोगैस और सोलर लाइट का उपयोग करने को प्रोत्साहित कर रहे हैं। यह ग्रीन एनर्जी है और भविष्य की एनर्जी है। इस उर्जा का उत्पादन करने में प्रदूषण भी कम होता है और ग्रामीणों के लिए यह ज्यादा बेहतर है। तीसरा सिद्धांत भूजल का उपयोग शून्य करना है। हम वर्षा जल को संरक्षित करने का काम करते हैं और रिचार्ज पिट बनाकर इसे अंजाम दिया जाता है। चौथे सिद्धांत में हम अवांछित काम, जैसे- गोबर उठाना और ऐसे ही अन्य कार्यों में मानव उपयोग भी शून्य कर रहे हैं। ऐसे कार्यों को मैकेनाइज्ड किया जा रहा है। 
अभिरुचि के अनुसार देते हैं प्रशिक्षण
स्वामी भावेशानंद कहते हैं कि हमें गांव के युवाओं को स्वावलंबी बनाना है और उन्हें ऐसी शिक्षा देनी है जिससे वह गांव में रहकर अपनी जरुरतें पूरी कर सकें। दिव्यायन में हम ग्रामीण युवाओं को प्रशिक्षण देने से पहले उनकी अभिरुचि जानते हैं। इसके बाद उन्हें डेढ़ से छह महीने तक की स्पेशलाइज्ड ट्रेनिंग देते हैं। इनके लिए बढ़ईगीरी, मोटर मैकेनिक और पंप रिपेयरिंग के अलावा मधुमक्खी पालन की ट्रेनिंग की व्यवस्था है। प्रशिक्षण पूरा कर लेने के बाद यह सभी अपने गांव जाते हैं और आठ से दस के समूह में मिलकर विवेकानंद सेवा संघ का गठन कर लेते हैं। ऐसे 117 विवेकानंद सेवा संघ रांची, खूंटी और रामगढ़ में संचालित हैं। इन युवाओं को प्रशिक्षित करने के लिए मिनिस्ट्री आॅफ ट्राइबल वेलफेयर से प्रति प्रशिक्षु एक हजार रुपये अनुदान के रूप में प्रतिमाह मिलते हैं। इन युवाओं को सहयोग देने के लिए संबंधित गांवों में दो फील्ड असिस्टेंट भी रहते हैं।
1977 में रखी गयी थी दिव्यायन की नींव
श्री भावेशानन्द ने बताया कि वर्ष 1977 में आइसीएआर के कृषि विज्ञान केंद्र के रूप में दिव्यायन की नींव रखी गई थी। यह रांची में आइसीएआर का नाॅलेज और रिसोर्स सेंटर था। 2006 में यहां रामकृष्ण मिशन विवेकानंद यूनिवर्सिटी की स्थापना की गई। यहां कृषि ग्रामोन्यन और आदिवासी विकास में पंचवर्षीय इंटीग्रेटेड एमएससी कोर्स कराया जाता है। इसके अलावा यहां कृषि और ग्रामीण विकास में एक वर्षीय डिप्लोमा कोर्स भी कराया जाता है। दिव्यायन झारखंड में पशुओं के नस्ल सुधार की दिशा में भी काम कर रहा है। गांवों में गायों के नस्ल सुधार के लिए हर गांव में दो अच्छी नस्ल के बैल दिए जा रहे हैं। इसके अलावा गांव में ही किसान से बीज उत्पादन का कार्य करवाया जा रहा है। इससे उन्नत और सर्टिफाइड बीज एक किसान से दूसरे किसान तक पहुंच रहा है। 
महाजनी सिस्टम खत्म करा दिया
स्वामी भावेशानंद ने बताया कि दिव्यायन की ओर से झारखंड के 400 गांवों में स्वयं सहायता समूहों का गठन किया गया है। ये स्वयं सहायता समूह जरूरतमंदों को 40,000 से लेकर चार से पांच लाख तक का लोन बिजनेस के लिए देते हैं। इनके द्वारा दिये गये लोन का रिपेमेंट बहुत अच्छा है। इससे गांवों में महाजनी व्यवस्था खत्म हो गई है। संस्थान द्वारा दिए गए प्रशिक्षण और आॅर्गेनिक फार्मिंग से हम गांव के युवाओं को आत्मनिर्भर बना रहे हैं।
किसानों को पसंद आ रहा डबल स्टोरी स्ट्रक्चरश्री भावेशानन्द ने बताया कि गांव के किसानों को पहले जगह की समस्या के कारण मुर्गी और बत्तख पालन में दिक्कत आती थी। घर में बत्तख और मुर्गी रखने पर वे घर को गंदा भी कर देते हैं। इस समस्या के समाधान के लिए दिव्यायन द्वारा अनगड़ा में डबल स्टोरी स्ट्रक्चर बनाकर दिया गया है। इससे एक तो कम जगह में बत्तख और मुर्गीपालन हो रहा है। वहीं एग कलेक्शन भी बेहतर हो गया है। किसानों को भी यह स्ट्रक्चर बेहद पसंद आ रहा है। ग्रामीण युवाओं को शिक्षा प्रदान करने की दिशा में भी दिव्यायन महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। संस्थान शिक्षित युवाओं को विद्यालयी शिक्षा देकर राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय से जोड़ देता है। वर्ष 2015 के अक्टूबर में संस्थान के 27 विद्यार्थियों ने दसवीं की परीक्षा दी वहीं सात ने 12वीं की परीक्षा दी। संस्थान में विकास के लिए मल्टी स्किल डेवलपमेंट और ट्रेनिंग प्रोग्राम चलाया जाता है। यहां रामायण और महाभारत के अलावा युवाओं को नैतिक शिक्षा भी दी जाती है। रोजाना संस्थान के प्रांगण में बने मंदिर में प्रार्थना होती है। संस्थान में प्रशिक्षण ले रहे युवाओं को अधिक से अधिक जानकारी हासिल हो इसके लिए यहां एक लाइब्रेरी भी है जो सुबह साढ़े आठ से साढ़े ग्यारह बजे तक और शाम में साढ़े तीन बजे से साढ़े छह बजे तक खुली रहती है। यहां हर तरह की किताबें उपलब्ध है और कंपीटिशन से लेकर अन्य विषयों की मैग्जीन और पत्रिकाओं के अलावा न्यूजपेपर भी उपलब्ध हैं।
1921 में अस्तित्व में आया रामकृष्ण मिशन आश्रम, मोरहाबादी
मोरहाबादी स्थित रामकृष्ण मिशन आश्रम स्वामी विवेकानंद का सपना था। रांची में इस आश्रम की स्थापना 1927 में स्वामी विशुद्धानंद जी ने की थी। स्वामी विवेकानंद का सपना था कि छोटानागपुर में हजारीबाग के आसपास एक टेक्निकल स्कूल खोला जाए जहां युवा खाद्य उत्पादन के नए तरीके इजाद कर सकें। स्वामी विवेकानंद की इसी इच्छा की पूर्ति के लिए रांची में एक बड़ा प्लाॅट लिया गया और आश्रम की स्थापना की गई।