आकाश से गिरती आफत

2019-01-02

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-प्रमोद जायसवाल

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आईएमडी के अनुसार, बिजली का गिरना या आघात एक बड़ा विद्युतीय प्रवाह है जो तूफान के दौरान हवा की गति के बढ़ने और कम होने के कारण उत्पन्न होता है। इस दौरान, पृथ्वी की बाहरी परत पर सकारात्मक चार्ज होता है क्योंकि विपरीत चार्ज आकर्षित करता है, आंधी के बादलों में मौजूद नकारात्मक चार्ज पृथ्वी की बाहरी परत पर मौजूद सकारात्मक चार्ज से जुड़ना चाहता है। बादल के निचले हिस्से में हवा के दबाव को दूर करने के लिए जब यह बहुत ज्यादा चार्ज हो जाता है तो चार्ज का बहाव पृथ्वी की ओर तेजी से भागता है। इसे “स्टैप्ड लीडर” कहते हैं। पृथ्वी का सकारात्मक चार्ज इस “स्टैप्ड लीडर” की तरफ आकर्षित होता है, और सकारात्मक चार्ज हवा की ओर रुख कर लेता है। जब “स्टैप्ड लीडर” और पृथ्वी से आया सकारात्मक चार्ज आपस में मिलते हैं, एक मजबूत विद्युतीय प्रवाह बादल में सकारात्मक चार्ज उत्पन्न करता है। इस विद्युतीय प्रवाह को बिजली का “स्टैप्ड लीडर” कहा जाता है जिसे देखा जा सकता है। चूंकि मानव का शरीर विद्युत का अच्छा संवाहक होता है, इसलिए हमारा शरीर आसमानी बिजली के प्रवाह को स्वीकार कर लेता है, जिसे बिजली गिरना कहते हैं।
एनसीआरबी के अनुसार, भारत में हर साल 2,182 लोग आकाशीय बिजली गिरने के शिकार हो जाते हैं। 2016 में 120, 2014 में भारत में बिजली गिरने से 2,582 जबकि 2013 में 2,833 लोग मारे गए थे। आकाशीय बिजली से होने वाली मौत के मामले में मध्य प्रदेश पहले नंबर पर है। इसके बाद महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा का स्थान आता है। हाल के दिनों में आसमानी बिजली गिरने से देशभर में 125 लोग मारे गए और 57 लोग घायल हुए। इनमें सबसे अधिक बिहार में 57, उत्तर प्रदेश में 41, मध्य प्रदेश में 13 और झारखंड में 14 लोग मरे।
आकाशीय बिजली से पीड़ितों में से कुछ को ही अधिकृत तौर पर सरकारी मदद मिल पाती है। क्योंकि इस तरह के हादसे को राष्ट्रीय आपदा राहत निधि के अंतर्गत शामिल नहीं किया गया है। हालांकि, पिछले साल चौदहवें वित्तीय आयोग ने राज्य सरकारों को राज्य आपदा राहत निधि के 10 फीसद को अपने राज्यों में विशेष आपदाओं के पीड़ितों को तत्काल राहत देने के लिए इजाजत दी है। यह ध्यान देने की बात है कि आकाशीय बिजली गिरने की घटना गृह मंत्रालय की आपदाओं की अधिसूची में शामिल नहीं है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार, भारत में हर साल 2,182 लोग आकाशीय बिजली गिरने के शिकार हो जाते हैं। ब्यूरो के मुताबिक, 2016 में 120, 2014 में भारत में बिजली गिरने से 2,582 जबकि 2013 में 2,833 लोग मारे गए थे। 
इन आंकड़ों की अमेरिका में बिजली गिरने से मरने वालों की संख्या से तुलना करें तो यह और भी भयावह नजर आता है। अमेरिका में 2014 में बिजली गिरने से केवल 33 लोगों की मौत हुई। ब्यूरो के अनुसार, 2000 से 2014 तक भारत में बिजली गिरने से 32,743 लोगों की मौत हुई। जबकि अमेरिका में आकाशीय बिजली से मरने वालों की संख्या में तेजी से कमी दर्ज की गई है। वहां 1970 के दशक में औसतन 100 लोग बिजली गिरने से मारे जाते थे। यह संख्या 2015 में घट कर 27 रह गई है।
भारतीय मौसम विभाग के अनुसार पश्चिमी और मध्य भारत में बिजली गिरने का प्रकोप अधिक है। विभाग ने भारत में बारह ऐसे राज्यों की पहचान की है, जहां सबसे अधिक आकाशीय बिजली गिरती है। इनमें मध्य प्रदेश पहले नंबर पर है। इसके बाद महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा का स्थान आता है। वहीं 1967 से 2012 के बीच भारत में प्राकृतिक आपदाओं के कारण हुई मौतों में 39 प्रतिशत मौतों के लिए आकाशीय बिजली जिम्मेदार थी। केरल के तिरुवनंतपुरम स्थित इंस्टीट्यूट आॅफ लैंड एंड डिजास्टर मैनेजमेंट के अनुसार वे अखबार, पंचायत या पुलिस स्टेशन से बिजली गिरने से होने वाली मौतों के बारे में जानकारी हासिल करते हैं। ऐसे में दूर-दराज के गांवों में यह जानना मुश्किल है कि वहां क्या हो रहा है। 
अमेरिका ने आकाशीय बिजली से होने वाली मौतों को कम किया है। वहां सरकार ने जागरुकता अभियान चलाया कि लोग तूफान के समय घरों में रहें। अमेरिका में बिजली गिरने से अधिकतर समुद्री तट पर लोगों की मौत होती है जबकि भारत में खेतों में काम करने वाले किसान इसके सबसे ज्यादा शिकार होते हैं। 
किसानों की अधिक मौतें
जब ओडिशा सरकार 2017 में अप्रैल से अगस्त के बीच आसमानी बिजली से होने वाली 280 किसानों की मौत का विश्लेषण करने बैठी, तो एक बहुत परेशान करने वाली बात सामने आई। इनमें से 94 किसान जो कुल मौतों का 33.57 प्रतिशत हैं, धान के खेतों में काम करते समय मरे थे। इस संख्या की तुलना में 21.07 प्रतिशत और 14.29 प्रतिशत लोगों की अपने घरों और खेतों में काम करते समय मौतें हुई। अगस्त के बाद भी 141 लोगों की मौत बिजली गिरने से हुई, जिससे कुल मरने वालों की संख्या 421 हो गई। राज्य के आपदा प्रबंधकों व वैज्ञानिकों के जेहन में यह सवाल आया कि क्या खेतों में काम करने वाले लोगों को आसमानी बिजली से ज्यादा खतरा है, क्या उनके लिए बिजली ज्यादा जानलेवा साबित हो रही है? आसपास के भौगोलिक परिवेश में ऐसा क्या है जो, बिजली गिरने की घटना को ज्यादा बढ़ाता है?
बिहार हुआ सचेत
ओडिशा के साथ ही बिहार सरकार भी आकाशीय बिजली से होनेवाली मौतों पर मंथन कर रही है। नौ जुलाई 2017 को एक ही दिन में बिजली गिरने (स्थानीय भाषा में ठनका कहा जाता है) से 31 लोगों की मौत के बाद बिहार सरकार जागी। ध्यान रहे कि 2016 में ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने लाइटनिंग सेंसर के लिए सर्वे का सख्त निर्देश जारी किया था। मुख्यमंत्री का निर्देश मिले साल भर हो गया, लेकिन इस सेंसर के लिए सर्वे नहीं हो सका जुलाई 2017 तक। इसी कारण लाइटनिंग सेंसर लगाने की फाइल भी ठंडे बस्ते में पड़ी थी। मई से जुलाई के दूसरे हफ्ते तक बिजली गिरने से 171 लोगों की मौत ने सरकार को एक बार फिर चिंता में डाला। अगले ही दिन आपदा प्रबंधन विभाग ने संवाददाता सम्मेलन में बताया कि वज्रपात की भविष्यवाणी के लिए एक मोबाइल ऐप लाया जाएगा। 
बिहार में इस तरह की प्रणाली इसलिए भी जरूरी हो गई है क्योंकि बिजली गिरने से मौत के आंकड़ों में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है। इसी चिंता के कारण ही आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक आदि के आपदा प्रबंधन सलाहकार संजय श्रीवास्तव को बिहार बुलाकर उनसे इस पर विमर्श किया गया। इसी विमर्श के बाद बिहार सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग ने लाइटनिंग के खिलाफ अपने अभियान का ब्लू प्रिंट तैयार किया। 
उदाहरण है नामकुम का वज्रमारा
वज्रपात की पूर्व सूचना मिलना बिहार के लिए जरूरी है। वज्रपात से भारी संख्या में मौत चिंतित करती हैं। उन जिलों में इसके लिए सेंसर फौरी जरूरत बन गई है जहां वज्रपात से ज्यादा मौत का रिकॉर्ड दर्ज रहा हो। जहां बिहार में बिजली से होने वाली मौतों को कम करने के लिए नई तकनीक का सहारा लेने की सरकारी कवायद जारी है, वहीं उसके पड़ोसी राज्य झारखंड में नई तकनीक के उपयोग से बिजली गिरने से होने वाली मौतों पर एक सीमा तक नियंत्रण करने का दावा राज्य सरकार कर रही है। राज्य की राजधानी रांची के नामकुम में तो एक गांव का नाम ही वज्रमारा (आकाशीय बिजली) पड़ गया। यह नाम कब पड़ा, किसी को पता नहीं लेकिन क्यों पड़ा यह हर आदमी जानता है। हर साल सैकड़ों बार वज्र यानी आकाशीय बिजली गिरने के कारण इस गांव का नाम वज्रमारा पड़ गया।
वज्रमारा के खबरों में रहने के कारण ही आज झारखंड में आकाशीय बिजली से मौतों की संख्या कुछ नियंत्रित हुई है। पहाड़ियों के बीच जंगल में अब इस गांव के लोग चैन से रह रहे हैं। बेखौफ हैं क्योंकि नामकुम में अब लाइटनिंग अरेस्टर लग गया है। लाइटनिंग अरेस्टर अब इनके ऊपर गिरने वाली बिजली को खींचकर जमीन में डाल देता है। 508 मीटर रेंज वाले अरेस्टर की कीमत डेढ़ लाख रुपए है और अकेले नामकुम में करीब डेढ़ दर्जन जगहों पर ऐसे अरेस्टर लगाए गए हैं। हर मानसून में अकेले वज्रमारा गांव में 500 बार तक बिजली गिरती थी। इस स्थान विशेष में इतनी बार आकाशीय बिजली गिरने की वजह पर किए गए शोध में माना गया कि लोहा, तांबा जैसे खनिजों की भरमार के कारण यहां की जमीन आकाशीय बिजली को आकर्षित करती होगी। इसके अलावा जंगल और पहाड़ के बीच होने को भी एक कारण माना गया, हालांकि अंतिम तौर पर कोई परिणाम अभी निकल कर नहीं आया। यही कारण है कि सरकार ने इसके कारणों पर बहुत ज्यादा ध्यान देने की जगह बचाव के कदमों पर ध्यान केंद्रित किया।
बिरसा कृषि विवि परिसर में शक्तिशाली सेंसर
झारखंड के आपदा प्रबंधन विभाग ने बिरसा कृषि विवि परिसर में एक सेंसर लगाया, जो 300 किलोमीटर के परिक्षेत्र में आकाशीय बिजली की घटनाओं और उसकी शक्ति का अध्ययन करती है। इसी अध्ययन के बाद नामकुम के सेफ्टी ग्रिड में जर्मन लाइटनिंग अरेस्टर लगाए गए। लंबे समय तक झारखंड के आपदा प्रबंधन विभाग में विशेष परियोजना पदाधिकारी की जिम्मेदारी संभालने के बाद फिलहाल बिहार, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक आदि में आपदा प्रबंधन सलाहकार के रूप में सेवारत संजय श्रीवास्तव कहते हैं कि झारखंड में नामकुम के हालात के कारण बहुत परिवर्तन हुआ। नामकुम के साथ ही रांची एयरपोर्ट और स्टेडियम के अलावा देवघर के बाबा धाम मंदिर में भी लाइटनिंग अरेस्टर लगाने का काम पूरा हो गया। इस प्रोजेक्ट में स्कूलों-कॉलेजों और अस्पतालों को भी जोड़ा जाना था। लेकिन फिलहाल मुख्य रूप से कुछ खास स्थलों पर ही अरेस्टर लगाने का काम हो सका है। 
जोखिम कम करना
आकाशीय बिजली के गिरने पर नियंत्रण तो नहीं किया जा सकता है लेकिन केरल के तिरुवनंतपुरम में इंस्टीट्यूट ऑफ लैंड एंड डिजास्टर मैनेजमेंट का सुझाव है कि इस संबंध में हर राज्य सरकारें अपने-अपने राज्यों में कमजोर क्षेत्रों की पहचान कर सकती हैं। अमेरिका या कनाडा की तरह भारत में आकाशीय बिजली की पहचान करने वाला नेटवर्क नहीं है। हालांकि इस बार बिहार सरकार ने बिजली गिरने की घटनाओं से बचाव के उपायों पर जन-जागरुकता को लेकर पहली बार मीडिया में विज्ञापन जारी किए थे। वहीं दूसरी ओर कई विशेषज्ञों ने कहा कि भारत को भी आकाशीय बिजली से होने वाली मौतों को कम करने के लिए बांग्लादेश की रणनीतियों को अपनाना चाहिए। वहां के लोक गीतों, नुक्कड़ नाटकों और कहानियों में आकाशीय बिजली से बचने के उपायों को बताया गया है।
त्रिशूल से बचाव
खेतों में काम करते वक्त आकाशीय बिजली से बचने के लिए खेतों में त्रिशूल गाड़ने लगे हैं। बिजली कड़कने और बारिश होने पर जो ग्रामीण कल तक अपने आंगन में लोहे की कोई वस्तु फेंकते रहे थे,, वे अब खेतों में काम करते वक्त आकाशीय बिजली से बचने के लिए खेतों में त्रिशूल गाड़ने लगे हैं। यह परंपरा तेजी से नानगूर क्षेत्र में बढ़ रही है। कुछ लोग इसे धर्म प्रचार से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन क्षेत्र के किसान इस बात को नकारते हुए त्रिशूल स्थापना को आकाशीय बिजली और वन्यप्राणियों से जान माल की सुरक्षा का बेहद कारगर उपाय बता रहे हैं। नानगूर क्षेत्र के किसान अपने खेतों और लाड़ी (झोपड़ी) के बीच त्रिशूल गाड़ने लगे हैं।
इस संबंध में चितापदर के ईश्वर कश्यप, महेन्द्र ठाकुर, पोड़ागुड़ा के खगेन्द्र देवांगन, साड़गुड़ के नरसिंह कश्यप आदि बताते हैं कि पहले लोगों में सघन खेती के प्रति जागरूकता नहीं थी, परन्तु अब किसानी के प्रति लोगों का रूझान बढ़ा है। यह सहीं है कि जब से खेत और झोपड़ी के मध्य त्रिशूल गाड़ने की परंपरा शुरू हुई है, क्षेत्र में आकाशीय बिजली से मरने वालों की खबरें नहीं आ रहीं हैं। अधिकांश खेत जंगलों से लगे हुए हैं और वन्यप्राणियों के हमले की आशंका बनी रहती है। किसान त्रिशूल को अपने समीप रख सुरक्षित भी महसूस करते हैं।
आकाशीय बिजली से जुड़े कुछ तथ्य
• आकाशीय बिजली का तापमान सूर्य की ऊपरी सतह से भी ज्यादा होता है
• इसकी क्षमता 300 किलोवाट अर्थात 12.5 करोड़ वाट से ज्यादा चार्ज की होती है
• यह बिजली मिली सेकेंड से भी कम समय के लिए ठहरती है
• यह मनुष्य के सिर, गले और कंधे को प्रभावित करती है
• दोपहर के वक्त इसके गिरने की संभावना सबसे ज्यादा होती है
• एक अध्ययन के अनुसार आकाशीय बिजली औरतों से ज्यादा आदमियों को प्रभावित करती है
बचाव के उपाय
  • • यदि आप बादलों के गरजने के समय घर के अंदर हैं तो घर के अंदर ही रहें
  • • रेडिएटर, पाइप, फोन, स्टोव आदि से दूरी बनाकर रखें
  • • पेड़ के नीचे या खुले मैदान में जाने से बचें
  • • अगर आप खुले मैदान में हैं तो जल्दी से किसी बिल्डिंग में जाकर खड़े हो जाएं
  • पहले सूचना देगा एप
वज्रपात से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए आपदा प्रबंधन विभाग वज्रपात एप की सेवा शुरू करने जा रहा है जो वज्रपात की पूर्व सूचना देगा. इस एप को इसरो, एनएआरएल, आईएमडी, एपीएसडीएमए व अर्थनेटवर्डस ने तैयार किया है. आंध्र प्रदेश आपदा प्रबंधन विभाग, तेलंगाना, केरल व कर्नाटक की सरकार इसका उपयोग कर रही है. इस दिशा में बिहार भी सचेत हुआ है.
एप से होगा फायदा
• वज्रपात एप सेंसर आधारित तकनीक पर काम करता है.
• वज्रपात के आधा घंटा पहले यह जानकारी दे देता है
• इस एप से यह पता चलेगा कि किस इलाके में बिजली गिरने वाली है.
• एप से मिली सूचना आम लोगों को एसएमएस के माध्यम से दी जाएगी.
• एप के माध्यम से जो सूचनाएं मिलेंगी उसे आपदा प्रबंधन विभाग के नियंत्रण कक्ष के माध्यम से एक्सेस किया जाएगा. नियंत्रण कक्ष से आम लोगों को एसएमएस के जरिए मोबाइल पर एलर्ट भेजा जाएगा. इससे बहुत हद तक बचाव संभव हो पाएगा.