लगातार 44 गाने गाकर मधु मंसूरी ने बांधा था समां

2019-01-03

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-मो. असगर खान

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उस रात... मुसलसल एक बार में कई रागों में गाए  44 गीत का जिक्र करते हुए मशहूर लोक गायक मधु मंसूरी हंसमुख का बदन सिहर उठता है. ये बात बहुत कम लोग और मधु मंसूरी के करीबी ही जानते हैं कि 2 अक्टूबर 1987 की रात को गुमला बिशुनपुर थाने के बनारी चौक पर रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना हुई थी.
मंसूरी के मुताबिक,मौका सांस्कृतिक कार्यक्रम का था और मंच पर मंसूरी के साथ रामदयाल मुंडा, बीपी केसरी मौजूद थें. उन्होंने जब गाना शुरु किया तो सामने बैठी खचाखच भीड़ झूमने रही थी. तभी अचानक आखिरी पंक्ति में बैठी एक जवान युवती लोगों को लगभग रौंदते हुए मंसूरी की तरफ दौड़ पड़ी. वो दौड़ती हुई मंच से महज बीस कदम की दूरी पर पहुंची ही थी कि उसके भाई धिरजू बड़ाईक ने बरछा से (धारदार तलवार) उसकी गर्दन पर वार किया. वार ऐसा था कि युवती का सर धड़ से अलग होकर जमीन पर गिर पड़ा और चार कदम आगे उसका धड़। मंसूरी ये सब देख बेहोश हो गए. 
मंसूरी याद करते हैं, “उस युवती को एकाएक मेरी तरफ दौड़ता देख लोग हैरान थे. स्वयं मैं भी. अचंभित दृश्य देख शांत भीड़ भगदड़ में तब्दील हो गई. जब मुझे होश आया तो वहां के थानेदार ने फिर से मंच पर आकर गाने को कहा. मैंने इनकार किया तो उन्होंने कहा कि लोगों की जान बचाने का यही एक रास्ता है. क्योंकि अगर भीड़ जंगल की तरफ भागती है तो कई लोग जंगली जानवर के शिकार हो सकते हैं. फिर बहुत मुश्किल से लोगों को शांत किया गया. मंच के सामने युवती की खून से भरी लाश सफेद चादर में ढ़की रखी थी. तभी मैंने दिल पर पत्थर रख आंख बंद किया और सुबह छह बजे तक मुसलसल 44 गीत गाया.”
संयोग से घटना के समय मंच पर मंसूरी के बगल में बैठे रामदयाल मुंडा और बीपी केसरी तो अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उस कार्यक्रम में शामिल रहे विकास भारती के पूर्व सचिव भिखारी भगत को ये घटना आज भी याद है. वो इसकी पुष्टि करते हुए कहते हैं, घटना वास्तव में दर्दनाक थी. वो लड़की मधु मंसूरी की तरफ बढ़ रही थी, जो उसके भाई को नागवार गुजरा और उसने अपनी बहन की हत्या कर दी. मंसूरी इसे अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी घटना मानते हैं. वो कहते हैं कि उन्हें कई साल बाद गांव वालों ने बताया कि वो लड़की उनके गीतों से काफी प्रभावित हुई थी. इसलिए भेंट में इनाम और उनसे हाथ मिलाने के लिए उनकी तरफ दौड़ी थी. गांव छोड़ब नहीं..., नागपुर कर कोरा..., जैसे लोकप्रिय गीत गाने वाले मधु मंसूरी के प्रति लोगों का ये लगाव कोई नया नहीं है, ऐसी दिवानगी के कई किस्से-कहानियां हैं.
सात साल में ही कंठ का कमाल 
मधु मंसूरी झारखंड की वो शख्यियत हैं जिन्होंने दो हजार से भी अधिक लोक गीत गाये और लिखे हैं. इन्होंने मर्दानी झूमर, अंगनई (जनानी झूमर), पावस, उदासी, फगुवा जैसे राग में सैकड़ों शिष्ट और ठेठ नागपुरी गीत गाये हैं, जिनमें झारखंडी संस्कृति की विरासत सिमटी है. झारखंड आंदोलन के सर्वाधिक प्रेरक गीत गाने का रिकॉर्ड भी इन्हीं के नाम बताया जाता है.
रातू प्रखंड के सिमलिया गांव में 1948 में जन्मे मंसूरी बचपन से ही गांव में पर्व त्योहारों के मौके पर होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों में जाया करते थें. वहां नागपुरी, मुंडारी भाषा में संगीत-नृत्य को देख-सुन सीखते थे. ललक ऐसी थी कि सिर्फ सात साल की उम्र में ही उनकी आवाज का जादू बिखरने लगा. दिन 2 अगस्त 1956 का था और मौका रातू प्रखंड के उद्घाटन पर आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम का. नागपुरी के महाकवि घासी राम के लिखे गीत (कांव ना कसूर दइया बिछू रला दाईया मोर पिया...) के बोल को जब मंसूरी ने अपना कंठ दिया तो कईयों के दिल मचल उठे. तब छोटानागपुर महाराजा चिंतामणि शरणनाथ शाहदेव ने उन्हें बदले में दस रुपये का इनाम दिया था. 
950 बार का रिकॉर्ड 
70 के दशक में मां को कैंसर हुआ तो पिता अब्दुल रहमान मंसूरी ने इलाज के लिए घर समेत जमीन को औने-पौने में बेच दिया.  इलाज के दो साल बाद मां का निधन हो गया. नौवीं में ही तंगहाली ने मंसूरी को पढ़ाई छोड़ने पर मजबूर कर दिया. 1974 में पिता भी चल बसे. इसी दौरान मधु मंसूरी रांची मेकॉन में बतौर फोर्थ क्लास कर्मचारी काम करने लगे. उनकी शादी चूंकि बचपन में ही करा दी गयी थी इसलिए जिम्मेदारी का बोझ बढ़ चुका था. लेकिन गीत-संगीत के जुनून के बीच कभी भी गरीबी को आड़े नहीं आने दिया. 
इधर, मंसूरी की लोकप्रियता रांची ही नहीं, बल्कि झारखंड के अन्य शहरों तक अपना पैर पसार चुकी थी. लोग बताते हैं, मंसूरी मेकॉन में कार्यरत रहते हुए भी सांस्कृतिक-सामाजिक कार्यक्रम में हिस्सा लेते थे. ऑल इंडिया रेडियो पर भी उनके गीतों का प्रसारण होता. लोक गायक और पद्मश्री मुकुंद नायक कहते हैं कि सुरीली आवाज के धनी मधु मंसूरी केवल गीत ही नहीं, बल्कि वह एक भाव-प्रवण कवि भी हैं.
इस बारे में मंसूरी ने कहा, उनके गीत के मुरीद अविभाजित बिहार के राज्यपाल एआर किदवई, मंत्री जगरनाथ मिश्रा, खेल मंत्री और रांची डीसी तक थे. इनलोगों ने मेकॉन को पत्र लिखकर उन्हें सामाजिक कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए विशेष छुट्टी देने की अनुशंसा की थी.
ऐसे तो मधू मंसूरी का हर गीत लोगों को पंसद आता, लेकिन खुद वो अपने एक गीत को सबसे पंसददीदा बताते हैं. वो कहते, “1972 में ‘नागपुर कर कोरा’ ( नागपुर कर कोरा... , नदी नाला टाका टुकू बन रे पतेरा, भरले कोसा कासी फूल, डिंडा समय झूला झूल..., बिना इंजन बिना तेल गाड़ी लोहरदगा मेल... .) नामक गीत मैंने स्वयं लिखा और गाया. यह गीत इतना प्रचालित हुआ कि अब तक मैं इसे लगभग 950 बार गा चुका हूं. हर महफिल,कार्यक्रम में मेरे इस गीत की चर्चा होती है. यह गीत राज्य में सांस्कृतिक माहौल बनाने में काफी सार्थक साबित हुआ. देश-विदेश में कई जगहों पर इसे गाया गया.”  हाल में आई फिल्म ‘गाड़ी लोहदग्गा मेल’ में  भी इस गाने को फिल्माया गया है, जिसके किरदार में खुद मधू मंसूरी हैं.
मंसूरी के क्रांतिकारी तेवर
क्रांतिकारी और आंदोलन की गीत कब से और क्यों गाना शुरू किया के प्रश्न पर मंसूरी कहते हैं, “विकास के नाम पर रांची में किसानों और आदिवासियों की हजारों एकड़ जमीन अधिग्रहन की जा रही थी. रांची में बनी हरमू कॉलनी, आशोक नगर कॉलनी, एचईसी और तुपुदाना जैसी फैक्ट्री की स्थापना झारखंड के लूट और विस्थापन पर कायम की गई. यही हाल अन्य शहरों का भी बाद में हुआ. ये सब देखते हुए बड़ा हुआ. बचपन से ही मेरे मन में ये बात बहुत कचोटती थी कि हमारे जल-जंगल-जमीन विकास के झूठे नाम पर छीने जा रहे हैं. हम कहां जायेंगे. ऐसी कई बात मन में रह-रह कर उभर आती.”
मधू मंसूरी का यही आक्रोश खूंटी के झारखंड आंदोलन मंच में दस दिसंबर को 1960 फूटा. जब उन्होंने पहली बार आंदोलन गीत प्रस्तुत किया तो तेवर और इरादे साफ थे. और इसके बोल थे. “पहिले रहिली हम गोरा के धंगरवा, धन धरम डगमग, आबे ही साहेबक पानी भरवा. (अरे! पहले तो हम गोरे अंग्रेजों के नौकर थे जिसके कारण हमारी समृद्धि और धर्म की कोई बिसात नहीं थी. और आज हम अपने देशी साहबों के यहां पानी भर रहे हैं.).”
1963 का वो मशूहर वाक्या जिसने मधु मंसूरी को सांस्कृतिक और सामाजिक लोक गायक से मुखर और बेबाक झारखंडी आंदोलनकारी के रूप में पहचान दिलाई.उसके चर्चे भी खूब होते हैं. हुआ यूं था कि जयपाल सिंह मुंडा अपने 33 विधायकों वाली मुर्गा छाप वाली झारखंड पार्टी का कांग्रेस में विलय कर रांची लौटे थे. इसके कुछ ही दिन बाद रांची बिरसा चौक पर एक सभा हुई जिसमें जयपाल सिंह मुंडा शामिल हुए. जयपाल सिंह के फैसले को लेकर मधु मंसूरी में आक्रोश था और वो गांव से साइकिल की सवारी कर मुंडा से मिलने बिरसा चौक पहुंचे थे. मन में इतना आक्रोश था कि मुंडा को देख मंसूरी ने उनकी तरफ हाथ उठाते हुए व्यंगात्मक गीत गाया.
“बेचले मुरुगा छाप, दुइयो गाले खाले थाप. सब के बनाले बनिहार,
काटी बन झार, चोर के देई देले उपहार.”
‘गांव छोड़ब नहीं’ हर की जुबां पर
जब नेशनल अवार्ड से सम्मानित फिल्म मेकर मेघनाद के लिखे गीत (2007) गांव छोड़ब नहीं को मंसूरी ने गया तो इस गीत का संदेश भारत से विदेश तक जा फैला. मेघनात बताते हैं कि इस गीत को लिखकर मधु मंसूरी को दिखाया तो उन्होंने इसमें कुछ सुधार और तब्दील करने की बात कही. फिर उसे अपने आंदाज में लिखा जिसके बोल थे. “गांव छोड़ब नहीं, जंगल छोडब नहीं, माई माटी छोड़ब नहीं, लड़ाई छोड़ब नहीं... .”
बताया जाता है कि ये गाना इतना लोक्रप्रिय हुआ कि अब तक 20 से भी अधिक राज्य और 10 देशों में अलग-अलग भाषाओं गाया जा चुका है. बाद में इस पर सवा पांच मिनट की म्यूजिक फिल्म बनाई गई (गांव छोड़ब नहीं). फिल्म में गांव, जंगल, पहाड़ और प्राकृतिक संपदा के बचाने की लड़ाई लड़ रहे आदिवासियों का प्रतिरोध दिखाया गया. 
मेघनाद कहते हैं,  “गांव छोड़ब नहीं, गीत झारखंडी उलगुलान को सटीक और सार्थक परिभाषित करता. मैंने जितने भी लोक गायक, गीतकार को देखा सुना, उनमें मधु मंसूरी अलग थे. उनके क्रांतिकारी गीतों में जल-जंगल- जमीन और झारखंडी संस्कृति को बचाने  का संदेश और जज्बा मिलता है. उन्होंने अपनी बेबाकी कायम रखी और चापलूसी कभी नहीं की.”
एक बात आज भी मधु मंसूरी को हमेशा कचोटती है कि उनके की नाम की घोषणा करके भी उन्हें पद्मश्री का नहीं मिलना. वो कहते हैं कि 2014 में राज्य सरकार ने केंद्र सरकार को पद्मश्री सम्मान के लिए उनके नाम की सिफारिश कर दी थी. तब के अखबारों में उनका नाम भी छप गया था, और उन्हें बधाई दी जा रही थी. लेकिन वो सिर्फ घोषणा और सिफारिश थी.