सरकार की प्राथमिकता में क्यों नहीं हैं ये 10 करोड़ बच्चे

2019-01-03

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-उपेन्द्रनाथ पांडेय

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गजब हालत है। आज के बच्चे कल के भविष्य हैं। यही बच्चे कल इंजीनियर, चिकित्सक, प्रशासनिक अधिकारी और देश के नेता बनेंगे। अर्थात इन्हीं के कंधों पर देश को चलाने की जिम्मेवारी होगी। फिर इन बच्चों का आधार कमजोर क्यों किया जा रहा है। सरकार की प्राथमिकता सूची में ये बच्चे क्यों नहीं आ पाते। ब्यूरोक्रेसी की हालत देखें तो उच्चाधिकारियों के अधिसंख्य पद, अपवाद को छोड़कर, हमेशा भरे रहते हैं। फिर जैसे-जैसे हम निचले पदों की ओर झांकते हैं तो स्वीकृत पदों के विरुद्ध रिक्तियां बढ़ती चली जाती हैं। प्राथमिक शिक्षण संस्थानों मंे शिक्षकों के 50 फीसदी से अधिक पद रिक्त हैं। कहीं-कहीं तो ये रिक्तियां 75 फीसदी तक हो गयी हैं। शायद सरकारों की नजरें इन पर इसलिए नहीं होती हैं, क्योंकि इन्हें मतदाता बनने में काफी वक्त लगने वाला होता है। युवाओं पर सभी सरकारें फोकस करती हैं, पर बच्चों को कोई नहीं। 
हालात देखिए! शिक्षा का अधिकार, सर्वशिक्षा अभियान, रोज बदलती शिक्षा नीति जैसे तमाम कदम उठाने के बावजूद भारत में प्राथमिक शिक्षा की स्थिति भयावह होती जा रही है। प्राथमिक शिक्षा पर ग्रामीण भारत की वार्षिक रिपोर्ट पेश करने वाला एनजीओ असर की 2017 की रिपोर्ट गंभीर है। इस संस्थान ने अपने सर्वेक्षण में 14 से 18 वर्ष के आयुवर्ग के बच्चों को शामिल किया है, क्योंकि भारत में इन बच्चों की संख्या 10 करोड़ है। इस आयु वर्ग का किशोर जल्द ही युवा नागरिक के रूप में देश में कदम रखने वाला है। इसलिए इस वर्ग पर अविलंब ध्यान देना जरूरी है। इस रिपोर्ट के अनुसार 14 से 18 आयुवर्ग के 86 प्रतिशत बच्चे शिक्षण संस्थानों में नामांकित हैं। असर की रिपोर्ट में तो बहुत सारी बातें हैं, मगर सबसे गंभीर बात यह है कि भारतीय छात्रों की कक्षाएं जैसे-जैसे बढ़ती हैं, उनकी शैक्षणिक क्षमता में उस अनुपात में वृद्धि नहीं हो पाती है। अर्थात शिक्षा के स्तर में कक्षाओं के साथ गिरावट आते जाती है। ये आंकड़े सन्न करने वाले हैं।
दरअसल, भारत में सरकारी स्कूलों की स्थिति दिनोदिन खराब होती जा रही है। शहरी इलाकों में तो अधिसंख्य बच्चे निजी स्कूलों में शिक्षा ग्रहण करते हैं, परंतु ग्रामीण इलाकों में आज भी सरकारी स्कूल ही एक मात्र सहारा है। प्राथमिक स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए ही सर्वशिक्षा अभियान की शुरुआत की गयी थी। उसका उद्देश्य पूरे देश में गुणवत्तायुक्त आधारभूत शिक्षा उपलब्ध कराना था। सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा के लिए केन्द्र, राज्य में स्थानीय सरकार के बीच समन्वय बनाकर एक शिक्षित देश का निर्माण करना था। प्राथमिक शिक्षा के प्रबंधन में पंचायती राज संस्थाओं, स्कूल प्रबंधन समिति, ग्रामीण शिक्षा समिति, अभिभावक एवं शिक्षक संगठन, माता-पिता संगठन, जनजातीय स्वायत्तशासी परिषद् समेत कई संस्थानों को शामिल करने का प्रयास था। लेकिन परिणाम क्या निकला। 2001 में लागू सर्वशिक्षा अभियान के बीच ही निजी स्कूलों की संख्या बढ़ती चली गयी। कारण साफ है- सरकारी स्कूलों में एक तो पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं, जो हैं, उनमें औसतन 20 फीसदी कक्षाओं से अनुपस्थित रहते हैं। कई राज्यों में तो शिक्षकों की अनुपस्थिति का प्रतिशत 30 तक है। यह अनुपस्थिति सिर्फ लापरवाह शिक्षकों के कारण ही नहीं है, बल्कि इसमें सरकारी गलतियां भी हैं। शिक्षकों को ही भवन निर्माण, मध्याह्न भोजन, जनसंख्या, मतदाता सूची निर्माण, मतदान आदि कार्यों में लगा दिया जाता है। इसके कारण शिक्षकों का ध्यान पढ़ाई से हट जाता है। प्रशासनिक खामियों का फायदा उठाकर कुछ शिक्षक ग्रामीण क्षेत्र से अपना स्थानांतरण अथवा प्रतिनियुक्ति शहरी क्षेत्र में करा लेते हैं। शिक्षकों और शिक्षा अधिकारियों का ध्यान इस पर जाता ही नहीं है कि शहरी सरकारी स्कूलों में बच्चे कम होते हैं और शिक्षक ज्यादा, जबकि ग्रामीण स्कूलों में छात्र अधिक होते हैं और शिक्षक कम। फिर भी शिक्षकों का संतुलन बनाने की दिशा में कार्य नहीं किया जाता। छात्र-शिक्षक अनुपात शहरों में भी गड़बड़ रहते हैं और गांवों में भी। कहीं 300 छात्रों पर एक शिक्षक हैं, तो कहीं 10 छात्रों के लिए 10 शिक्षक। 
 भारत में करीब 40 करोड़ की आबादी इन्हीं सरकारी स्कूलों में अध्ययनरत है और पहली कक्षा से 12वीं तक के सरकारी स्कूलों के प्रति घोर लापरवाही बरती जा रही है। झारखंड के प्राथमिक स्कूलों में पारा शिक्षकों के भरोसे बच्चों का भविष्य है, तो मैट्रिक और इंटर की कक्षाओं में शिक्षकों के करीब 50 फीसदी पद ही रिक्त हैं। यहां सरकारी इंटर कॉलेजों में शिक्षकों के अभाव में क्षमतानुसार बच्चे ही नहीं मिलते। विज्ञान की कक्षाओं में तो कई जगह नामांकन होते ही नहीं और होते भी हैं तो काफी कम। अन्य राज्यों में भी यही स्थिति है। फिर विश्वविद्यालयों में भी कमोबेश यही स्थिति है। शिक्षकों का अभाव लगभग हर सरकारी शिक्षण संस्थानों में है। एक ओर जहां सरकार देश में व्याप्त डिजिटल दूरी को समाप्त करने के लिए कंप्यूटर शिक्षा पर जोर दे रही है, वहीं दूसरी ओर छात्रों को गुणवतायुक्त प्राथमिक शिक्षा भी नहीं मिल पा रही है। 
असल में राज्य सरकारों ने स्कूलों की निरीक्षण प्रणाली ही समाप्त कर दी है। जमीनी सच्चाई को जानने का सार्थक प्रयास किया गया होता तो परिणाम आशानुकूल होते। विकास का आधार शिक्षा है, परंतु आधार को ही कमजोर होने के लिए छोड़ दिया गया है। इसमें सुधार तभी संभव होगा, जब राज्य सरकारें शिक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने को अपनी प्राथमिक सूची में शामिल करेंगी।