मछली पकड़ने के पारंपरिक तरीके

2019-02-16

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-ए के खान

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झारखंड के संथाल परगना और रांची, खूंटी, लोहरदगा के इलाकों में मछली पकड़ने के पारंपरिक तरीके आज भी जीवित है. डैम, नदी, तलाब जैसी जगहों में मछली पकड़ने के लिए मछुआरे परंपरागत उपकरण का प्रयोग करते हैं. इसके अलावा ग्रामीण भी इन उपकरणों का इस्तेमाल किया करते हैं. मछली पकड़ने के लिए जाल और बंसी दो ऐसे उपकरण हैं जो ग्लोबल बताये जाते हैं. लेकिन इनके अलावा झारखंड के गांवों में मछलियों को पकड़ने की कई और तकनीक भी हैं, जिसका इस्तेमाल जुलाई से लेकर फरवरी तक किया जाता है.
कुमनी गांव में मछली पकड़ने वाला सस्ता साधन है. यह शंकुनुमा या तेल  की कुप्पी की तरह बना होता है, जो काफी लंबा होता है. बरसात के दिनों में खेतों में जल जमाव हो जाता है और एक खेत दूसरे खेत से लगे होते, जिनके निकास के लिए क्यारी को किनारे-किनारे से काट दिया जाता है. उसी मुहाने पर कुमनी लगा दी जाती है. क्षेत्रीय भाषा में इसी तरह से मछली को पकड़ने के लिए एक और उपकरण का प्रयोग किया जाता है, जिसे सेरा कहा जाता है.
इसके अलावा छोटे-छोटे डोभा बनाकर बरसात के जल जमा किया जाता है. फिर एक निर्धारित समय बाद उसके पानी को तब तक बर्तन-बासन से बाहर निकाला जाता है जब तक मछली आसानी से दिखाई ना दें. इसके बाद उसे आसानी पकड़ लिया जाता है.
झारखंड के ग्रामीण तलाब, नदीं या डैम से मछली पकड़ने के लिए एक विशेष प्रकार की नाव बनाते हैं जिससे वे नदीं या तलाब के बीच तक पहुंचकर जाल डालते या लगाते हैं. यह बांस की बनी चतुर्भुज नौका होती है जिसे ट्यूब के माध्यम से चलाया जाता है. इसी के माध्यम से ग्रामीण या मछुवारे तलाब, नदी या डैम तक पहुंचकर मछली पकड़ने के लिए जाल डालते हैं. इन सबके अलावा डैम से मछली पकड़ने के लिए टायर के ट्यूब को नाव की तरह जाल डालने के लिए इस्तेमाल में लाया जाता है. इससे एक छोर से दूसरे छोर तक जाते हैं या फिर डैम के बीच तक पहुंचते हैं. फिर एक विशेष प्रकार के बने जाल को डालते हैं जिसकी लंबाई और चौड़ाई आम जालों की तुलना में काफी बड़ी होती है. इस जाल में जगह-जगह थर्माेकॉल के टुकड़े बांध दिये जाते है, जिसका काम बंसी में लगी फूंदी जैसा होता है, जो मछली के जाल में फंसने का संकेत देता है. तीन-चार घंटे के बाद थर्माेकॉल वाले टुकड़े को चेक किया जाता है. जो टुकड़ा पानी के भीतर चला जाता है, वो एक संकेत है कि मछली फंस गयी है. ऐसा होने पर वहां पर जाल उठाकर मछली को निकालते हैं.
सरकार झारखंड के गांव गांव में ब्लू रिवोल्यूशन को बढ़ा दे रही है, जिससे गांव के लोगों का जीवन स्तर सुधर रहा है. साथ ही साथ रोजगार की संभावना भी बन रही है. झारखंड प्रदेश मत्स्य उत्पादन मामले में आत्मनिर्भरता के बेहद करीब पहुंच गया है. और इन सब में ग्रामीणों की ओर से किए जा रहे है पंपरागत मत्स्य पालन सार्थक साबित हो रहा है.  झारखंड में मछली उत्पादन 14 हजार मीट्रिक टन से बढ़कर एक लाख 96 हजार मीट्रिक टन हो गया है.