पारंपरिक कीट नियंत्रण

2019-02-16

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-ए के खान

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पारंपरिक रूप से किसानों द्वारा झारखंड में कई कीट प्रबंधन विधियों का उपयोग किया जाता है. जैसे फसल चक्रण (एक खेत में हर साल अलग-अलग फसल उगाना), साथी फसल (एक खेत में एक साथ एक से ज्यादा फसल उगाना) और गैर-फसलों सहित वैसे फसल जिनसे कीट नियंत्रण होता है.

झारखंड में दुमका जिले के खिजुरिया गांव के किसान गहरी तराई (जहां बरसात में पानी जम जाता है) का उपयोग करते हैं.जहां खेतों के पूरी तरह से सूखने की प्रतीक्षा किए बिना ही गीला बीजारोपण किया जाता है. इस प्रथा के तहत 100 प्रतिशत जलभराव वाली भूमि का उपयोग किया जाता है. इस प्रकार की भूमि वाले किसानों द्वारा यह पिछले कई वर्षों से चलन में है. रांची जिले के हातमा गांव के किसान इस अभ्यास का उपयोग कीट के हमले को नियंत्रित करने और खेत (80 प्रतिशत सफलता) से कीट भगाने के लिए करते हैं.

इन खेतों में धान का पुआल पहली जुताई के बाद खेत के भूखंडों में जलाया जाता है. इस तरह  पुआल जलाने के कारण मिट्टी निष्फल हो जाती है और कीटों से मुक्त हो जाती है.

फसल को कीट-पतंगों से बचाने के लिए धान की फसल में खाद के रूप में रोपाई के एक सप्ताह पहले जतरोपा की पत्तियों का उपयोग किया जाता है.

48 फीसदी किसान बीज उपचार के लिए घरेलू समाग्री का उपयोग करते हैं. जैसे गोबर, गोमूत्र और चूना, अंडा, नमक पानी और नीम के पत्ते आदि का इस्तेमाल करते हैं.

कई कीट प्रबंधन प्रथाओं का उपयोग झारखंड के किसानों द्वारा किया जाता है. इनमें यांत्रिक तरीके, भौतिक विधियां एवं आकर्षित और विकर्षित करने वाले स्थानीय जीव शामिल हैं.

सिंधवार, गोमूत्र, निर्गुन्डी के पत्ते और हींग का प्रयोग हर्बल कीटनाशक के तौर पर किया जाता है. यह मिश्रण को जीव कीटनाशक है.

झारखंड में लगभग 42 फीसदी आदिवासी किसान गोल फ्लाई (एक प्रकार कीड़ा) नियंत्रित करने के लिए परसो / परसु (क्लिस्टेन्थस कोलिनस) की पत्तियों का उपयोग करते हैं. इस प्रथा में परसु की ताजी पत्तियां को एकत्रित कर संक्रमित क्षेत्रों में फैला दिया जाता है.

झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले के बुरिबारा गांव के किसान धान की फसल में कीट नियंत्रण के लिए शरीफा के पत्ते का (एनोना स्क्वैमोसा) का उपयोग करते हैं. इसकी पत्तियों की गंध विकर्षक के रूप में कार्य करती हैं. पत्तियां कच्ची उपयोग की जाती हैं, जबकि बीजों को सुखाकर पाउडर के रूप में उपयोग किया जाता है. यह एक सदियों पुरानी प्रथा है और हर किसान द्वारा इसका पालन किया जाता है.

पूर्वी सिंहभूम जिले के किसानों को धान की फ़सल में दूधिया अवस्था के दौरान गुंडी बग (एक प्रकार का कीड़ा) की समस्या का सामना करना पड़ता है. जिसे 5-6 स्थानों पर नीम या कुजरी के फूलों को छोटे-छोटे बंडलों में रखकर नियंत्रित किया जाता है. इस कीड़े को हटाने के लिए लगभग 98 प्रतिशत किसान इस विधि का उपयोग करते हैं.

झारखंड के रांची क्षेत्र के पास धान में बांकी (एक प्रकार कीड़ा) का प्रकोप आम है, जो धान की पत्तियों को काट देता है. इस कीट को नियंत्रित करने के लिए संदना की पत्तियां को पानी में मिलाया जाता है. फिर प्रभावित धान के पौधे पर छिड़काव किया जाता है.कुछ किसान इसके लिए मिट्टी के तेल का भी प्रयोग करते हैं. रांची जिले के तमाड़ ब्लॉक में अधिकतम किसानों में पिछले कई वर्षों से इसका चलन है. बढ़ते कीटनाशक प्रतिरोध की खबरों की वजह सेऐसे स्वदेशी कीटनाशक विधि अधिक से अधिक प्रयोग में लाई जानी चाहिए.