लोहा गलाने में सिद्धहस्त बिरजिया, असुर

2019-02-16

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-ए के खान

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झारखण्ड में धातु विज्ञान की एक लंबी परंपरा रही है. झारखण्ड में  दो तरह के लोहे को गलाने के वर्कशाप हैं. इन्हीं से झारखंड के लौह उद्योग को पहचाना जाता है. असुरों की लोहा गलाने की तकनीक अतीत की जीवित तकनीक है. असुर झारखंड के दक्षिणी छोटानागपुर के पठारी इलाकों गुमला, लोहरदग्गा मे पाये जाते हैं. तीन विभिन्न किस्मों के लोहे की इनको पहचान थी. जिसे मैग्नेटाइट कहते हैं और उसे असुर पोला कहते थे.  हेमेटाइट को बीची और लैटेराइट से प्राप्त हेमेटाइट को गोटा कहते थे. इस प्रकार के लोहे को गलाने के लिए हरे साल के पेड़ के चारकोल का इस्तेमाल करते थे. यह चारकोल लोहे को पिघलाने की प्रक्रिया के लिए पर्याप्त होता है. साल का पेड़ एक अच्छी गुणवत्ता वाली जंगली लकड़ी है.
बिरजिया झारखंड की सबसे आदिम जनजातियों में से एक है. वर्तमान समय में बिरजेया लोग अधिकांशतः लोहरदगा, बिशनपुर और रायडीह (गुमला) और पलामू जिले के गुरू पुलिस स्टेशन में पाये जाते हैं. परंपरागत तौर पर बिरजिया लोगों का मुख्य  व्यवसाय लोहा गलाना, बेनोरा की खेती करना और टोकरी बुनना है.
यह माना जाता है कि यह पहली मानव प्रजाति है,  जिसने लौह अयस्क की खोज की और अपनी देशज प्रक्रिया का प्रयोग करके एक अलग तरह का लोहा तैयार किया. इनमें से कुछ आज भी अपने परंपरागत पेशे को अपनाए हुए हैं, लेकिन कच्चे माल की कमी के चलते बिरजिया लोगों ने नये आर्थिक क्रिया-कलापों को अपनाना शुरू कर दिया है. इन लोगो द्वारा लोहे को पिघलाने की भट्ठी के रूप में कोथी (खुली चूल्हा भट्ठी) का इस्तेमाल किया जाता है. इसकी उंचाई लगभग 2-1/2 फीट तक होती है, जिसमें एक सुराख होता है. इस भट्ठी को लौह अयस्क और चारकोल के मिश्रण से लबालब भर दिया जाता है और एक नलिका के माध्यम से हवा भेजी जाती है. हवा भेजने के लिए एक बेलनाकार धौंकनी को पैरों से चलाया जाता है. पैर से चलाई जाने वाली इस धौकनी को चौऊपा  कहते हैं. हवा से 4 से 5 घंटों तक भभकाया जाता है. भट्ठी का तापमान कितना हो, यह विशेषज्ञ कारीगर स्वयं तय करते हैं. अपचयन के बाद धौंकनी को हटा लिया जाता है और भट्ठी के मुंह को खोल दिया जाता है। स्पंज के रूप में एकत्रित पदार्थ (ब्लूम ) को भट्ठी से निकाल लिया जाता है और उस स्पंजी पदार्थ को पहले हल्के से पीटा जाता है, फिर उस पर कड़ा प्रहार किया जाता है. इस प्रक्रिया में उसे मनचाहे रूपों में ढाला जाता है.
बिगड़ती पारस्थितिकी के वर्तमान हालातों में परंपरागत तकनीक पर्यावरण को बचाने और इसे प्रदूषण मुक्त बनाने में अहम भूमिका निभा सकती है. परंपरागत तकनीक में ऊर्जा के स्रोत के रूप में चारकोल (लकड़ी का कोयला) का इस्तेमाल किया जाता है, यह स्थापित सत्य है कि आधुनिक स्टील मिलों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले ईंधनों की तुलना में यह बहुत कम प्रदूषक है. दूसरी बात यह है कि कोयला या अन्य जीवाश्म ईंधन बड़े पैमाने पर कैंसरकारी उप-उत्पाद पैदा करते हैं, जबकि दूसरी और चारकोल प्रदूषणकारी नहीं है, क्योंकि इसमें कम मात्रा में सल्फर पाया जाता है. इन समुदायों द्वारा जिन लौह भट्ठियों का इस्तेमाल किया जाता है,  वे छोटी होती हैं, जिसके चलते वे वातावरण को नुकसान नहीं पहुंचाती हैं.