प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति हैडोपैथी

2019-02-16

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-ए के खान

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रोगों के उपचार के लिए भारत जिस प्राकृतिक और किफायती नुस्के के लिए जाना जाता है,  उनमें से एक है हैडोपैथी. माना ये जाता है कि झारखंड के आदिवासी समुदाय से संबंधित ये नोखी पारंपरिक औषधीय प्रणाली है. झारखंड की जनजातियां अपने पारंपरिक ज्ञान का उपयोग कर प्राकृतिक और जड़ी-बूटियों और अर्क के उपयोग से कई बीमारियों का इलाज करती हैं. इससे रोगी के स्वास्थ्य पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता है.
आदिवासियों में हर्बल पौधों की पहचान करने का जन्मजात गुण होता है. झारखंड में बारह सौ किस्म के हर्बल पौधे पाये जाते हैं. आयुर्वेदिक औषधीय प्रणाली द्वारा हर्बल पौधों से  निर्मित इन दवाइयों की लागत बहुत कम होती है और इससे कई तरह की बीमारियों का इलाज होता है. मलेरिया से कालाजार तक. 
यह माना जाता है कि होडोपैथी कैंसर और एड्स जैसी जटिल बीमारियों का भी इलाज कर सकती है और वो भी बहुत कम कीमत पर.  अक्सर रोगी तपेदिक, मलेरिया, एनीमिया, मधुमेह, उच्च रक्तचाप जैसी  बीमारी से गंभीर रूप से पीड़ित होते हैं.  त्वचा में सिरोसिस और अल्सर का इलाज भी हॉडोपैथी का उपयोग करके किया जाता है.
मधुमेह का उपचार महुआ, बेर और गूलर के पेड़ के छालों के अर्क को मिलाकर किया जाता है. तपेदिक के लिए, अंडे की जर्दी का एक टॉनिक, कटहल और मल्कंगिनी की दो बूंदें और एक लता, जबकि पुनर्नवा की जड़ों और चराइगोडा की छाल के अर्क का उपयोग कालाजार के इलाज के लिए किया जाता है.
 झारखंड में वनस्पतीय उपलब्धता के साथ-साथ उच्च चिकित्सीय महत्व वाले पौधों की भरमार है. स्वदेशी आयुर्वेदिक प्रणाली के साथ बीमारियों के इलाज की प्रवृत्ति कई साल पुरानी है,  जो आदिवासी समुदाय को अपने पूर्वजों से विरासत में मिली है. लेकिन समय के साथ लोगों ने अपने पारंपरिक ज्ञान को छोड़ दिया और जीवित रहने के आधुनिक तरीकों को अपनाया. इसी का नतीजा है कि इस पारंपरिक विधा ने धीरे-धीरे अपनी पूर्व की महत्ता खो दी है.
 संताल परगना में पाकुड़ जिले के हिरणपुर ब्लॉक के सतिया गांव में स्थित अनोखे हर्बल पार्क में विभिन्न औषधीय पौधे लगाए गए हैं. इस पार्क में शिविर आयोजित किए जाते हैं, जहां चिकित्सकों को प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है. प्राकृतिक जड़ी-बूटियों से मधुमेह, पीलिया और मिर्गी जैसी बीमारियों के लिए सौ प्रतिशत प्रभावी दवाएं तैयार की जा रही हैं.
 हैडोपैथी का कोई साइड इफेक्ट नहीं है, लेकिन एक मरीज को उपचार के दौरान खुद को तरल आहार के लिए प्रतिबद्ध करना पड़ता है. होडोपैथी ने हमारे महान पूर्वजों की एक अनोखी परंपरा को जीवित रखा है.
परंपरा का यह खतरा है कि हैडोपैथी के प्रति समुदाय की जागरूकता के अभाव और इन बहुमूल्य वनों के संरक्षण की आवश्यकता के कारण इसे छोड़ दिया गया. क्षेत्र में वनों की कटाई के कारण कई मूल्यवान पौधे खो गये हैं.