महुआ ने छोड़ा मयखाना, परोस रहा जूस व अचार

2019-02-16

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-उपेन्द्रनाथ पांडेय

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झारखंड में महुआ फूल मतलब देसी दारू। जी हां! यहां महुआ की यही पहचान है। गांव की गलियों से लेकर शहर की झोपड़ पट्टियों तक महुआ शराब की गंध मिल जाती है। जब गांवों में बैल-गाय की बहुतायत थी, तब बैलों के भोजन में इसे शामिल किया जाता था, पर करीब दो-ढाई दशक से महुआ फूल का उपयोग सिर्फ दारू निर्माण में होता रहा है। लेकिन अब महुआ फूल ने मयखाना छोड़ घरों के किचन और शहरों के महंगे जूस काउंटर पर कब्जा जमाना शुरू कर दिया है। झारखंड के गांवों में महुआ से अचार व जूस का निर्माण हो रहा है। इसकी मांग रांची से लेकर दिल्ली तक हो रही है। 
देश में महुआ की सबसे बड़ी मंडी झारखंड है। रांची, पलामू, हजारीबाग, चतरा, गुमला, लोहरदगा समेत कई जिलों में महुआ के पेड़ बहुतायत में हैं। यहां महुआ उत्पादन को देखते हुए उत्पाद विभाग ने इसके भंडारण का कानून बना दिया है। इसी बीच गांवों में आधुनिक तकनीक का प्रवेश हुआ और महुआ पर प्रयोग शुरू हुआ। कभी पाव भर महुआ फुली से बनी दारू पीकर सभ्यता-संस्कृति को भूल जाने वाले झारखंडी अब उसी एक पाव फूल से बने अचार के चटखारे ले रहे हैं। रांची, हजारीबाग और गुमला के स्वयं सहायता समूह की महिलाओं ने महुआ का अचार बनाना शुरू किया। हजारीबाग के चुरचू प्रखंड के जरबा गांव की संगीता देवी ने बताया कि उनके समूह में चार गांवों की 40 महिलाएं हैं। करीब एक वर्ष से वे सभी महुआ फूल का अचार और जूस बना रही हैं। विश्व बैंक के साथ काम कर रही दिल्ली की एक संस्था जेएसडीपी से इन्हें तकनीकी सहायता मिल रही है। फिलहाल ये अपने उत्पाद हजारीबाग, रांची के अलावा दिल्ली में बेच रही हैं। साथ ही खाद्य उत्पाद के लाइसेंस के लिए एफएसएसआई के दिल्ली कार्यालय में आवेदन दे दिया है। रांची जिले के नामकुम प्रखंड के कुटियातु गांव की शोभा देवी ने बताया कि उनके समूह में 10 महिलाएं हैं। उनमें सात निर्माण में लगी हैं एवं तीन महिलाएं मार्केटिंग देखती हैं। सभी महिलाओं को महीने में न्यूनतम 3000 रुपये की कमाई हो जाती है। इनकी मार्केटिंग रांची, धनबाद एवं दिल्ली में होती है। अब ये भुवनेश्वर भी जाने वाली हैं। 
खटाई मिलाकर बनता है महुआ का अचार
महुआ फूल में खटाई, आमचूर या इमली मिलाकर अचार बनाया जाता है। इस अचार की मांग तेजी से बढ़ रही है। फिलहाल ये उत्पाद टेस्टिंग के दौर में हैं। महुआ फूल के लड्डू पहले बनते रहे हैं। इसे अब व्यावसायिक रूप दिया जा रहा है। मोरहाबादी मैदान में चल रहे सरस मेले में इन उत्पादों की बिक्री हो रही है। एफएसएसआई से अनुमति मिलते ही इस उत्पाद में बढ़ोतरी की योजना है। हालांकि इन महिलाओं को अभी से सरकारी सहायता मिल रही है। रांची डीसी राय महिमापत रे ने नामकुम की स्वयं सहायता समूह के कार्यों से प्रभावित कर उन्हें न सिर्फ प्रोत्साहित किया है, बल्कि उन्हें उत्पाद की पैकिंग में तकनीकी सहायता भी उपलब्ध करायी है।