आधी आबादी की अधूरी कहानी

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-रेणु प्रकाश  

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आज हम नजरें दौड़ाएं तो एक से एक शक्तिशाली महिलाओं की तस्वीर आंखों के सामने कौंध जाती है, जिन्होंने समाज, देश व अन्तरराष्ट्रीय पटल पर ऐसे चमक व दमक पैदा की जो कालातीत तो है ही अजेय एवं दुर्धर्ष भी है। झारखंड के संदर्भ में कहूं तो महान नेत्री फूलो झानो, ममी देवमनी याद आती हैं। कौन इससे इनकार कर सकता है कि इंदिरा गांधी अपने जीवन काल में ही ंिकवदंति बन गयीं। प्रायः ग्रामीण अंचल के अति पिछड़े इलाके की अनपढ़ महिला अपनी बातों में इंदिरा गांधी का उल्लेख कुछ यूं करती थीं। ’इनीरा गांदी अइसन केहु नइखे।’ (इंदिरा गांधी जैसी कोई नहीं है)। लब्बोलुआब यह भी कि इंदिरा गांधी ने आधुनिक प्रखर राजनेत्री की छवि गढ़ी जो कि जनमानस में गहरी उतर गयी। इसी तरह जब हिन्दुस्तानी मूल की सुनीता विलियम्स अंतरिक्ष में अठखेलियां करती हैं तो यह पूरी दुनिया में अपने व्यक्तित्व का लोहा मनवा लेती हैं। आजाद हिन्द फौज में महिलाओं की टुकड़ी का नेतृत्व करती डा. कैप्टन लक्ष्मी सहगल अपने व्यक्तित्व की दृढ़ता से नेतृत्व की एक नयी छवि गढ़ती हैं। नाजुक-सी काया की दृढ़ता का परिचय वह आमरण देती रहीं। उनके कानपुर आवास का दरवाजा हमेशा मरीजों के लिए खुला रहता था जहां वे मुफ्त इलाज मृत्यु के आखिरी समय तक करती रही थीं। कल्पना दत्त, दुर्गा भाभी, कमला नेहरू, सुशीला गोपालन, अहिल्या रांगणेकर, सरोजिनी नायडू, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, महज कुछ बानगी हैं महिलाओं के अजेय व्यक्तित्व की। हम इन नामों पर गर्व कर सकते हैं, सीख ले सकते हैं, लेकिन जैसे ही निगाहों के फोकस वर्तमान के हालात पर डालते हैं तो अधिकांश हिस्सा स्याह ही नजर आता है। जिस देश के माथे पर इस प्रकार की वीरांगनाओं की गाथा मुकुट की तरह जड़ित है, उस देश की महिला आज भी भूख, गरीबी, लाचारी एवं ंिहसा से जूझ रही हैं। जैसे-जैसे सूचना क्रांति का फैलाव होता गया, भारतीय (कामुक) जनमानस ने एक नयी महिला की तस्वीर गढ़ी। वह उनके लिए वस्तु है जब जी चाहे प्यार करे, पीटो, मारो और हत्या कर दो। इंटरनेट का सूचनाओं के प्रवाह से ज्यादा सेक्स सामग्री बटोरने में ज्यादा इस्तेमाल किया जा रहा है। पोर्न साइट्स विकृत मानसिकता को पोषित करते हैं। अंजाम हर दिन अखबारों के पन्नों पर नजर आते हैं। तीन वर्ष की बालिका से लेकर 73 वर्ष की वृद्धा भी कुत्सित मानसिकता की शिकार होती हैं। यह कैसी आधुनिकता है़? यह कैसी क्रांति है़? इतिहास गवाह है कि क्रांतियों ने हमेशा रक्त रंजित इतिहास के साथ स्वर्णाक्षरों में लिखित इबारतें भी जोड़ी हैं। कंिलग के लहुलुहान इतिहास के गर्भ में सम्राट अशोक का शांति संदेश पूरे दिग-दिगंत में फैला। ऐसे विकट समय में जब नारी अस्मिता एक बहुत बड़ी चुनौती के रूप में सामने है, हमें उत्तेजित होकर नहीं, बल्कि शांत होकर सोचने की जरूरत है, क्योंकि हलचल से गंदगी रुकेगी नहीं बढ़ेगी। मैं कुछ बातें अपनी बहनों से मुखातिब होकर भी कहूंगी। क्यूं आधुनिकता के असली मायने तलाशे नहीं गये? शिक्षा से लैस, आत्मविश्वास एवं आधुनिक विचारों को आत्मसात करना ही आधुनिकता का पैमाना है। आधी रात बिना वजह देर तक सड़कों पर घूमना, वैसे कपड़े जो भले ही कष्टदायक हों, उन्हें पहनना और इतराना, कपड़ों की तरह पुरुष मित्र बदलना, शराब व सिगरेट का सेवन करना और यह सब करते हुए यह सोचना कि पुरुषों की नकल कर हम भी आजाद एवं आधुनिक हैं तो यह भ्रम के सिवा कुछ भी नहीं है। ऐसे भ्रमों ने हमारी नींव ही हिला रखी है। ये महिलाएं समाज के एक खास तबके का प्रतिनिधित्व करती हैं, स्पष्ट कहूं तो अधाए वर्ग का प्रतिनिधित्व करती हैं। एक बड़ा वर्ग उन महिलाओं का है जिनके पास जमा पूंजी उनका श्रम ही होता है। जिसका वास्तविक मूल्य आज का बाजार चुका नहीं पाता। इस वर्ग के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, भोजन जैसी मूलभूत सुविधाएं आकाश कुसुम बनी रहती हैं। शिक्षा एवं स्वास्थ्य के क्षेत्र में सरकार का जो रवैया है उस पर अलग से विमर्श की जरूरत है। एक तरफ आकाश छूती महंगाई में दो वक्त की रोटी जुटाने में ही सारी क्षमता हवा हो जाती है। ऐसे विकट माहौल में महिलाएं, बच्चियां कुपोषित होकर भयंकर रोगों का शिकार होकर असमय काल कवलित होती हैं। ऐसी परिस्थित में महिलाओं के सशक्तीकरण का नारा लगाने वाले छद्म आंदोलनकारी महिला मुद्दों के बहाने अपनी छवि चमकाने में लगे रहते हैं। रही बात कानून की तो उसकी कमी नहीं है। महिलाओं से जुड़े ढेरों कानून सिर्फ किताबों की शोभा बढ़ा रहे हैं। यदि पीडब्ल्यूडीवीए-2005, पीसीपीएनडीटी (1994) एक्ट, बालविवाह कानून, बलात्कार विरोधी कानून, दहेज विरोधी कानून, डायन हत्या के खिलाफ बने कानूनों को सचमुच अमली जामा पहनाया गया होता तो आज डायन हत्या, बलात्कार, कन्या भ्रूण हत्या, बाल विवाह, घरेलू ंिहसा का वीभत्स रूप सामने नहीं आता। पीडब्ल्यूडीवी एक्ट 2005 2005 में एक ऐसा सिविल कानून बनाया गया जो महिलाओं को घर के अन्दर होने वाली ंिहसा से सुरक्षा देता है। इस एक्ट में ंिहसा को चार भागों में बांटा गया है- - मानसिक ंिहसा : गाली, गलौज देना - शारीरिक ंिहसा : मारपीट - आर्थिक ंिहसा : खाना, कपड़ा, दवा आदि न देना - यौनिक ंिहसा : जबरन शारीरिक संबंध बनाना इस कानून के तहत प्रोटेक्शन ऑफिसर (सीडीपीओ) के पास घरेलू ंिहसा की डीआईआर (डायरेक्ट इन्फॉर्मेशन रिपोर्ट) करानी होगी। इसके तहत आवश्यकतानुसार मैजिस्ट्रेट पीड़िता के परिवार के मुख्य आरोपी को हिदायत देकर छोड़ देता है। इसमें सजा का प्रावधान नहीं है, लेकिन यदि इस आज्ञा का उल्लंघन किया जाता है तो उसे जेल की सजा भी हो सकती है। बाल-विवाह कानून इस कानून के तहत यह प्रावधान है कि 21 से कम का लड़का और 18 वर्ष से कम उम्र की लड़की की शादी होने पर 2 साल की सजा या एक लाख रुपये जुर्माना या दोनों सजा हो सकती है। इस तरह की शादी में शामिल भी व्यक्ति, लड़की को छोड़कर, सजा के भागीदार होते हैं। पीसीपीएनडीटी एक्ट 1994 इस कानून का अस्तित्व इसलिए बना कि जानकारी ली जा सके तथा यदि कोई गड़बड़ी हो तो उसका इलाज समय पर हो सके।