आदिवासियों का विकास कैसे होगा

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-बाबा मायाराम

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कुछ समय पहले जब देश के नक्शे पर तीन नए राज्यों का उदय हुआ तो विकास की उम्मीद जगी है। इनमें एक राज्य झारखंड था। यहां आदिवासियों की बड़ी संख्या है। इसे आदिवासी राज्य भी कहा जा सकता है। आदिवासियों के विकास और उनकी संस्कृति बचाने की बात होती रहती है। लेकिन आदिवासी और उनकी संस्कृति क्या है, इसे समझना जरूरी है। जंगल और आदिवासी एक दूसरे के पूरक हैं। उनका और जंगल का पारस्परिक संबंध है। जहां आज आदिवासी है, वहीं जंगल है और जहां आदिवासी नहीं है वहां जंगल भी साफ हो गया है। जंगल से आदिवासी है और आदिवासी से जंगल है। लेकिन आजाद भारत में जितनी भी परियोजनाएं बनी उनमें सबसे ज्यादा विस्थापन आदिवासियों का ही हुआ। और यह सिलसिला जारी है खान-खदान, बड़े उद्योग, बड़े बांध, वन अभयारण्य, राष्ट्रीय उद्यान, बिजली घर,प्रूफरेंज, शहरीकरण इत्यादि में जो विस्थापन हुआ है, उसमें आदिवासी ही अधिक हैं। विस्थापन आदिवासियों की बड़ी समस्या है। कभी कभी तो उन्हें दो-तीन बार विस्थापन का सामना करना पड़ता है। आदिवासी का जंगल से मां-बेटे का संबंध है। वे जंगल से उतना ही लेते हैं, जितना उनको जरूरत है। जंगल से पत्ते, फल- फूल और कंद-मूल मिलते हैं, जिनसे उनका गुजर बसर होती है। वे प्रकृतिपूजक हैं। पेड़, पहाड़, नदियों को पूजते हैं। उनका जंगल से सहज सरल संबंध है। आदिवासियों के विकास के लिए जल, जंगल, जमीन के अधिकार देने चाहिए। जंगल काटने पर पूरी तरह रोक लगानी चाहिए। जंगल से आदिवासियों के विस्थापन न हो, यह सुनिश्चित करना चाहिए। अगर जंगल बचेंगे तो आदिवासियों का जीवन-यापन अच्छे से होगा। आदिवासियों को जल और जंगल के प्रबंधन का एक अच्छा उदाहरण मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले का है जहां आदिवासियों ने तवा नदी पर बने बांध की मछली सहकारिता के माध्यम से लाभ कमाया और सरकार को अच्छी रायल्टी दी। और जंगल की रखवाली की और उसका अच्छा प्रबंधन भी किया। एक और समस्या है पलायन की। आबादी को बड़ी समस्या माना जाता है। लेकिन यही हमारी पूंजी है। उनके ही पराक्रम और मेहनत से लोगों का विकास किया जा सकता है। खेती-किसानी, छोटे-छोटे लघु कुटीर उद्योग,जंगल (वनोपज) जैसे कामों से आदिवासियों को रोजगार मिल सकता है। आदिवासी वही काम कर सकते हैं, जो वे जानते हैं या जिन्हें वे आसानी से सीख सकते हैं। इस दिशा में झारखंड में हथकरघा का अच्छा काम हुआ है, इससे बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार उपलब्ध हुआ है। और झारखंड की हस्तकला, हस्तशिल्प को बाजार उपलब्ध कराया है। इस दिशा में और काम किया जा सकता है। आदिवासी विकास और संस्कृति का अच्छा उदाहरण है। आदिवासी इलाकों में शिक्षा और स्वास्थ्य की बहुत जरूरत है। पढ़ाई लिखाई के अभाव में रोजगार के अवसरों से वंचित रह जाते हैं। चिकित्सा की पहुंच से अब भी आदिवासी दूर हैं। आदिवासियों में सामूहिकता है। हाथ से हाथ थामे जब वे पंक्तिबद्ध चलते हैं, नृत्य करते हैं, तो यह दिखाई देती है। लेकिन यह समुदाय की विशेषता है। वे एक दूसरे की मदद करते हैं। जब गांव में कोई शादी-विवाह होता है तो सभी उसमें हाथ बंटाते हैं। काम का बंटवारा कर शादी वाले घर का बोझ कम कर देते हैं। दोना पत्तल, लकड़ी काटने से लेकर भोजन पकाने तक में सब सहयोग करते हैं। तीज-त्यौहार में मांदर और ढोल की थाप पर सभी थिरकने लगते हैं। दूर-दूर गांव और शहर से लोग त्यौहार मनाने जरूर आते हैं। अपने परिजनों और गांववालों से मिलते हैं। नाचते-गाते हैं। खुशियां मनाते हैं। एक दूसरे को बधाई और शुभकामनाएं देते हैं। अगर आदिवासी और उसकी संस्कृति बचानी है तो जंगल बचाना, खेती-किसानी को बचाना और छोटे-छोटे लघु कुटीर उद्योगों की ओर बढ़ना होगा। नदियों को प्रदूषित होने से बचाना होगा। तभी नए राज्यों से आदिवासियों का भला होगा। क्या इस दिशा में काम करने के लिए सरकारें तैयार हैं?