विकास की कसौटी पर झारखण्ड

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-बसन्त हेतमसरिया

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संभावना के अनुरूप विकास की महत्वाकांक्षा, शोषण की पीड़ा से मुक्ति और अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं को बचाए रखने के लिए झारखण्ड राज्य की मांग उठी और दशकों के संघर्ष और अनगिनत शहादतों के बाद अंततः सन 2000 में यह नया राज्य अस्तित्व में आया. पर बनते ही यह राज्य राजनीतिक अस्थिरता के भंवर में फंस गया, जिससे राज्य में राजनीतिक सौदेबाजी और भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिला. नतीजतन राज्य में जोड़-तोड़ कर कई अल्पकालिक सरकारें बनीं, जिनकी प्राथमिकता अपने कार्यकाल के अधिकांश समय में विकास की बजाय सरकार बचाना रही. कमजोर सरकारों के कारण राज्य में नक्सलवाद बढ़ा, प्राकृतिक संसाधनों की बेरोक-टोक लूट हुई, विस्थापन और पलायन में वृद्धि हुई, चुनाव में पैसे की भूमिका निर्णायक हो गई, जिससे राज्य में लोकतंत्र की जड़ें कमजोर हुईं. इन सबका परिणाम यह हुआ कि राज्य का न तो संभावनाओं एवं अपेक्षाओं के अनुरूप विकास हुआ और न ही राज्य देश के अन्य राज्यों की विकास की गति के साथ चल पाया. इससे पहले कि हम समझें कि क्यों बनते ही राज्य के विकास की गाड़ी बेपटरी हो गई, यह जान लेना उचित होगा कि आखिर आज विकास के मायने क्या हैं, मापदंड क्या हैं? यूँ तो किसी मोहल्ले में एक नाली बनाकर भी विकास का ढोल बजा लिया जाता है और अपनी पीठ थपथपा ली जाती है, पर क्या वास्तव में यही विकास है? दरअसल पृथ्वी पर मनुष्य की उत्पत्ति के बाद लगातार विकास का अर्थ बदलता रहा है और इसकी परिकल्पना में नए आयाम जुड़ते रहे हैं. अपनी उत्पत्ति के समय से ही सुगम और बेहतर जीवन की चाह और इसके लिए उसके द्वारा किये गए अनथक प्रयास की बदौलत ही मनुष्य ने आदिम युग से इस आधुनिक युग तक का अब तक का सफर तय किया है. और जैसे-जैसे सफलता मिलती गई उसकी चाहत और कोशिश भी तेज होती गई. सरल शब्दों में मनुष्य की यह चाहत और प्रयास ही विकास की अवधारणा का मूल है. शुरू के दौर में इंसान के लिए पेट भर जाने कि व्यवस्था ही जहाँ विकास का पर्याय था, वहीं इसमें धीरे-धीरे तन ढंकने, सर पर छत होने जैसी जरूरतों की भरपाई जुड़ी और फिर शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन स्तर में सुधार जैसे मानक जुड़ते रहे. सरल शब्दों में विकास वह प्रक्रिया है जिसमें मनुष्य आगे बढ़ता है और अपनी समस्याओं का समाधान ढूंढता है, ताकि वह एक बेहतर जीवन जी सके. इस प्रक्रिया में चीजें बदलती हैं और पहले से बेहतर और आधुनिक होती हैं. आर्थिक, मानवीय और सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया ही विकास है. पर जरूरी है कि ये बदलाव टिकाऊ हों. विकास किसी समूह की अपने समक्ष आने वाले अवसरों और चुनौतियों से निपटने के लिए उपलब्ध संसाधनों को संयोजित करने की क्षमता के परिणामस्वरूप संभव हो पाता है. परंपरागत कल्याणकारी नजरिए वाले अर्थशाष्त्र ने पिछली शताब्दी में मनुष्य की आमदनी के आधार पर ही उसके जीवन स्तर को तय करने का नजरिया बनाया था, पर पिछली शताब्दी के अंतिम दशकों में नोबल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने इस धारणा में व्यापक सुधार सुझाए. उनके अनुसार गरीबी का सवाल सिर्फ अपर्याप्त आमदनी से ही नहीं, बल्कि इसके साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य और बेहतर जीवन स्तर के वंचित रहने से भी जुड़ा है. सेन ने ही इसमें बाद में जोड़ा कि स्वतंत्रता विकास का माध्यम ही नहीं, इसका लक्ष्य भी होना चाहिए. अमर्त्य सेन, जिनके विकास सम्बन्धी विचारों को विश्व में व्यापक मान्यता मिली, के अनुसार विकास का आकलन इसका लोगों के जीवन पर प्रभाव के आधार पर होना चाहिए और इसके लिए न सिर्फ उनकी आमदनी बल्कि उनको उपलब्ध विकल्प, उनकी सामर्थ्य और स्वतंत्रता में बदलाव और इन बदलावों के यथोचित वितरण को ध्यान में रखकर होना चाहिए, न कि पूरे समुदाय के सामान्य औसत के आधार पर, जैसा अभी हमारे देश में हो रहा है. इसीलिए अब बहुत सारे विकासवादी सकल घरेलू उत्पाद और प्रति व्यक्ति आय जैसे मानकों की वृद्धि के आधार पर विकास के दावों को भ्रामक मानते हैं. इसी तरह विकास के बारे में नई सोच के अनुसार महज लोगों की बढ़ती खुशहाली हमारी विकास की आधुनिक परिकल्पना के साथ न्याय नहीं करती. विकास का अभिप्राय यह है कि जो परिवर्तन हो, वह टिकाऊ भी हो. इसीलिए विकास की अवधारणा इस उक्ति पर आधारित होनी चाहिए कि “किसी को खाने के लिए मछली देने से बेहतर है कि उसे मछली मारना सिखा दिया जाए”. झारखण्ड में और देश के कई राज्यों में वहाँ की सरकारें राजनीतिक लाभ के लिए लोगों के बीच मछली बाँटने वाले लोक लुभावन मॉडल को ज्यादा तरजीह दे रही हैं. इसमें तत्कालिक लाभ तो मिल जाता है और अक्सर लाभुक भी खुश हो जाते हैं, पर इससे लोगों की समस्याओं का अल्पकालिक हल ही हो पाता है और विकास अंततः दिखाई नहीं देता. बांटी हुई मछली के खत्म होते ही परिस्थितियां जस की तस हो जाती हैं. इस उदाहरण से हम समझ सकते हैं कि देश के कई राज्य क्यूँ अपेक्षित रूप से विकसित नहीं हो पा रहे. इससे यह भी समझा जा सकता है कि विकास का अर्थ लोगों की समस्याओं का अस्थायी समाधान करना नहीं, बल्कि हमारी आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था में वह क्षमता पैदा करना है जो ऐसी परिस्थितियों का निर्माण कर सके जो लोगों के जीवन को दीर्घकालिक और टिकाऊ आधार पर खुशहाल बना सके. आज के सन्दर्भ में सबके लिए सम्मानजनक जीवन जीने के लिए उपयुक्त परिवेश के निर्माण को भी विकास से जोड़ना सर्वथा उपयुक्त लगता है. दुनिया के ऐसे देशों का अध्ययन करने पर, जो आज विकसित हैं और ऐसा उन्होंने हमें अब तक मिले समय से कम समय में ही कर दिखाया है, यह बात स्पष्ट हो जाती है कि उन्होंने ऐसी व्यवस्था बनाई जिसका लक्ष्य टिकाऊ बदलाव लाना था और इसके लिए देश में विकास की संस्कृति को पैदा किया गया और इसे बढ़ावा देकर मजबूत किया गया. विकास को व्यवस्था का स्वभाव बना दिया गया. इसका परिणाम यह हुआ कि वहाँ व्यवस्था ने विकास का कार्य मजबूरन नहीं बल्कि आदतन किया. हम जहाँ-जहाँ ऐसा नहीं कर पाए, वहाँ विकास का दावा महज जुमलेबाजी बन कर रह गया है. विकास के मायने समझने और इसे लागू करने की सही नीयत के साथ कई ब