प्रतिरोध के सिनेमा

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-बीजू टोप्पो

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सिनेमा का मतलब लोग सीधे तौर पर हालीवुड और बालीवुड फिल्मों के मारधाड़, नाच- गान, डायलोग एवं मनोरंजन से जोड़ देते हैं, लेकिन इसका अर्थ सिर्फ मनोरंजन से नहीं होता.इसका व्यापक मतलब दर्शकों को सूचना देने , शिक्षित करने , और मनोरंजन करने से होता है. हालीवुड- बालीवुड जिसे हम मुख्यधरा की सिनेमा भी कहते हैं, जो हमें कल्पना पर जीना सिखाती है, इसमें हीरो हिरोइन और अन्य सहायक कलाकार महज तीन घंटे के अन्दर ही जिदगी की सारी मुश्किलें हल कर खुशियों को बटोर लाते हैं, जिसे आज के युवा अपना रोल माडल मान लेते है. ये फ़िल्में व्यावसायिक होते हैं,इनका मुख्य उद्देश्य ही होता है रातों रात करोड़ों की कमाई कैसे हो. इसलिए ये फ़िल्में फैशनेबुल और मसालेदार हुआ करती हैं, इसमें युवा वैसे ही आकर्षित होते हैं जैसे बरसात की रातों में फतिंगे रोशनी से आकर्षित होते हैं. ये काल्पनिक फ़िल्में समाज के यथार्थ को कभी भी आईने की तरह नहीं दिखाती. इन फिल्मों में मानव सभ्यता से भिन्न जीवन-दर्शन को प्रदर्शित किया जाता है. इसमें मानव मूल्य से हटकर पूंजीवादी उपभोगता संस्कृति को बढ़ा चढ़ाकर पेश किया जाता है. इन फिल्मों में इलीट वर्ग के प्यार-मोहब्बत और उनके सुख – दुःख को सुनहरे परदे पर दिखाया जाता है. ये वैसी फ़िल्में होती हैं जिससे सरकार के कामकाज पर तनिक भी प्रभाव नहीं पड़ता है. बल्कि ये फ़िल्में ऐसी युवा शक्ति को जो देश में फैले हुए भ्रष्टाचार,सरकार द्वारा बरती जा रही जातीय और धार्मिक भेद, बेरोजगारी, महिला हिंसा और बलात्कार राजकीय दमन, अंधराष्ट्रवाद, असहिष्णुता,विनाशकारी विकास, अपसंस्कृति, राजनीतिक पतनशीलता,किसानों की आत्म हत्याएं, छात्रो की समस्यायों के प्रतिरोध में सड़कों पर संघर्ष करती, को सिनेमा घरों में बंद करके रखती है. ये युवा भी ऐसी समस्याओं का समाधान फिल्मों के जरिये तलाशते हैं. ऐसे युवा शायद ही सड़कों पर उतरते हैं. मुख्य धरा के सिनेमा के उलट एक वैकल्पिक समानांतर सिनेमा भी होती है जिसे हम पीपुल्स फिल्म या वृतचित्र कहते हैं. ऐसी फिल्मों के माध्यम से हम आम जनता के जीवन के सच्चाई से रूबरू होते हैं. ये फ़िल्में मुख्य धारा की फिल्म के इत्तर जनता के सवालों, इज्जत से जीने के अधिकारों, प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय जनता के मालिकाना हकों, दलित- शोषितों के मानव अधिकारों, और पर्यावरण एवं विकास पर जन तरफदारी करती हैं. ये फ़िल्में देश में बन रहे बड़े बांधों एवं कारपोरेट विकास के लिए अंधाधुंध किये जा रहे खनन कार्यों पर सवालिया निशाँ लगाती हैं. इन फिल्मों के निर्माण और स्क्रीनिंग से सरकार की कुर्सियां हिलने लगती हैं. इसलिए ऐसी फिल्मों को सेंसर बोर्ड पास भी नहीं करती हैं, क्योंकि ये प्रतिरोध की सिनेमा होती हैं. ये फ़िल्में मानवीय मूल्यों को सहेजकर रखने की लड़ाई होती है और इस लड़ाई में फिल्म के असली किरदार जनता होती है. यही विशेष कारण है की इन फिल्मों को सिनेमा घरों में दिखाई नहीं जाती है. इसे फिल्मकारों को ही अपने प्रयास से जनता के बीच गली-मोहल्लों कस्बों और गाँव में दिखानी पड़ती है. उन्हें अपने प्रयास से फिल्मों का निर्माण, वितरण एवं प्रदर्शन करना पड़ता है. साधारणतः ऐसी फ़िल्में बगैर टिकट के ही दिखानी पड़ती है. यानी उन्हें दर्शक भी खुद तैयार करनी पड़ती है. अगर हम प्रतिरोध की सिनेमा को झारखण्ड के परिप्रेक्ष्य में देखें तो इसकी शुरुआत ८० के दशक में ही हो चुकी थी. इस दशक में वृतचित्र फिल्मकार मंजीरा दत्ता ने बाबूलाल भुइयां की कुर्बानी बनायी थी जो एक कोयला मजदूर की ह्त्या पर आधारित फिल्म थी. इसी दशक में चांडिल और इचा खरकई बड़े बाँध के खिलाफ वसुधा जोशी और रंजन पालित ने फोलो द रेनबो फिल्म बनाकर जनता के संघर्ष को आगे बढाया. ९० के दशक में नयी आर्थिक नीति और उदारीकरण की नीति लागू होने के कारण झारखण्ड के कई इलाके अपने जल जंगल और जमीन बचाने के लिए आंदोलनरत थे, ऐसे दौर में एक प्रख्यात वृतचित्र फिल्म निर्माता- निर्देशक श्री प्रकाश ने कई फ़िल्में बनायी. १९९४ में उनहोंने लातेहार और गुमला जिले के पठार में पायलेट प्रोजेक्ट नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज, जिससे २४५ गाँव का विस्थापन होता, के ऊपर किसकी रक्षा फिल्म बनायी. १९९५ में उनहोंने कोइलकारो जल विद्युत परियोजना के खिलाफ १४२ गाँव को उजड़ने से बचाने के लिए उनके आन्दोलन पर ओडो मियाद उलगुलान फिल्म बनायी. पूर्वी सिंहभूम के जादूगोड़ा में युरेनियम माइनिंग से होनेवाले विकिरनीय प्रभाव को उजागर करने के लिए उनहोंने रागी काना को बोंगा बुरु फिल्म बनायी. हजारीबाग में कोयला खनन के ऊपर पर्यावरण एवं विस्थापन की समस्या पर “फायर विदिन “बनाया. इसी वैकल्पिक फिल्म विधा को आगे बढाते हुए मेघनाथ के साथ मैंने भी जनहक के सवालों पर कई फ़िल्में बनायी.९० के दशक में लातेहार जिलान्तर्गत महुआडांड़ प्रखंड के चिरोपाट में नागेसियाओं ने हिंडाल्को कंपनी की नींद हराम कर रखी थी. वहाँ लम्बे समय से बोक्साईट खनन के खिलाफ लड़ाई चल रही थी.छोटे समूह के नागेसियाओं ने एक बड़ी माइनिंग कंपनी को पानी पिला दिया था. उनके इस धरती माँ बचाने की लड़ाई को जोहार करने के लिए हमने १९९७ में जहां चींटी लड़ी हाथी से फिल्म बनायी. बड़े बाँध के सवाल पर कोइल्कारो आन्दोलन एक महत्वपूर्ण आन्दोलन है. यह १९७० के दशक से ही चली आ रही है. इस आन्दोलन को कुचलने के लिए नवनिर्मित झारखण्ड राज्य के भाजपा सरकार ने शांतिपूर्ण तरीके से विरोध कर रहे हजारों जनता पर गोलियां चलाई जिससे मौके पर ही ८ लोगों की मौत हो गयी. यह उदारीकरण का दौर था.सभी राज्यों में जहां प्राकृतिक संपदा भरे पड़े हैं,वहाँ भी ऐसी ही राजकीय दमन चल रही थी. बन्दूक के नाल से राज्य के विकास का सपना देखा जा रहा था. वैसे ३-४ राज्यों उड़ीसा, म.प्र.,छ.ग. एवं गुजरात का शोध कर हमने २००२ में विकास बन्दूक के नाल से बनायी. झारखण्ड, उड़ीसा,प.बं., छ.ग., में इस समय स्पंज आयरन के कारखाने कुकुरमुत्ते की तरह उग रहे थे.स्पंज आयरन फैक्ट्री से होने वाले पर्यावरण और जन जीवन पर पडनेवाले