प्रकृति का उपहार है आदिवासी आहार परंपरा

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-वंदना टेटे

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भारत एक कृषि प्रधान देश है जहां खेती मानसून पर निर्भर करती है। मुख्यतः धान, गेहूँ, मकई, ज्वार, बाजरे और दलहन में अरहर, मसूर, मूंग, चना, उड़द की खेती ज्यादातर होती है। किन्तु कई प्रदेश ऐसे हैं जहां इनके अलावे मड़ुवा, गोंदली, कुरथी, खेसारी की फसल होती है। जैसे हमारा झारखंड। खेती के साथ ही कई फल-फूल हमारे खाद्य-सामग्री में शामिल हैं- महुआ, सखुआ, कुसुम, कटहल, डुम्बर, मुनगा आदि। वहीं स्थानीय तेलहन की फसलें- जैसे - डोरी (महुए के फल का तेल), कुसुम, सरसों, नारियल, मूंगफली, सरगुजा, सोयाबीन बहुतायत से उपजायी जाती है और दैनदिनी जीवनचर्या में हम इनका प्रयोग करते हैं। उपज, आहार शैली, भौगोलिक परिवेश और स्वास्थ्य का आपस में गहरा संबंध होता है। हमारा शरीर भी एक खास जलवायु का अभ्यस्त होता है। एक विशेष जलवायु और भौगोलिक परिवेश में उपलब्धता के आधार पर सृष्टि (प्रकृति) इंसान के लिए विकल्प उपलब्ध कराती है और व्यक्ति को पोषण देती और स्वस्थ रखती है। हालांकि इंसान ने सभ्यता और तकनीकी विकास से भौगोलिक परिवेश और जलवायु सीमाओं से खुद को स्वनिर्भर बनाने की हरसंभव कोशिश की है और इस दिशा में आज भी प्रयत्नशील है। परंतु पूंजी की प्रधानता और असमानता पर टिकी सभ्यता की इस व्यवस्था में विकास का फल सभी को सहजता के साथ उपलब्ध नहीं है। अपनी आवश्यकता के लिए आम व्यक्ति अभी भी अपने प्राकृतिक-भौगोलिक परिवेश में उपलब्ध चीजों पर निर्भर है। पर बदलते वैश्विक परिवेश में अब उसे यहां भी जद्दोजहद करनी पड़ रही है। क्योंकि जो वैज्ञानिक अविष्कार, रसायनिक खाद, और बीज हाईब्रिड फसलों के रूप में लोगों के बीच लाये गए। उसने फायदे के साथ-साथ नुकसान भी पहुंचाया। जैसे रसायनिक खादों को सरकार ने मुफ्त, कम कीमत या सब्सीडी देकर ज्यादा फसल की उम्मीद में खेतों में डलवाया जिससे जैव विविधता पर आधारित परंपरागत खेती प्रक्रिया बाधित हुई। लंबे समय के रसायनिक खादों के प्रयोगों ने जैविक खाद की जगह ली, जिसने गोबर खाद, केचुवों को मारा एवं मिट्टी खराब की। फसल की प्राकृतिक सुरक्षा प्रणाली को तो नुकसान पहुंचाया ही इंसान के लिए सर्वसुलभ प्रोटीन के स्रोत- घोंघी, मछलियां आदि को भी खत्म किया। वहीं हाइब्रीड बीजों ने फसल तो दिए पर स्थानीय बीजों को खत्म किया। अब जाकर लोगों ने हाइब्रीड फसल और स्थानीय बीज से उपजे फसल के अंतर, स्वाद, रखरखाव, फायदे को समझा। और अब लोग वापस जैविक खेती की ओर लौट रहे हैं। अर्थात् गोबर, कंचुए, घोंघें, मछली आदि मिलकर जो पारिस्थिकीय तंत्र का निर्माण करते थे, जो विविध तरीकों से लाभाकारी था, उसकी वापसी चाहने लगे हैं। झारखंड आदिवासी बहुल राज्य है, जिसका इतिहास, संस्कृति सब पुरखा गीतों, कहानियों में मौखिक परंपरा में ही विस्तृत विस्तार रखता है। इसके माध्यम से ही जगल पहाड़ों में निवास करनेवाले समुदाय पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपने ज्ञान को संचारित करते रहे हैं। वाचिकता के इसी स्रोत में झारखंड के निवासियों का सुख-दुख, खान-पान, जीवन शैली, खाद्य परम्परा का भंडार सुरक्षित व उपलब्ध है। लायलाय के डेलकिञ सिलो के डेलकिञ अना मे सेरे आजीडय बासी डाः तेरे बेतोड बुङ इघय रो लाःता अना सेरे आजीडय बासी डाः तेरेम अर्थात् थका हरा देवर खेत में हल जोत-कोड़ के लौटा है। वह अपनी भाभी से कहता है, भाभी बासी पानी दो, प्यास से जी कैसा तो हो रहा है। बासी पानी यानी गर्मी के दिनों में रात के बचे भात में पानी डाल दिया जाता है। जिसे दूसरे दिन उसे खाया व उसके पानी पीया जाता है। वह पानी पेट को ठंडा रखता है। उसके पीने से लू नहीं लगती। किन्तु हाइब्रीड धान से बने भात में यह गुण नहीं है जिससे उसका यह इस्तेमाल नहीं हो पाता। मुसा को बुढ़ा पेः जो उम्बोःड़िज बेतोड् बुङ को इघय रो लाःता कुदा कोलोंग लाडे से कंड़ायबोः ञोंगेनांग रो गिताः जोमनानांग बहुतायत से धान-चावल उपजाने वाले झारखंड में मुख्य आहार चावल है। समूची दुनिया में भी सबसे ज्यादा धान की खेती होती है। झारखंड के गांवों में आज भी तीनों समय (नाश्ता, कलेवा और रात के खाने) में भात ही खाया जाता है। शहरीकरण होने के बाद भी अधिकांश लोग ये कहते हैं कि एक पहर तो भात चाहिए ही। इस गीत में एक पत्नी अपने पति से कहती है आज खाने को भात नहीं है। भूख से मन कैसा तो हो रहा है। पति पत्नी से कहता है मड़ुवे की रोटी बनाओ, खायेंगे और सो जाएंगे। मड़ुआ की फसल झारखंड, छत्तीसगढ़ और कई राज्यों में की जाती रही है। लोग मड़ुवे का लट्ठा महुवे के साथ मिलाकर उसकी छिलका रोटी, थपड़ी रोटी, डुम्बु आदि बना कर खाते हैं। एक समय मुख्यधारा का समाज, बाहरी लोग मड़ुवे के रंग को देखकर इसे हेय समझते थे, गरीबों का अपौष्टिक खाना समझते थे। कहते थे इसे खाने से रंग काला होगा। लेकिन आज इसके गुण की वजह से जहां यह मेडिसिनल फूड के रूप में खाया जा रहा है वहीं आदिवासी इसे बेकार खाना समझा दिये जाने के डर से खाना छोड़ रहे हैं। बड़े शहरों के मार्केट, मल्टीफ्लेक्सों, मॉल में, आधुनिक रेस्टोरेंटों में अपने औषधीय गुणों की वजह से अब मड़ुआ की रोटी और उससे बने व्यंजन महंगे दामों पर खूब बिक रहे हैं। डायविटीज के मरीजों के लिए तो यह अचूक दवा है। इसका हॉर्लिक्स भी अब मार्केट में आ चुका है। आमते किमिन जुंङतींग, गुडुबुअः डुम्बु बोनेता नोउम्बों इस गीत में में, जिसमें परम्परा भी है जिज्ञासा भी, ज्ञान की परीक्षा हो रही है। बहु को पूछा जा रहा है कि गोंदली का डुम्बु बनता है या नहीं। पहाड़ी इलाका होने के कारण झारखंड में बारिश का पानी नदी-नालों से बह जाता है। ऐसे में कम पानी वाली फसल गोंदली, मड़ुवा, गोड़ा, धान उपजाये जाते हैं। पहाड़ों में या ऊंचाई पर रहने वाले लोग मकई, गंगई जैसी फसल उपजाते हैं। आंगन में मुनगा (सहजन) के फूल, फल, पत्तियां लोगों को सहज उपलब्ध होता है जो कि कई रोगों से उन्हें बचाता है। यह ब्लडप्रेशर की दवा है। इसका जड़ भी दवा के रूप में काम मे लिया जाता है। झारखंड के निवासियों के आंगन में यह बहुतायत से होता है। आदिवासी इसके कोमल पत्तों को सुखा कर मांड़