अहिंसक संस्कृति है हमारी

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-मनोनीत रेबेका तोपनो

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ओ बिरसा, तुम्हारी बंशी और बेला का स्वर वन में थिरकन पैदा कर देता है। उसका रस लेने ... खूंखार पशु भी अपने-अपने घरों से निकल आते हैं।’ यह एक मुंडारी लोकगीत है। पुरखों ने इस गीत को उलगुलान काल में रचा है। यह गीत हमें बिरसा के और प्रकारांतर से मुंडा आदिवासी समुदाय की उस मूल प्रवृति तक ले जाता है, जहां हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं है। यह गीत हमें बताता है कि आदिवासी समुदाय मूलतः अहिंसक है और उसका जीवनदर्शन बांसुरी के उस संगीत की तरह है, जिसे सुनकर खूंखार से खूंखार जानवर भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाते। इस गीत में बिरसा की छवि बुद्ध की तरह है, जिनके उपदेशों को सुनकर अपराधियों और हत्यारों का हृदय बदल जाता था। मुंडारी लोकगीतों पर हुए अध्ययन इस मजबूत सांस्कृतिक और दार्शनिक पक्ष का उल्लेख नहीं करते। भारत के आदिवासी समुदाय अपनी स्वतंत्रता, परिश्रमता और साहसिकता के लिए जाने जाते हैं। इनमें से एक हैं झारखंड के मुंडा आदिवासी। उन्नीसवीं सदी में हुए लगातार के ब्रिटिश विरोधी संघर्षों के कारण मुंडा आदिवासी समुदाय का इतिहास में विशिष्ट स्थान है। 1900 में बिरसा मुंडा के नेतृत्व में हुई उपनिवेश विरोधी लड़ाई ‘उलगुलान’ से आज पूरी दुनिया परिचित है। उलगुलान के नायक बिरसा मुंडा पूरे देश के समस्त आदिवासियों का ही नहीं बल्कि अखिल भारतीय स्तर पर हमारे राष्ट्रीय स्वाभिमान बने हुए हैं। औपनिवेशिक व्यवस्था और विदेशी शक्तियों के खिलाफ झारखंड के मुंडा आदिवासी समुदाय में यह राष्ट्रीय चेतना सदैव विद्यमान रही है। प्रकृति के सभी आयामों के साथ सदियों से रहते आए मुंडा समुदाय अपनी भाषा, संस्कृति, धर्म, लोक परंपरा और जंगल-जमीन व मातृभूमि की रक्षा के प्राथमिक कर्तव्य से इतिहास के किसी दौर में पीछे नहीं हटे हैं। उनकी यह अखंड भारतीय आदिवासी चेतना मुंडा लोकगीतों में हमेशा अभिव्यक्ति पाती रही है। क्रांतिकारी बिरसा के उलगुलान के दौरान भी ऐसे सैंकड़ों लोकगीतों का सृजन हुआ जिसमें धर्म, संस्कृति और मातृभूमि से संबंधित वर्णन हैं और इस हेतु जान न्योछावर कर देने का आह्वान तथा संकल्प भी। आदिवासी लोकगीतों और उनकी वाचिक परंपरा के संकलन और डॉक्युमेंटेशन का कार्य अंगरेज अधिकारियों और ईसाई मिशनरियों ने सर्वप्रथम आरंभ किया। इनमें रिजले, हंटर, डालटन, पी. ओ. बोडिंग, डब्ल्यू जी आर्चर, फादर हौफमैन, पी. पोनेट आदि प्रमुख हैं। भारतीय स्कॉलरों में सुनीति कुमार चटर्जी, गगन चंद्र बनर्जी, राखाल दास हालदार, शरतचंद्र राय, निर्मल कुमार बोस, जयदेव दास, कुमार सुरेश सिंह, जगदीश त्रिगुणायत आदि उल्लेखनीय हैं जिन्होंने मुंडारी लोक साहित्य और वाचिक इतिहास को सहेजने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। इसके अतिरिक्त बीसवीं सदी के मध्य में कानूराम देवगम, भैयाराम मुंडा, दुलायचंद्र मुंडा, डॉ. रामदयाल मुंडा, रेमिस कंडुलना जैसे आदिवासी लेखकों और बुद्धिजीवियों ने मुंडा लोकसाहित्य को लिखित रूप दिया है। इस तरह मुंडा आदिवासियों के लोक साहित्य अर्थात् लोक कथाओं, लोक गीतों, मुहावरों और वाचिक परंपरा के अंतर्गत आने वाले धार्मिक-सांस्कृतिक संबंधी अन्य साहित्यिक रूपों को भी संकलित करने का महत्वपूर्ण कार्य हुआ है। परंतु मुंडारी लोकगीतों पर हुआ सारा संकलन एवं अध्ययन कार्य या तो नृतात्विक है या फिर भाषिक। मुंडाओं के धार्मिक विश्वास, सांस्कृतिक परंपराओं और सामाजिक चेतना की दृष्टि से उनका न तो वर्गीकरण हुआ है और न राष्ट्रीय चेतना व अखंडता के परिप्रेक्ष्य में उनका अध्ययन हुआ है। जबकि इतिहास और मुंडारी लोकगीतों का अवलोकन में सहज रूप से ही उनकी परंपरा में सदियों से व्याप्त अखंड राष्ट्रीय चेतना की स्पष्ट झांकी दिखाई पड़ती है। इस पक्ष पर भी अध्येताओं ने गौर नहीं किया कि मुंडा आदिवासियों की राष्ट्रीय चेतना एकांगी नहीं है। वह बहुआयामी है जो धर्म, सार्वभौमिक सत्ता अर्थात् राष्ट्रीय स्वाधीनता (अबुआ दिसुम अबुआ राइज-हमारा देश हमारा राज), भाषायी पहचान और सांस्कृतिक अस्मिता के प्रमुख तत्वों का समुच्चय है। राष्ट्रीय चेतना के इस बहुआयामी पक्ष को विदेशी प्रभाव और पूर्वाग्रहों के कारण नजरअंदाज किया गया। बिरसा मुंडा और उलगुलान पर किये गये अपने अध्ययन, जो बाद में हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुई, में कुमार सुरेश सिंह ने बहुत सारे उलगुलान गीतों को प्रस्तुत किया है। एक गीत है - ‘ओ भक्त मुंडाओं! तुम यह सब सीख लो। तुम सब विश्व-धर्म सीखो। मिट्टी के दीपक की लौ की तरह हमारे शब्द ज्योति फैलाते हैं।’ (पृ. 279) इस वाचिक लोकगीत में मुंडाओं से उनके धार्मिक विश्वास और जीवनदर्शन पर दृढ़ बने रहने की बात की गई है। ‘विश्वधर्म’ अर्थात् आदि धर्म जो मुंडाओं का, सभी आदिवासियों का मूल धर्म है। औपनिवेशिक काल में झारखंड के आदिवासी सबसे ज्यादा शोषित थे। क्योंकि झारखंड क्षेत्र खनिज एवं वन्य संसाधनों से भरा पड़ा था। लेकिन इससे भी बड़ा शोषण धार्मिक ओर सांस्कृतिक था। अंग्रेज शासक, अफसर और देशी जमींदार-महाजन आदिवासियों को ‘कोल’ (सूअर) कहते थे। जंगली और असभ्य मानकर जबरन संस्कृतिकरण कर रहे थे। यह आर्थिक दोहन और लूट से ज्यादा घातक मामला था। इसीलिए बिरसा ने धार्मिक आंदोलन चलाया। उन्होंने विश्वधर्म यानी आदिधर्म की बात की। उन्होंने चर्च और मिशन स्कूल में अंग्रेजों को सुना था, तो सनातनी आनंद पांड़ (स्वांसी जाति) से भी जानकारी पायी थी। उनका अनुभव था कि चाहे वह चर्च हो या जमींदार-महाजन, इन सभी के धर्म से, इन सबकी भाषा से, इन दोनों की संस्कृति से मुंडा (आदिवासी) लोग खतरे में हैं। ‘तुमने धर्म-शिक्षा दी कि सबका ईश्वर एक सिङबोङा है। तुमने अपने को धरती का पिता बतलाया हम अंत तक तुम्हारी शिक्षा पर चलेंगे।’ (पृ. 263) ऐसा ही दृष्टांत हमें उरांव आदिवासी समुदाय में भी मिलता है। जब प्रथम विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि में आज के गुमला क्षेत्र में उरांव आदिवासियों ने भगत आंदोलन चलाया। इसे हम इतिहास में ‘टाना भगत’ आंदोलन के नाम से जानते हैं। 1910-12 में