समेकित विकास की अवधारणा

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक- अयोध्यानाथ मिश्र

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बड़ी तेजी से वैश्विक-पारिस्थितिक परावर्तन हो रहा है। इसका परिणाम सबकुछ ठीक-ठाक हीं नहीं है। मान्यतायें (काल की कसौटी पर) टूट रही हैं, वर्जनायें विखर रही हैं, और चारों ओर इसके अच्छे बुरे फलाफल दिखाई दे रहे हैं। तेजी से बदलते परिवेश ने कुछ को बहा लिया, कुछ को झकझोर दिया है तो कुछ के चिंतन को विवश कर दिया है। शोर मचा हैं, विकास....... विकास........। आखिर यह ‘‘विकास’’ किसका, कितना और कैसा। जरा सोचें, आखिर क्या है, यह विकास और इसका प्रगति या प्रगतिशीलता से क्या संबंध हैं। विकास और प्रगति, पता नहीं दोनों का मेल क्यों नहीं बैठता। यदि चतुर्दिक विकास की तख्तियां लटक गयी हैं तो प्रगति अपिहार्य प्रतिबिंबित होना चाहिये। जीवन का कोई कोना अछूता नहीं रहना चाहिए। विकास और प्रगति मानव मूल्यों को सशक्त एवं प्रखर बनाने के लिये हीं होती होंगी। यदि समृद्धि आयी हैं तो रौशन हुआ होगा, दयार। चेहरे पर चमक और मन में आत्म विश्वास भी आया होगा या आना चाहिए। जब विश्वास, वैचारिक दृढ़ता तथा संकल्प आहीं गये तो कमी किस बात की । समाज की सारी जड़ता दूर हो जानी चाहिए, न दैन्यं न पलायनम् । न कहीं भूख होनी चाहिए न गरीब और नहीं इनका भायरल। इस चकाचौंध में निश्चित रूप से रोशनी है, पर उसके लिये आंखे चाहिए। चाहिये समय के साथ संतुलन और ‘स्व’ की योजना। वर्षो से विकास के प्रति सभी आर्थिक पक्ष प्रयत्नशील हैं, पर क्यों नहीं होता अपेक्षित विकास ? बड़ी तेजी से कारपोरेटाईजेशन ने, उदारीकरण ने और निजीकरण ने रोजगार के अवसर उपलब्ध करायें हैं, कैरियर डेवलप करने का मौका मिला है। इस दौर में पुरूष-महिला सभी सुनहरे अवसर और आकाश कुसुम तोड़ने में लगे हैं। कभी कम्प्यूटर, कभी अभियांत्रिकी, कभी तरह तरह के प्रबंधन तो कभी एग्रो हार्टी- डेयरी कंसेप्ट की ओर। पूरे जीवन दर्शन, प्रबंधन की सूई लक्ष्य की ओर। पर क्या अबाध गति ने इस में चार चांद लगा दिया है ? युवा वर्ग तेजी से इस जीवन प्रबंधन की ओर भाग रहा है, लाभ भी हैं, लोभ भी। इतना ही नहीं प्रबंधन की यह आंधी बंद खिड़कियों की परवा किये बिना हर आंगन में दस्तक दे चुकी हैं। किशोर जी की मेघावी बिटिया छठे वर्ग में पहुंच गयी। उनकी परेशानी है कि आगे क्या पढ़े, कैसे पढ़े कि गाड़ी बिना विराम के चोटी पर पहुंच जाय। मेरे एक मित्र का लाड़ला आई0आइ0टी0 में नहीं आया, विट्स पिलानी में क्यों आया, परेशानी का सबब है। ईमानदार बाप का बेटा जीमैट में आया तो, पर विदेश के प्रबंधन संस्थान में नाम लिखाने का 35 लाख कहां से लायें। देशी बैंक 20 से अधिक देते नहीं। शर्मा जी का पुत्र इस साल नाम नहीं लिखाकर तैयारी में फिर लग गया। एक साल चला गया 12ग्30त्र 3.60 लाख। एक जमात वह भी है जो स्वनामधन्य, स्कूलों से नहीं निकली पर अंक अच्छा, मिला। उनके पैजामे में चमक कम है, हेयर स्टाईल गांव का है, और पैसे में उसका किसान-मजदूर बाप फिसड्डी। बैंक उसे कर्ज देंगे क्या, और यदि किसी ने दे दिया तो भविष्य कितना सुरक्षित। उसे कौन बताये, मत बेचो मां के गहने, तीन फसली खेत और झुलसने मत दो सपनों को, बहुत स्कोप हैं, आगे। हां चमत्कारी विज्ञापन शक्ति के झांसे में भी मत आओ। आज कृषि, वागवानी, मत्स्यपालन, रेशम, हस्तशिल्प, पशुपालन, फल-फूल की खेती, उन्नत किस्म का विचड़ा-पौधा उत्पादन कम महत्व का नहीं। सहभागी व्यवसाय, उद्यम-उद्यमिता का बाजार बहुत बड़ा है। निरंतर सुनहरे सपनों का सब्जवाग दिखाने वाले लुभावने अवसर-गरीब को कहीं का नहीं छोड़ते। उसे कौन बताये कि तीन बिग्धा खेत का जैविक तकनीक आधारित पशुपालन, मत्स्यपालन समन्वित संसाधन छोटे परिवार को थोड़ी मेहनत में सुखी जीवन दे सकते हैं। फूलों, फलों, औषधियों, बीजो, पौधों की खेती आर्थिक स्वावलंबन दिला सकती है। गांव की कला हस्तकला, परम्परागत हुनर का वैश्विक बाजार ह। मधुवनी पेंटिंग और कुचाई शिल्क किसी प्रचार का मोहताज नहीं। खाद्य प्रसंस्करण स्वयं सहायता समूहों के बस की वस्तु है। अल्प प्रशिक्षण और अल्प लागत से भागती दुनिया को भारत के गरीब हाथ सुस्वादु खाद्य परोस सकते हैं। रोज गली मुहल्लों में बुलबुले की तरह नीजी स्कूल खुल रहें हैं, पर क्या उनमें नर्सरी, प्राइमरी या कला-कौशल प्रशिक्षित शिक्षक-शिक्षिकायें है ? टाइपराइटर कूड़े पर गया और मंदगति कम्प्यूटर टंकण चारों ओर फैल रहा हैं यहां भी हिन्दी अंग्रेजी जानने वाले आपरेटर को रोजगार की कमी नहीं है। कुशल हाथों की सेवा के क्षेत्रों में बहुत मांग है। फूलों एवं फलों की खेती ने कलेवर बदल दिया हैं। केवल इन्हें चाहियें कुशल यातायात और बाजार। शायद इसमें सरकार की भूमिका आगे आये। सहभागी विकास यही तो है। बहुत प्रकार का उद्योग पुनः गांवों की और पसर सकता है, चाहे रेडीमेड गारमेंट ही क्यों नहीं। 1980 के दशक में एक सुपरिचित महिला ने मशीन से स्वेटर बुनकर अपने परिवार को आर्थिक तंगी से बचाया था। वह दूकानों से अन लेती और मांग के अनुसार स्वेटर आदि आपूर्ति करती। एक बहुत बड़ा क्षेत्र हैं स्वास्थ्य सेवाओं का। किसी वरिष्ठ समाजसेवी चिकित्सक ने बताया कि 70 प्रतिशत स्वास्थ्य समस्याओं का निदान केवल दैनिक चर्या खान-पान एवं सदव्यवहार है। केवल 30 प्रतिशत में ही क्लिनिकल समर्थन या विशेषज्ञों की आवश्यकता है। अब यह जागृति कौन लाये ? कुण्डलीमार कर एक निजी व्यवस्था बैठी है, जो बिना शुल्क के बातें तक नहीं करती, तो दूसरी सरकारी व्यवस्था ने विश्वसनीयता ही खो दिया है। यहां सेवा का क्षेत्र बहुत विराट ह,ै पर सेवा की संस्कृति उचट गयी है। चारो ओर डाक्टरों, विशेषज्ञों, ढांचागत व्यवस्था की कमी का रोना है। जरूरत है, बीच में एम0बी0बी0एस0 से कम लागत के मध्यमवर्गीय कोर्स की जो आसानी से मलेरिया, डायरिया की दवा तो गांव-गांव बांट सके। समरस हो सके गांव से, गरीब से। इसी प्रकार वैश्विक मानकों के अनुसार जांच कर्मियों की नितांत कमी है। भगवान भरोसे है। हर डॉक्टर का पेटेन्ट जांच घर अर्थात स्वास्थ्य सेवाओं में सेवायोजन, स्वरोजगार के अ