आजादी आर आनद

|

तस्वीर द्वारा-

|

लेखक-विनाद कुमार

image

image

मानवीय गरिमा के साथ जीने के लिए आवश्यक है आजीविका, आजादी और आनंद. जीवन का आधार है आजीविका. यानी जीने के संसाधन- जल, जंगल, जमीन या ऐसा कोई ऐसा काम जिससे इतना अर्जन हो कि हम जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा कर सकें. लेकिन मनुष्य जीवन के लिए सिर्फ इतना ही जरूरी नहीं. वह आजीविका के साथ आजादी की भी कामना करता है. बहुत सारे लोगों की धारणा है कि अंग्रेजों के जमाने में जीवन इतना कठिन नहीं था. न इतनी मंहगाई थी, न इतना भ्रष्टाचार था और न इतनी अराजकता थी. लेकिन इसके बावजूद कोई यह नहीं कहता कि अंग्रेजों की गुलामी का वह दौर अच्छा था. यानी, आजीविका के साथ हमें आजादी भी चाहिए. अपना भविष्य चुनने की आजादी, अपने विवेक से चलने की आजादी, अपने समय के सदुपयोग की आजादी. और इन दोनों के अलावा चाहिए आनंद. श्रम का आनंद, सृजन का आनंद. आप जो काम करते हैं वह आपके मनोनुकूल न हो, उसे करने में आपको सार्थकता का अनुभव न हो, आनंद की अनुभूति नहीं हो तो वह काम आपके लिए उबाउ और बोझ बन जाता है. विडंबना यह कि जिस आदिवासी समाजिक-आर्थिक व्यवस्था को हम पिछड़ा समझते हैं, वहां आज भी विपन्नता के बावजूद जीवन के संसाधन हैं, अपने तरीके से जीने की आजादी है और है श्रम-सृजन का आनंद. वहीं आदिवासी समाज के बाहर आबादी के एक बड़े हिस्से के पास न तो जीवन जीने के संसाधन रहे हैं और न आजादी. ज्यादा सर खपाने की जरूरत नहीं, वर्णाश्रम व्यवस्था से आक्रांत हिंदू समाज में इतिहास के लंबे दौर में सवर्ण जातियों को छोड़ पिछड़ी, दलित आबादी के पास जीवन के संसाधन के नाम पर बेगारी, सवर्णों की चाकरी के सिवा क्या था? और जीवन के संसाधन या आजीविका के बगैर आजादी कहां से आये. जाहिर है, इन दोनों के अभाव में आनंद की तो उम्मीद ही नहीं की जा सकती. और जिस थोड़ी सी आबादी के पास जीवन के संसाधन और आजादी थी, वह भी प्रतिस्पर्धा के इस आधुनिक दौर में असंभव नहीं तो मुश्किल से मिलने वाली चीजें होती जा रही हैं. पहले आजीविका की ही बात करें. सवा सौ करोड़ की आबादी वाले इस देश में करीबन 45 लाख केंद्रीय कर्मचारी हैं. लगभग एकाध करोड़ राज्यों के सरकारी कर्मचारी. इसके अलावा अर्द्धसरकारी, सार्वजनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र में काम करने वाले अधिकतम दो करोड़ की आबादी. हमारे देश में इनकम टैक्स पेयी तबका भी लगभग इतना ही है. इन्हें हम संगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोग कह सकते हैं. इसके अलावा छोटा-मोटा रोजगार करके जीवन चलाने वाले लोग, खेती करने वाले और भूमिहीन मजदूर, दिहाड़ी पर खटने वाले लोग. कुल आबादी का लगभग 95 फीसदी असंगठित क्षेत्र में आता है. अलग-अलग राज्यों के आकड़ों में थोड़ा-बहुत अंतर है, लेकिन मोटे तौर पर असंगठित क्षेत्र की पचास फीसदी आबादी गरीबी रेखा के नीचे रहती है. जो गरीबी रेखा के नीचे हैं, उनकी बात जाने दें, गरीबी रेखा के ऊपर रहने वाले असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले और संगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के बीच वेतन सुविधओं में विशाल अंतर है. विषमता की खाई इतनी चौड़ी है जिसे पाटा नहीं जा सकता और आजादी के बाद के वर्षों में वह बढ़ता ही गया है. अब आइये जरा आजादी की बात करें. खाते पीते समाज के बुद्विजीवी अपने देश के लोकतंत्र को लेकर बेहद खुशगवारी का अनुभव करते हैं. लेकिन इस बात को समझना चाहिए कि आर्थिक आजादी के बगैर आजादी और अन्य मौलिक अधिकारों का मोल नहीं. यह बात कई बार खुल कर सामने आ चुकी है कि देश के अधिकतर जेलों में क्षमता से दो गुने-तीन गुने कैदी बंद हैं और उनमें 80 फीसदी से भी अधिक विचाराधीन कैदी. उनमें से अधिकांश ऐसे जो बगैर किसी बहस-सुनवाई के अपना अपराध स्वीकार भी कर लें तो उन्हें इतनी सजा मिलेगी जिससे अधिक की सजा वे काट चुके हैं. जाहिर है ऐसे लोगों में अधिकतर गरीब-गुरबा लोग हैं. लेकिन यहां हम आजीविका के संदर्भ में आजादी की बात कर रहे हैं. और उस लिहाज से देखें तो सरकारी कर्मचारियों ; जिन्हें नौकरी खोने का खौफ नहीं, को छोड़ सभी ने आजीविका के लिए व्यक्तिगत आजादी से समझौता किया है. नौकरी का अर्थ ही पराधीनता बन गयी है. एक जमाने में काम के घंटे, साप्ताहिक अवकाश, उपार्जित अवकाश आदि के लिए मजदूर वर्ग ने लंबी लड़ाई लड़ी थी और उसमें जीत भी हासिल की थी. लेकिन अब उन सुविधाओं और सेवा शर्तों का उपभोग संगठित क्षेत्र के लोग कर रहे हैं. असंगठित क्षेत्र के लिए तो कोई श्रम कानून रह ही नहीं गया है. जबकि संगठित क्षेत्र के बहुत सारे लोगों ने प्रतिस्पर्धा की वजह से स्वयं अपनी आजादी को सीमित कर लिया है. आईटी क्षेत्र की अभी धूम है. नौकरी शुरु करने वाले अधिकांश प्रोफेशनल 25-30 हजार प्रति माह के न्यूनतम वेतन से अपनी नौकरी शुरु करते हैं. लेकिन उनके काम का कोई निश्चित घंटे नहीं. सामान्यतः सुबह आठ बजे से उनकी दिनचर्या शुरु होती है जो रात सात-आठ बजे तक समाप्त होती है. उस पर भी लगातार इस बात का टेंशन कि उनका बॉस उनके काम से प्रसन्न है या नहीं. और काम में आनंद, सृजन का सुख तो कब का तिरोहित हो चुका है. मार्क्स ने दास कैपिटल में बड़े विस्तार से इस बात की चर्चा की है कि पूंजीवादी व्यवस्था किस तरह हमारी सृजनशीलता का नाश करती है. संपूर्णता के बजाय किस तरह हमसे टुकड़ों में यह व्यवस्था काम लेती है. इस कदर कि आपको हर वक्त यह एहसास होगा कि आप कोई स्वतंत्र इकाई नहीं, एक विशाल मशीन का छोटा सा पुर्जा मात्रा हैं और काम के नाम पर एक विशाल मशीन का कोई छोटा सा पुर्जा ही बना रहे हैं. आप सही अर्थों में एक पीस रेटेड वर्कर बन कर रह जाते हैं. वह कार बनाने की कंपनी हो या फिर टेलीवीजन बनाने की कंपनी, वहां काम करने वाला कर्मचारी टेलीवीजन नहीं बनाता, कार नहीं बनाता. वह उसका कोई छोटा सा पुर्जा बनाता है. आईटी की अभी बड़ी धूम है. लेकिन तह में जाइये तो वहां भी आप किसी तरह का सृजनात्मक काम क्या, उत्पादन भी नहीं करते. आप यदि प्रोग्रामर हैं तो आपको कुछ करने का आनंद मिल सकता है, वरना आप लगभग वही काम कर रहे हैं जो किसी जमाने में सेठ के यहां काम करने वाला मुंशी कर