संताल परगना की विलुप्त आदिवासी कठपुतली लोक कला

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-अषोक सिंह

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प्रकृति ने जहाँ कला को विकसित करने का कौषल दिया है, वहीं बदलाव के इस दौर में उसके गुम या विलुप्त हो जाने के खतरे और उससे संबंधित कलाकृतियों को नष्ट करने के अवयव भी प्रदान किये हैं। ऐसे में उन अवयवों से कलाकृतियों एवं ऐतिहासिक धरोहरों का संरक्षण जरूरी है। कला का निर्माण या सृजन जितना महत्वपूर्ण है उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण उसको संरक्षित व संवर्द्धित करना है ताकि न सिर्फ उसको नष्ट होने से बचाया जा सके बल्कि उसको पुनर्जिवित और विकसित भी किया जा सके। परम्परागत आदिवासी कठपुतली लोक कला ‘चदर-बदर’के संबंध में ऐसा ही कुछ कहा जा सकता है। जो आज न सिर्फ गुमनाम बल्कि विलुप्त प्राय हो चुकी है। ‘चदर-बदर’ संताल आदिवासी समुदाय की एक परंपरागत कठपुतली लोक कला है। यह मुख्यतः झारखण्ड के संताल परगना एवं पष्चिम बंगाल के झारखण्ड सीमावर्ती इलाके से सटे आदिवासी बहुल इलाकों में कभी प्रचलित व लोकप्रिय रही थी जो अब लगभग पिछले डेढ दषक से विलुप्त प्राय हो गई है। मूल रूप से ‘चदर-बदर’ के नाम से जानी जाने वाली यह कठपुतली आदिवासी लोक कला कहीं क्षेत्रा विषेष के क्षेत्राय टोन की वजह से ‘चादर-बादोयनी’तो कहीं ‘छादर-बादरनी’ आदि के रूप में भी बोली जाती रही है। इस संबंध में यह माना जाता है कि संताली भाषा के इस शब्द पर बंगला भाषा के प्रभाव की वजह से ऐसा देखने-सुनने को मिलता है। प्राप्त जानकारी के अनुसार इससे जुड़े कलाकार ज्यादतर इसका प्रदर्षन भादो व आष्विन मास विषेषकर दुर्गा-पूजा के आस-पास के समय में गाँव-गाँव घूम कर किया करते थे। कुछ लोगों का कहना है कि यह काम वे लोग मुख्यतः सप्तमी से दसमी तक के बीच ही किया करते थे। उसके साथ-साथ गाने बजाने वाले कलाकारों का भी एक दल साथ होता था। जो मांदर, नगाड़ा, झाल, करताल आदि के साथ-साथ अपने परम्परागत वेषभूषा में सजे-धजे होते थे। विषेषकर माथे की पगड़ी इतने कलात्मक ढंग से बंधी होती थी कि लोग उस दल से आकर्षित होते थे और पूरे गांव में उनके पीछे-पीछे घूमते थे। ये कलाकार प्रदर्षन के दौरान ‘चदर-बदर’ के चारों ओर घूम-घूम कर गीत-संगीत के साथ नाचते-गाते थे और लोगों का स्वस्थ्य मनोरंजन कर कुछ महत्वपूर्ण संदेष देने का भी काम किया करते थे। जैसा की कुछ लोगों का मानना है कि इसके मूल में मुख्यतः यह बात होती थी कि हम सब इस संसार की कठपुतलियाँ हैं, जिसका सूत्रा एक मात्रा ईष्वर के हाथों में है और उसी के इषारे पर हम सब अपना-अपना कर्तव्य कर जीवन जीते हैं। संबंधित क्षेत्रा के प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े जानकार लोग बताते हैं कि जब इससे जुड़े कलाकार गाँव-गाँव में घूम कर इसका प्रदर्षन करते थे, तो इसके एवज में लोग उन्हें अपने-अपने घरां से अनाज आदि लाकर दिया करते थे। उन अनाजों में मुख्य रूप से मकई ज्यादा मिलता था। इसकी मुख्य वजह यह थी कि वह समय भादो के अंत और आष्विन के शुरूआती माह के उन दिनों का हुआ करता था, जब खेतों में धान की फसल लहलहाती थी और लोग मकई को खेतों से लाकर अपने घर आंगन, ओसारे या फिर गांव के किसी छतनार पेड़ की छाया में बैठ सामूहिक रूप से टोकरी भर-भर मकई छुड़ाने के काम जुटे रहते थे। प्राप्त जानकारी के अनुसार प्रदर्षन के दौरान मिलने वाले अनाजों और रुपये-पैसों को वे लोग आपस में बराबर-बराबर बाँट लिया करते थे। ‘चदर-बदर’ की बनावट इतनी कलात्मक, अद्भूत और तकनीकिपूर्ण होती थी कि एक मात्रा डोरी से दर्जन भर कठपुतलियाँ अलग-अलग मुद्राआें में नृत्य करती नजर आती और जिसमें आदिवासी जीवन व संस्कृति की विविधरंगी छटा दिखती थी। कठपुतलियों की बनावट यहाँ तक कि उसकी मुखाकृतियाँ, रंग-रोगन एवं वेष-भूषा और कार्यकलाप तक संताल आदिवासी जीवन पर आधारित होते थे। इसको बनाने वाले कहीं-कहीं इससे जुड़े कलाकार खुद होते थे। तो कहीं-कहीं बनाने वाले, उसके मालिक और उसको नचाने वाले कलाकार अलग-अलग भी होते थे। आकार-प्रकार, साज-सज्जा और संचालन की तकनीक के लिहाज से सभी प्रकार की कठपुतलियों की बनावट भिन्न-भिन्न होती है। ‘चदर-बदर’ की निर्माण प्रक्रिया और बनावट अपने मूल रूप में लगभग एक होकर भी कई मायनों में एक-दूसरी कठपुतली कला से बिल्कुल अलग है। शोध-अध्ययन के दौरान क्षेत्रा भ्रमण में जब ‘चदर-बदर’ के कुछ नये पुराने और कुछ टुटे पड़े सेट को बारीकी से देखा-परखा-समझा गया, तो जहाँ एक तरफ उसकी बनावट से जुड़े कई तकनीकि पहलूओं की जानकारी मिली, तो दूसरी ओर उसमें प्रयुक्त होने वाली सामग्री और औजारों को भी देखने समझने का अवसर मिला। ‘चदर-बदर’ का पूरा सेट लकड़ी के ऐसे प्लेटफार्म का बना होता है जिसके नीचे लगभग तीन से साढ़े तीन फीट का एक बाँस लगा होता है। सेट का उपरी हिस्सा लकड़ी के वृत्ताकार फ्रेम का बना होता है। जिसके प्लेटफार्म पर पंक्तियों में सजी लकड़ी/काठ की लगभग 11 से 17 कठपुतलियाँ फिट की हुई होती हैं। सेट के नीचले हिस्से में संचालन का पूरा तंत्रा लगा होता है। सेट के नीचे लगे बाँस की खोली से एक डोर निकली होती है। जिसे खींचने से सेट पर बंधी कठपुतलियाँ विभिन्न मुद्राओं में नृत्य करती हैं। साथ ही साथ सेट धीरे-धीरे वृत्ताकार घूमता भी है। सेट की बनावट और उसके कलपूर्जे तथा खिंचने वाली डोर या तार के बंधन की तकनीक कुछ इस कदर होती है कि एक मात्रा डोर से सारी कठपुतलियाँ अपनी विभिन्न भाव-भंगिमाओं के साथ भिन्न-भिन्न मुद्राओं में नृत्य करती नजर आती हैं। अधिकतर मामलों में कठपुतलियों का ऊपरी हिस्सा ही उस कपड़े से बाहर दिखता है। जिसके अंदर संचालन का पूरा तंत्रा छिपा होता है। कुछ एक मामले में ही पूरी कठपुतलियों को देखा जा सकता है। आमतौर पर कठपुतलियों की बाँहें और सिर ही हिलते-डुलते हैं। जिन मामलों में पूरा शरीर दिखता है, उसमें पैर भी हिलते-डुलते नजर आते हैं। कठपुतलियों की बनावट और उसकी मुखाकृतियाँ ही नहीं उसका वस्त्राभूषण भी सामान्यतः संताल जनजाति समुदाय के अनुरूप होता है। जिसकी वजह से संबंधित दर्षक समुदाय का मुख्य जुड़ाव उससे सहजतापूर्वक बन पाता है। क्योंकि वे आकृतियाँ उनकी अपनी और