आर्थिक सुधारों के ढाई दषक

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-भारती

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जुलाई 2016, भारत ने आर्थिक सुधारों के पच्चीस वर्ष पूरे कर लिये हैं। जुलाई 1991 में ही देष की कथित आर्थिक आजादी का सूत्रपात हुआ था। इसलिए यह एक महत्वपूर्ण अवसर है कि हम मुड़कर पिछले पच्चीस वर्षों को देखें कि इसके सबक क्या हैं और अगले पच्चीस वर्षों में देष को कौन सी नई मंजिलें पार करनी हैं। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पष्चात भारत ने मिश्रित अर्थव्यवस्था के ढाँचे को अपनाया था। इसमें पूँजीवादी अर्थव्यवस्था के साथ समाजवादी अर्थव्यवस्था की विषेषताएँ समाहित थीं। पूँजीवादी अर्थव्यवस्था का तर्क है कि इन वर्षों में इस व्यवस्था के नियमन एवं नियन्त्रण के लिए इतने अधिक कानून बनाए गये कि जिनसे विकास की समूची प्रक्रिया की अवरूद्ध हो गई, जबकि अन्य विद्वानों का मत है कि भारत जिसने अपनी विकास यात्रा लगभग गतिहीनता के स्तर से आरम्भ की थी, नियोजित विकास के चालीस वर्षों बाद एक सषक्त औद्योगिक आधार तथा खाद्यान्नों के उत्पादन में आत्म-निर्भरता प्राप्त करने में सक्षम रहा। बहुविध कारणों से वर्ष 1991 में भारत को विदेषी ऋणों के मामलें में गंभीर संकट का सामना करना पड़ा। वास्तव में इस संकट का वास्तविक कारण 1980 के दषक में अर्थव्यवस्था का अकुषल प्रबन्धन था। अस्सी के दषक में बजट का धारा लगातार बढ़ता गया। सरकार अपने विदेषी ऋणों के भुगतान की स्थिति में नहीं थी। विदेषी मुद्रा रिजर्व पन्द्रह दिनों के लिए आवष्यक आयात का भुगतान करने योग्य भी नहीं बचा था। 1989 से 1991 के मध्य भारत की अस्थिर राजनीति और विदेषी मुद्रा संकट के समय विष्व बैंक और मुद्रा कोष का दबाव बढ़ा। मुद्राकोष ने ऋण देने के लिए भारत पर अपनी नव पूँजीवादी शर्त्तें थोंपी। उस प्रतिकूल समय में भारत सरकार के पास इन दो अन्तर्राष्ट्रीय मौद्रिक संस्थानों के पास जाने के सिवा अन्य उपाय नहीं था। स्व० चन्द्रषेखर के प्रधानमंत्री बनने के बीस दिनों के बाद 30 नवम्बर 1990 को विष्व बैंक ने भारत सरकार के समक्ष एंडसर्न मेमोरण्डम प्रस्तुत किया, जिसमें वित्तीय सहयोग पाने के पहले कई राजनैतिक और आर्थिक शर्त्तें थी जिनका पालन आवष्यक था। उसमें आयात के लिए कथित बाधाएँ खत्म करने, मूल्य नियन्त्रण को मुक्त करने, नियार्तोन्मुखी औद्योगिकरण को प्रोत्साहित करने, निजी क्षेत्र पर लगे प्रतिबन्ध हटाने, अनेक क्षेत्रों में सरकारी हस्तक्षेप कम करने के साथ ही विदेषी व्यापार पर लगे प्रतिबन्ध हटाने जैसी शर्त्तें रखीं। अब भारत को नेहरू की अर्थनीति से विमुख होकर सीधे पूँजीवादी राह पर बढ़ना था। ढाँचागत समायोजन नीतियों (स्ट्रक्चरल एडजस्टमेंट प्रोग्राम) को कथित रूप से ’नई अर्थनीति’ जैसा छद्म नाम दिया गया। विष्व बैंक और मुद्राकोष के निर्देषों पर भारत सरकार ने इस नई आर्थिक नीति की घोषणा की, जिसमें वित्तीय- उपभोक्ता पूँजीवादी दृष्टि से व्यापक आर्थिक परिवर्त्तनों को सम्मिलित किया गया। कथित आर्थिक उदारीकरण के पहले दषक में तो इन्फॉरमेषन टेक्नोलॉजी (कम्प्यूटर, इंटरनेट) को ही शेयर बाजार असली अर्थव्यवस्था समझता रहा। सरकार भी यहीं मानती रही। यह सही है कि सूचना तकनीक क्षेत्र में सरकारी मदद, अंग्रेजी पढ़ी-लिखी और प्रषिक्षित आबादी के चलते सबसे पहले भारत को इसका लाभ मिला। आर्थिक उदारीकरण के दो दषक संयोग से सूचना तकनीक में क्रांति के दो दषक थे। जो क्रांतिकारी भूमिका सूचना तकनीकी ने निभाई नीतियों के मामले में वही काम काफी हद तक लालफीताषाही के कमजोर होने से भी हुआ अब उद्यमी को उद्यम लगाने के लिए लाइसेंस, परमिट के लिए दफ्तरों के चक्कर नहीं लगाने पड़ते। टैक्स के दरों में कमी और वसूली प्रणाली के सरल होने का भी लाभ मिला। नई पूँजीवादी राह पर बेधड़क बढ़ने की इन नीतियों ने ही वित्तीय क्षेत्र में भारतीय और विदेषी निजी बैंकों को भी पदार्पण का अवसर दिया। राजकोषीय नीति में भी व्यापक परिवर्त्तन के साथ विदेषी विनिमय बाजार में भी कई सुधार किये गये। भारत तेजी से आगे बढ़ा, सीमा शुल्क और उत्पाद शुल्क की दरें दुनिया के दूसरे देषों के स्तर पर आईं, विदेषी व्यापार भी बढ़ा, विदेषी निवेष में भी वृद्धि हुई, विदेषी मुद्रा भण्डार भी बढ़ा। लेकिन चालू खाते की अपरिवर्त्तनीयता बनी रहने के कारण ही भारत कथित वैष्विक व्यवस्था से थोड़ा कटा भी रहा। यही कारण है कि जब अमेरिका सब प्राइम संकट ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था और वैष्विक अर्थव्यवस्था को अपनी चपेट में लिया तो भी भारत लगभग इससे अछूता रहा। साथ ही बहुत कम समय में बीपीओ और कुछ अन्य क्षेत्रों में आई गिरावट के प्रभाव को दरकिनार करते हुए भारत वापस अपने विकास के पथ पर लौट आया। अब जब इस नई पूँजीवादी नीति के तरह कथित उदारीकरण के ढाई दषक बीत चुके हैं। सरकारी तौर पर देखें तो इन पच्चीस वर्षों में देष की काफी प्रगति दिखाई देती है। इस अवधि में राष्ट्रीय आय (जीडीपी) की सालाना वृद्धि दर नौ प्रतिषत तक पहुँच गई। भारत को एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था का दर्जा दिया जाने लगा है लेकिन टिकाऊपन के अभाव से यह वृद्धि दर उतरते-उतरते पाँच प्रतिषत तक पहुँच गई है। सुधार प्रेरित संवृद्धि ने देष में रोजगार में पर्याप्त अवसरों का सृजन नहीं किया है। आर्थिक सुधारों से कृषि को कोई लाभ नहीं हो पाया है और कृषि की संवृद्धि दर लगातार घटती गई है। कथित उदारवाद की सारी नीतियाँ कृषि के प्रति उदासीन तथा कृषक विरोधी रही है। किसानों की लगातार आत्महत्या इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है। विगत दशक में लगभग तीन लाख किसानों की आत्महत्याएँ इन आर्थिक नीतियों पर एक बड़ा प्रश्न चिन्ह हैं। भारत का 1990 का वित्तीय संकट अपनी आंतरिक संरचना में कई भीषण विषमताओं का परिणाम था। उस संकट के निदान के लिए पूँजीवादी शक्तियों के परामर्ष पर सरकार द्वारा प्रारम्भ नीतियों ने उन विषमताओं को और भी गहन बना दिया है। इन नीतियों ने केवल उच्च आयवर्ग और शहरी मध्यवर्ग की आमदनी और उपयोग के स्तर का उन्नयन किया है तथा सारी संवृद्धि कुछ गिने चुने क्षेत्रों तक सीमित रही है। दूर संचार, सूचना प्रोद्योगिकी, वित्त, मनोरंजन, पर्यटन, भव