संस्कृति के विकास में वनोपज एवं खेती

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-घनश्याम

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झारखंड में बनने वाली कृषि नीति ;जो अभी प्रस्तावित हैद्ध में समग्रता से विचार करने और यहां की संस्कृति तथा परम्परा पर ध्यान देने की जरुरत है। देश के अन्य भू-सांस्कृतिक ;जियो-कल्चरलद्ध क्षेत्रा से बिलकुल अलग है झारखंड का भू-सांस्कृतिक क्षेत्रा। यहां के लोग महज खेती को आजीविका के रूप में नहीं देखते बल्कि खेती को आजीविका के एक उपादान के रूप में उपयोग करते रहे हैं। इसलिए, झारखंडी समाज आजीविका के मामले में स्वावलंबी एवं परस्परावलंबी समाज रहा है। जंगल, खेती, पशुपालन, कुकुटपालन, लघु एवं कुटीर उद्योग यहां की आजीविका की विशेषता रहे हैं। तमाम समुदाय स्वावलंबन की प्रक्रिया को बढ़ाते हुए परस्परावलंबी रहा है। झारखंडी समाज में आजीविका की अवधरणा के केन्द्रीय तत्व हैं- भोजन, वस्त्रा, आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा, रंजन और सृजन। इसलिए, हमारे वस्त्रा भी हमारे लिए उतने ही उपयोगी हैं जितनी प्रकृति उसकी जरूरत को महसूस करवाती है। मौसम और परिस्थिति जन्य होते हैं हमारे वस्त्रा । वस्त्रों के रंग भी प्रकृति में व्याप्त विभिन्न रंगों से लिये जाते हैं। इसमें रासायनिकता नहीं होती बल्कि वानस्पतिक सजीवता होती है। इसलिए हमारे रंग हमारी आंखों को न सिपर्फ आकर्षित करते हैं बल्कि आंखों की दृष्टि को प्रखर, पैनी और अर्थवान बनाते हैं। रंग-रोगन में इस्तेमाल किये जाने वाले वानस्पतिक रंग जहां एक ओर हमारी ज्ञान शक्ति को सशक्त करता है वहीं दिमाग के ज्ञान तन्तु को तरंगित कर संवेदनशील बनाता है। यहीं से होता है ऊर्जा का प्रस्पफुटन जो उम्र की सीमाओं को भी पाट देता है। झारखंड में सजीव और सरस खेती की परम्पराः झारखंड में सजीव और सरस खेती की एक विशिष्ट परम्परा रही है जिसमें विभिन्नता और बहुलता की भरमार है। इसलिए, यहां हजारां किस्म के न सिपर्फ धन पाये जाते थे बल्कि सैकड़ां किस्म के मिलिट्स ;मोटे अनाजद्ध वनस्पति और साग-भाजी का उत्पादन होता था। इस उत्पादन की प्रक्रिया में जंगल और सदासलिला जल स्रोतों का विशेष योगदान था। एक तरह से झारखंडी समाज और समुदाय के लोग खाद्य के मामले में संप्रभु था। आज खाद्य सुरक्षा के नारे लगाये जा रहे हैं। इससे संबंध्ति विध्ेयक को भी लोकसभा और राज्यसभा ने पारित कर दिया है, जो हमारी खेती को न सिपर्फ परावलंबी बनायेगा बल्कि हमारे किसानों को जमीन से बेदखल भी करेगा। खाद्य सुरक्षा का नारा किसानों को स्वावलंबी बनाने के लिए नहीं बल्कि भूख को अमीरों के हाथों में गिरवी रखने का एक उपक्रम मात्रा है। जमीन जब किसानों के हाथ में रहती है तब किसान न सिपर्फ स्वत्रांत होते हैं, बल्कि अपनी सृजनशीलता और विवेक का इस्तेमाल बखूबी करते हैं। यह सृजनशीलता और विवेक ही उन्हें समाज के प्रति जिम्मेवार बनाते हैं। इसलिए झारख्ांड के किसान अनाज का उतना ही उत्पादन करते थे जिससे वे अपने समाज तथा पास-पड़ोस के समुदाय का भरण-पोषण कर सकें। बाजार यहां के किसानों के चित्त में नहीं थे और न पूंजी किसानों के लिए चिंता की बात। यहां के किसानों के चित्त इतने सापफ और सरल थे कि श्रम और सृजन को परस्परता का एक उपादान मानते थे। इसलिए यहां मदेइत जैसी परम्परा का विकास हुआ। ज्यों-ज्यों श्रम को मजदूरी के तराजू पर तोला जाने लगा और सृजन को बाजार की वस्तु, त्यों-त्यों स्वावलंबन और परस्परावलंबन की प्रक्रिया ढीली पड़ती गई और चित्त में पूंजी की चिंता घर करती चली गई। यह पूंजी और पूंजीवाद की चिंता आज पूरी दुनिया को खाये जा रही है। भंयकर मंदी के दौर, खाद्यान्न का अभाव और रोजगार की कमी ने पूंजीवाद के सामने कई सवाल खड़े कर दिये हैं जिसका जवाब भूंमडलीकरण के पुरोधओं को नहीं सूझ रहा है। झारखंडी समाज की चिंतन-धरा और जीवनप(ति इसका जवाब दे सकती है, इसलिए झारखंड के नवनिर्माण की प्रक्रिया को गतिमान बनाना न सिपर्फ झारखंड को स्वस्थ और स्वावलंबी बनाना है बल्कि इससे जो दृष्टि और दिशा मिलेगी उससे अवरु( पूंजीवाद से हमें स्वशासी, समाजवादी और सामुदायिक जीवन-प(ति को गढ़ने का प्रशस्त मार्ग मिल सकता है। झारखंड में आवास और खेती का संबंध्ः झारखंड में आवास की अवधरणा यहां की भू-सांस्कृतिक बनावट और जलवायु तथा यहां पर उपलब्ध् स्थानीय संसाध्नों की बुनियाद पर विकसित हुई है। अमूमन घरों का निर्माण वर्षा की धर और मौसम के प्रहार को ध्यान में रखकर यहां के समुदाय करते रहे हैं। वास्तुशिल्प की झारखंडी परिकल्पना के केन्द्र में महज इंसान नहीं होता बल्कि अन्य पशु-पक्षियों के निवास का भी इसमें सवामेश होता है। मिट्टी और पुआल को गूंथ कर यहां के लोग अपने घरों की दीवारें खड़ी करते रहे हैं। उन दीवारों के उफपर छप्पर बतौर बांस, जंगल में पाई जाने वाली लकड़ियों और घास-पफूस का इस्तेमाल किया जाता रहा है। अमूमन छप्पर के लिए जिन लकड़ियां का इस्तेमाल किया जाता रहा है उनमें शाल और महुए की लकड़ियों की बहुलता होती है। शाल और महुआ की लकड़ियां ;परिपक्वद्ध लोहे से भी लम्बे काल तक टिकने वाली होती हैं। घरों में बड़ी-बड़ी खिड़कियां की व्यवस्था उस तरह से नहीं होती जिस तरह आज के मकानों में होती है। इसलिए लोग यह सवाल करते हैं कि आदिवासियों के मकान हवादार नहीं होते। यहां यह समझना जरूरी है कि आदिवासी समुदाय सामान्य तौर पर रहने के लिए मकान का इस्तेमाल नहीं करते बल्कि सामानों की सुरक्षा और यौन गोपनीयता के लिए करते हैं। सोने और विश्राम के लिए अमूमन बारामदों का इस्तेमाल किया जाता है। बारामदों का आकार दूसरे समुदायों के मकानों से ज्यादा बड़ा होता है। इतना ही नहीं पशु-पक्षियों के रख-रखाव के लिए भी अलग किस्म के मकान बनाये जाते हैं। घर की सपफाई पर विशेष ध्यान दिया जाता है और हर दिन महिलाएं आगंन की गोबर और धन की भूसी निर्मित राख से लिपाई करती हैं। घर की दीवारों की भित्ति-चित्रों को खूबसूरत रंगों से उकेरा जाता है। आगंतुकों के बैठने के लिए चौड़े-चौड़े ओटे होते हैं। इन ओटों का इस्तेमाल बैठने के लिए भी होता है और घरों की दीवारों की सुरक्षा के लिए भी। हर वर्ष ध्नकटनी के बाद घरों की दीवारों और छप्