विकास की संस्कृति : एक विश्लेषण

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लेखक-इन्दर सिंह नामधारी

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संस्कृति का शाब्दिक अर्थ होता है शुद्धता या पवित्रता। यही कारण है कि संस्कृति शब्द के पहले जब कार्य या विकास जैसे सकारात्मक शब्द जोड़ दिए जाते हैं तो वे कार्य-संस्कृति या विकास-संस्कृति बनकर कार्य एवं विकास की पवित्रता के प्रतीक बन जाते हैं। इस तरह यदि हम विकास की संस्कृति का डी0एन0ए0 टेस्ट करें तो यह विकास की उस परिकल्पना का पर्याय बन जाएगा जहॉ विकास को पूरी ईमानदारी एवं पवित्रता के साथ सम्पादित किया जा रहा हो। दूसरे शब्दों में विकास की भावना के साथ जब मनसा, वाचा एवं कर्मणा तीनों भाव जुड़ जाते हैं तो वास्तविक विकास दिखने लगता है। झारखण्ड में आज के दिन विकास की अवधारणा मात्र ‘‘वाचा‘‘ एवं ‘‘कर्मणा‘‘ तक सीमित रह गई है क्यांकि इसमें मन का जुड़ाव है ही नहीं। जब तक विकास के साथ मन का जुड़ाव नहीं होगा तब तक वास्तविक विकास की अवधारणा साकार नहीं हो सकेगी। मन की अनिवार्यता को रेखांकित करते हुए उद्भट विद्वान चाणक्य ने सदियों पूर्व अपने नीति-सूत्र में लिखा है कि, मनः कृतं-कृतं मन्ये न शरीरकृतं कृतं। येनैवालिंगिता कान्ता तेनैवलिंगिता सुता।। अर्थात् कार्य करते समय व्यक्ति जिस मनोभाव से प्रेरित रहता है कार्य की असली पहचान उसी से होती है। सप्रसंग व्याख्या करते हुए चाणक्य बताते हैं कि मनुष्य आलिंगन तो अपनी पत्नी का भी करता है और पुत्री का भी लेकिन उसकी मानसिक स्थिति से ही यह तय होता है कि वह किसका आलिंगन कर रहा है क्योंकि शारीरिक गतिविधि से तो दोनों आलिंगन एक ही जैसे होते हैं। कुछ इसी तरह विकास की अवधारणा को जब मानसिक भाव से जोड़ दिया जाएगा तो विकास का असली चेहरा सामने आ सकेगा। विकास के मात्र मौखिक प्रचार से विकास धरती पर नहीं उतारा जा सकता। इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि आज के दिन नेतागण विकास की बाते तो बहुत करते हैं लेकिन उसके साथ उनका मानसिक जुड़ाव नहीं हुआ करता। हम यदि झारखण्ड का ही उदाहरण ले लें तो वर्तमान सरकार भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म कर विकास करने के जितने दावे कर रही है उतने दावे शायद ही पहले किसी दूसरी सरकार ने किये हों। सरकार की सभी घोषणाएॅ लेकिन कान्ता-आलिंगन बनकर रह जा रही हैं। झारखण्ड की सरकार यदि विकास के प्रति ईमानदार होती तो वह झारखण्ड में पंचायती चुनावों को इतने लचर तरीके से नहीं करवाती क्योंकि लगभग एक वर्ष पूर्व हुए पंचायती चुनावों ने भ्रष्टाचार के नए कीर्तिमान स्थापित कर दिए हैं। इससे तो बेहतर था कि पंचायती चुनावों को दलीय आधार पर ही करवा दिया जाता क्योंकि इससे एक पंथ दो काज हो जाते। राजनीतिक दलों को जहॉ अपनी हैसियत का अन्दाज हो जाता वहीं पैसों की इतनी लूटपाट भी नहीं होती। सभी जानते हैं कि पंचायतों के माध्यम से ही सुदूर एवं दुर्गम ग्रामीण ईलाकों में विकास की किरणे पहुॅचायी जा सकती है। बर्बरीक-दृष्टि से देखने के बाद बड़े दावे के साथ यह कहा जा सकता है कि पंचायती चुनावों के दौरान झारखण्ड में कालेधन का खुलकर उपयोग किया गया है क्योंकि पंचायती चुनावों में विधानसभा और संसद के चुनावों से भी अधिक तामझाम देखी गई। मुखिया का पद पाने के लिए एक-एक प्रत्याशी ने दस-दस लाख रूपये तक फूंक दिए। कई प्रत्याशियों ने कर्ज लेकर या अपनी जमीन बंधक रखकर चुनावों में पैसा यह सोचकर पानी की तरह बहा दिया कि चुनावों के बाद मानो उन पर पैसों की बारिश होने वाली हो। यक्ष प्रश्न अब यह उठता है कि मुखिया स्तर के व्यक्ति के पास चुनावों के बाद पैसा आएगा भी तो कहॉ से ? स्पष्ट है प्रत्याशियों के मन में विकास की योजनाओं से ही पैसा कमाने की इच्छा पल रही होगी। ऐसी विकृत भावनाओं के रहते यदि योजनाओं के क्रियान्यवन में भ्रष्टाचार का बोलबाला रहेगा तो ग्रामीण क्षेत्रों में विकास का आखिर हश्र क्या होगा ? इस परिस्थिति में पंचायती राज के माध्यम से पैसा तो खर्च होगा लेकिन भ्रष्टाचार के कारण वह उसी तरह काफूर हो जाएगा जैसे गर्म बालू पर गिरी हुई पानी की चन्द बूंदे वाष्प बनकर विलुप्त हो जाती हैं। देश या प्रदेश में विकास की संस्कृति को यदि स्थायी रूप से स्थापित करना है तो सबसे पहले ग्रास-रूट स्तर पर भ्रष्टाचार को खत्म करना होगा। विकास मापने का असली पैमाना होता है जनता को सरकार से मिलने वाली दैनन्दिन सेवाओं की गुणवत्ता। मुख्यमंत्री यह डींग हांकते नहीं थकते कि भ्रष्टाचार के प्रति उनका जीरो टोलेरेन्स है। काश ! मुख्यमंत्री जी ने धरती की वास्तविकताओं को जानने के लिए वेष बदलकर कभी थानों, प्रखण्डों, अस्पतालों या अंचलों का दौरा किया होता ! धरती की हकीकत को देखकर शायद वे सन्न रह गये होते क्योंकि उपरोक्त सभी स्थानों पर बिना रिश्वत से कोई काम होता ही नहीं है। थानों में बिना रिश्वत दिए किसी की बात ही नहीं सुनी जाती। प्रखण्डों का आलम यह है कि वहॉ विकास के लिए कर्णांकित आधे से अधिक राशि बंदरबांट में ही खत्म हो जाती है। अंचलों में बिना रिश्वत दिए जमीन का दाखिल-खारिज भी नहीं होता। सरकारी अस्पतालों में जाकर बीमार परेशान हो जाता है क्योंकि बिना पैसा लिए सरकारी डॉक्टर भी ईलाज करना नहीं चाहते। आम जनता के उपरोक्त सभी काम यदि बिना पैसा के लेन-देन के हो जाएॅ तो कहा जा सकता है कि मुख्यमंत्री का भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टोलेरेन्स है। इस दुःखद स्थिति का एक मात्र कारण है झारखण्ड में विकास की संस्कृति का अभाव। इस प्रदेश में विगत डेढ़ शतक में यदि विकास की संस्कृति स्थापित हो गई होती तो प्रत्येक दो वर्षों पर राज्यसभा के होने वाले चुनावों में पैसों का नंगा नाच नहीं हुआ करता। झारखण्ड एक ऐसा अभागा राज्य बन गया है जहॉ हरेक दो वर्षों पर होने वाले राज्यसभा के चुनावों में कोई न कोई आर्थिक घोटाला हो ही जाता है। चार वर्ष पहले हुए राज्यसभा के चुनावों में रिश्वत लेने के आरोप में कई विधायकों के घरों पर सी0बी0आई0 के छापे मारे गए और कई विधायको एवं उम्मीदवारों को भी जेल की हवा खानी पड़ी। इस वर्ष 2016 में हुए राज्यसभा के चुनावों को भी भुलाना मुश्किल होगा क्योंकि सत्ताधारी पार्टी द्वारा राज्यसभा में ए