जैविक खेती बना ग्राम स्वराज्य का आधार

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-ललन कुमार शर्मा

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गिरिडीह जिला का परमाडीह गांव जैविक खेती के माध्यम से करोड़पति ग्राम बन चूका है गिरिडीह जिला का परमाडीह गांव जो गाण्डेय प्रखण्ड का एक सरकारी योजनाओं से उपेक्षित गांव है, ग्रामीणों के आपसी मेल-मिलाप, मेहनत एवं मात्र जैविक खेती के सहारे तीन-चार वर्षो में करोड़पति ग्राम बन गया है। लगभग 100 घर की बस्ती है ”परमाडीह” जो चारों ओर बरसाती नदी से घिरा है। आजादी के लगभग 70 वर्षों के बाद भी यह गांव वर्षात में एक टापू बन जाता है। आज तक नदी पर पुल नहीं बन पाया। दुसरे गांव के लोग यहाँ शादी-ब्याह तक नहीं करना चाहते थे। वर्षा ऋतु में कोई बीमार पड़ जाय तो दवा के अभाव में मृत्यू के अलावा दुसरा चारा नहीं था। वर्षा ऋतु की खेती के अलावा कोई दुसरा आय का विकल्प नहीं था। भूखमरी-बेरोजगारी, पलायन का सिलसिला लम्बे समय से चला आ रहा था। परन्तु समय का चक्र बदला। गिरिडीह जिला के प्रसिद्ध पयर्टनस्थल खण्डोली डैम पर ग्रामोत्थान योजना द्वारा ग्रामोत्थान संसाधन केन्द्र की स्थापना वर्ष 2012-13 में की गई। स्वरोजगार प्रशिक्षण के साथ-साथ जैविक खेती का प्रचार-प्रसार ग्रामोत्थान योजना के द्वारा गिरिडीह जिले के लगभग 100 ग्रामों में किया जा रहा था। गो- आधारित-खेती एवं खेती को आधार बनाकर स्वरोजगार का प्रशिक्षण गांव-गांव में दिया जाने लगा। परमाडीह ग्राम के नवयुवक, महिलाएँ एवं किसान भी जीवन की राह तलाश रहे थे। ग्रामिणों में एकता एवं उत्साह की कमी नहीं थी। गाय के गोबर से जैविक खाद एवं गोमुत्र तथा नीम की पत्तियों से जीवामृत एवं कीटनियंत्रक बनाकर लोगों ने सब्जी की खेती प्रारम्भ की। मेहनत एक वर्ष में ही रंग लाने लगा। देखते ही देखते गांव के चप्पे पर जैविक विधि से सब्जी की खेती होने लगी। जो नदी गांव के लिए अभिशाप बनी हुई थी लोगों ने नदी के हर तरफ डीजल इंजन लगा कर सिंचाई कर पानी लेने लगे। नदी के चारां ओर लगभग 70-80 डीजल पंप दिन रात लगे रहते हैं। किसानों के खेत दुर पड़ते हैं तो बीच में एक और इंजन लगाकर 500 से 1000 मीटर तक पानी पहूँचाने का काम दो-दो मशीन लगाकर कर रहे हैं। गांव में अभी तक तीन फेज बिजली नहीं आ सकी है। गांव के किसान अब केमिकल का नाम ही भुल गये हैं। उन्हें पता है कि केमिकल फर्टिलाइजर से भूमि बंजर होती जाती है एवं सिंचाई में पानी भी अधिक लगता है, खेती मँहगी होती है एवं विषैला पदार्थ उत्पादित होता है। गांव के गोबर से पुरी खेती नहीं सम्भलती तो किसान गिरिडीह, धनबाद, एवं झरिया के गोशालाओं से गोबर खरीद कर लाते हैं। 10 से 20 लाख रू0 तक का तो किसान गोबर खरीदने लगे हैं। वर्ष भर धरती हरी भरी रहती है। हरी सब्जियों में करेला, नेंनुआ, झिंगा, सेम, फुलगोभी, बन्दागोबी, बीन्स, लौकी तो सलाद के लिए- धनिया टमाटर, मिर्च, सलजम, गाजर, तो हर प्रकार के हरा-लाल साग। दलहन में मसूर, मटर, चना, अब तो जैविक गेंहूँ की खेती भी भरपुर होन लगा है। गांव के लोग अपने घर के लिए नमक छोड कर शेष कुछ भी नहीं खरीदते। हर घर-घर में दो-दो मोटर साईकिलें हैं। दो नवयुवक प्रति दिन मोटर साइकिल पर सब्जियों की बोरियाँ बाँधे घर से बाजार पहूँचाने निकलते हैं। प्रातः काल मानों सब्जियों को लेकर मोटर साईकिल का कारवां ही निकलता हैं । गिरिडीह, धनबाद, मधुपुर एवं जामताडा तक इनकी सब्जियां जाती हैं। वैसे इन्हें जैविक सब्जी का मूल्य तो अभी नहीं मिल पा रहा परन्तु लोग इनकी सब्जियों का रंग एवं स्वाद से परिचित हो गये हैं, अतः मार्केट में तुरंत बिक जाती हैं। नगर के लोगों को जैविक सब्जी तो मिलने लगी है परन्तु ग्रामिणों को अभी भी इसका जायज मूल्य मिलने का इंतजार है। अब हर नौजवान अपने खेत एवं खेती से संतुष्ट है। गांव से पलायन बिलकुल रूक गया है। हर परिवार को 5 से 6 लाख रूपये का वार्षिक आय खेती से ही है तो फिर भला कोई क्यों बाहर जाए। गांव में अब उत्क्रमित उच्च विद्यालय हो गया है, बच्चे घर पर रहकर खेती-किसानी का काम करते हुए कॉलेज तक की पढाई कर रहे हैं। ग्रामोत्थान योजना ने गांव में ही सिलाई का प्रशिक्षण केन्द्र खोल दिया है, सभी लडकियां सिलाई-कढ़ाई का प्रशिक्षण ले रही हैं। लोगों के आर्थिक हालात सुधर रहे हैं। आज के दिन में परमाडीह ग्राम में 25 से 50 लाख रूपये तक के दो-मंजिले मकान सामान्य किसानों के भी बनने लगे हैं। जीवन स्तर सामान्य है परन्तु पोषण युक्त आहार अपना पोषण वाटिका का है, फलतः कुपोषण से मुक्ति है, महिलाएं एवं बच्चे स्वस्थ हैं। मातृ एवं शिशु मृत्यू दर में कमी आयी है। गांव से बीमारी बहुत दुर भाग चुकी हैं। समृद्धि के साथ-साथ समरसता का होना कठिन बात होती है। परन्तु एकल अभियान का ग्राम स्वराज्य मंच ने गांव के लोगों के साथ बैठकर चरवाही का नियम बनाया हैं। गांव के ही दो-तीन महिला एवं युवक सबों के जानवर एक साथ जंगल में चराने ले जाते हैं जिनका पारिश्रमिक सभी मिलकर देते हैं। परिणाम स्वरूप गर्मी के दिनों में भी पूरे गांव की खेती किसी घेरान की भी निश्चिंत होकर खेती करते हैं। अब शर्दी, गर्मी बरसात वर्ष भर गांव में सघन खेती होती है। एक फसल कटने के पहले ही दुसरा उसमें लगा दिया जाता है । गांव के चारों ओर ऐसा प्रतित होता है मानों हरी सब्जियों के जंगल से गुजर रहे हैं। खेतों में फसल सलिके से ऐसे लगाये जाते हैं मानों किसी नें मिठ्ठी के कैनवास पर चित्र उकेरे हों। सरकार ने तो ग्रामिणों की सुध अब तक नहीं ली पर एकल विद्यालय का ग्राम में प्रारम्भ होना एवं ग्रामोत्थान योजना का सही दिशा में प्रयास के कारण ग्रामिणों में जो जागृति आई फिर उनका एकता एवं समरसता ने धरती माता एवं गौ माता का आर्शीवाद प्राप्त कर सम्पूर्ण ग्राम को स्वावलम्बी बना दिया । लोगों ने सिद्ध किया कि अपना हाथ ही जगरनाथ है। सरकार के भरोसे परावलम्बन नहीं! स्वावलम्बन ही सच्चे मायने में ग्रामस्वराज्य है! हर हाथ जब काम में लगेगा तभी सच्चा ग्राम स्वराज्य आयेगा। इस गांव की कहानी ने आस-पास के कई गांवो को प्रेरित किया है। मनियाडीह, बेलडीह, कच्छैल, पर्वतपुर, बेरगी जैसे दर्जनों गांव आज पूर्ण