मनरेगा एक मांग आधारित योजना है

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महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) एक मांग आधारित योजना है जिसमें अकुशल श्रम के इच्छुक एवं अधिनियम के अंतर्गत निबंधित ग्रामीण परिवारों को साल में सौ दिनों का रोजगार उपलब्ध कराया जाता है। मनरेगा 2005 के तहत केंद्र सरकार द्वारा प्रथम चरण में दिनांक 2 फरवरी 2006 को राज्य के तत्कालीन 20 जिलों में (देवघर और प0 सिंहभूम छोड़कर) लागू किया गया। बाद में शेष जिलों में भी इसे लागू कर दिया गया। दस साल के इस सफरनामे में मनरेगा ने राज्य में जहां आम ग्रामीणों को उनकी मांग के अनुरूप रोजगार उपलब्ध कराया वहीं स्थायी परिसंपत्तियों के निर्माण के साथ ग्रामीण पलायन को कम करने में काफी हद तक अपनी भूमिका निभायी। यह दावा तो नहीं किया जा सकता कि ग्रामीणों का पलायन पूरी तरह से रूक गया है परंतु इसमें कितनी कमी आा गयी इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि साल 2013 में बीबीसी ने अपनी एक रिपोर्ट में इस बात का हवाला दिया कि झारखंड-बिहार के मजदूरों के पंजाब और हरियाणा नहीं आने के कारण वहां के उद्योगों में मजदूरों की काफी कमी हो गयी। कई छोटे उद्योग बंद होने के कगार पर आ गये थे। यह भी बताया गया था कि मनरेगा में काम मिलने के कारण ही मजदूर इन राज्यों में नहीं आ रहे। यह बात भले ही पंजाब और हरियाणा जैसे समृद्ध राज्यों के लिए चिंताजनक थी लेकिन झारखण्ड के लिए यह सर्वथा उत्साहवर्द्धक परिणाम था। शायद इसलिए, कि पलायन भले ही केवल एक व्यक्ति का हो पर पूरे परिवार पर उसका असर होता है। पुरूषों के मुकाबले महिलाओं और बच्चों की हालत ज्यादा खराब होती है, वे जो मजदूरों के साथ जाते हैं उनकी भी और जो घर पर रहते हैं उनकी भी। आज की स्थिति इस योजना के अंतर्गत राज्य में अब तक सात लाख से अधिक योजनायें पूर्ण कर ली गयी हैं। इन योजनाओं पर करीब 12000 करोड़ से अधिक रूपये अब तक खर्च हो चुके हैं। करोड़ों के मानव दिवस का सृजन हो चुका है और लाखों हाथों को अब तक काम मिल चुका है। एक नजर अब तक की प्रगति पर डालते हैंः- विवरण 2006-7 2007-8 2008-9 2009-10 2010-11 2011-12 2012-13 2013-14 2014-15 20015-16 मानव दिवस (लाख में) 520.47 754.47 755.25 842.47 830.78 609.71 566.40 436.22 453.32 586.72 कुल खर्च (लाख में) 71155.09 107444.70 134171.70 137970.16 128346.03 116966.49 115236.23 91271.94 103624.84 133250.48 पूर्ण कार्य 30519 51647 64614 75767 52958 50290 92645 63458 59965 71180 वित्तीय वर्ष 2016-17 में पूरे राज्य में एक लाख पांच हजार के आस-पास डोभे भौतिक रूप से तैयार हो चुके थे। पूरे राज्य में अन्य योजनाओं के अतिरिक्त छह लाख डोभे तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है ताकि जल संरक्षण के साथ एक फसली जमीन को दो फसली जमीन में बदला जा सके। इस लक्ष्य के विरूद्ध मात्र तीन महीने में ही उपर्युक्त लक्ष्य को हासिल कर लिया गया है। एमआईएस के अनुसार दिनांक 15.7.2016 तक 77663.55 (लाख रूपये में) खर्च हो चुके हैं और योजनाओं पर कार्य लगातार जारी है। मनरेगा से लोगों के लगातार जुड़ाव के पीछे कई कारक रहे। डालते हैं एक नजर। लोगों का जुड़ाव मनरेगा ने अपने शुरूआती दौर में ही प्रचार-प्रसार पर जोर दिया। पंचायत स्तर तक पहुंच बनाने के लिए कार्मिक रखे। साल 2006-7 में ही 23 लाख से अधिक परिवारों को जॉब कार्ड दिया गया। जॉब कार्ड न केवल एक ग्रामीण के लिए काम का अधिकार मांगने की पहली सीढ़ी थी, बल्कि यह खाता खोलने और पहचान पत्र का भी आधार बन गया। यह निःशुल्क था। जॉब कार्ड मिलने के बाद लोगों ने की मांग की। शत प्रतिशत लोगों को साल 2006-7 में काम दिया गया। इसका सकारात्मक असर हुआ और काफी संख्या में लोग जॉब कार्ड की मांग करने लगे। महिलाओं ने भी इसमें बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। इस बात का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि पहले वित्तीय वर्ष में ही मानव दिवस में महिलाओं की भूमिका 39.48 प्रतिशत रही। उनका रूझान संभवतः इसलिए बढ़ा क्योंकि महिलाओं को पुरूषों के बराबर मजदूरी मिलनी शुरू हो गयी, मातृत्व लाभ की सुविधा और काम करने वाली माताओं के लिए बच्चों को पालने के लिए पालना घर ने भी महिलाओं को इसमें जोड़ा। इस योजना को इसलिए भी पसंद किया जा रहा है क्योंकि इसमें बैंक या पोस्ट ऑफिस के माध्यम से सीधे खाते में भुगतान होता है। अतः एक मजदूर को उसकी पूरी मजदूरी मिलती है और चिलियागिरी नहीं चलती। मनरेगा में न्यूनतम उम्र सीमा तो 18 वर्ष निर्धारित है पर अधिकतम उम्र सीमा नहीं होती। किसी भी उम्र का व्यक्ति इसमें काम पा सकता है। इसलिए 40 साल से अधिक उम्र के लोग भी इसमें जुड़ते चले गये। आज राज्य में करीब 40 लाख परिवारों के पास जॉब कार्ड है और लगातार काम की मांग जारी है। सुविधायें इस योजना के प्रति लोगों के आकर्षण का एक बहुत बड़ा आधार मनरेगा के अंतर्गत मिलने वाली सुविधायें हैं। मनरेगा ने महिला-पुरूष के भेद को खत्म कर दिया। दोनों को समान मजदूरी दे दी इसलिए महिलाओं का झुकाव इस योजना के प्रति तेजी से हुआ। इसके साथ कार्यस्थल पर मिलने वाली सुविधाओं ने भी लोगों को अपनी ओर खींचा। मनरेगा में काम की जगह, छाया, दवा, पानी, बच्चों के लिए पालना जैसी सुविधायें उपलब्ध होती हैं। गांव या बाहर जाकर काम करने की स्थिति में न तो छाया का प्रबंध था और न ही दवा का। चोट लगने पर मुफ्त चिकित्सा की व्यवस्था और दुर्घटना में मृत्यु पर एक लाख रूपये के मुआवजे का प्रावधान मनरेगा में शामिल है। इसके साथ दैनिक मजदूरों को जो प्रतिदिन गांव से शहर में रोजगार की तलाश में आते हैं, पर भी इसने असर डाला। ऐसे लोगों को प्रतिदिन मजदूरी नहीं मिलती। कई दिन वे खाली हाथ घर जाते हैं। आने-जाने में समय और पैसे की बर्बादी होती है सो अलग। जबकि मनरेगा में गांव के पांच किलोमीटर के दायरे में कम से कम सौ दिनों के रोजगार की गांरटी ग्रामीणों को मिली। अतएव ग्रामीण मजदूरों को उनके घर के आस-पास का अपना काम भाया और लोगों ने अपने घर परिवार से दूर शहर जाकर सुविधाविहीन जिंदगी को