झारखण्ड का सिरमौर - पिस्का नगड़ी

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-केशव कुमार भगत

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स्वर्णरेखा उद्गम स्थल के रूप में संपूर्ण भारतवर्ष में पहचान बनाने वाला ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक संगम की नगरी-पिस्का नगड़ी-वर्तमान में डिजिटल इंडिया के तहत आनलाइन रसीद के लिये आधुनिक नगड़ी बन कर देश के मानचित्र पर छा गया। देश का पहला है प्रखण्ड है नगड़ी जहां आनलाइन रसीद कटना आरंभ हुआ जबकि आनलाइन म्यूटेशन (दाखिल खारीज) का यह दूसरा प्रखण्ड है। वर्तमान में झारखण्ड का सिरमौर बना नगड़ी प्रखण्ड में अन्तरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर के कई संस्थान चल रहे हैं जबकि कई संस्थान निर्माणाधीन हैं। अन्तरराष्ट्रीय स्तर का क्रिकेट स्टेडियम का कुछ भाग नगड़ी प्रखण्ड में पड़ता है। देश का महत्वपूर्ण संस्थान केन्द्रीय तसर अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केन्द्र 1964 से ही नगड़ी प्रखण्ड में चल रहा है। केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल रांची का ग्रुप केन्द्र इसी प्रखण्ड में है जबकि झारखण्ड उच्च न्यायालय भवन, झारखण्ड विधान सभा भवन का निर्माण कार्य प्रगति पर है। इसके अतिरिक्त कई महत्वपूर्ण संस्थानों के लिये भूमि आबंटित कर दी गई है। जिनमें जनगणना कार्य निदेशालय, सी0 वी0 आई0 कार्यालय भवन, आई0 आई0 एम0 रांची -3, जे0 एस0 ए0 सी0, हुडको, कैट, एफ0 एम0 कैट है। इसके साथ रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया, नावार्ड, डी0 भी0 सी0, सी0 पी0 डब्ल्यू डी0, जे0 एस0 आई, आई0 वी0 एम0, पुरातत्व सवेक्षण कार्यालय, केन्द्रीय औषधी जांच प्रयोगशाला, सैनिक कल्याण बोर्ड को जमीन देने की बात चल रही है। उम्मीद है कि उक्त सभी कार्यालय नगड़ी प्रखण्ड में खुलेंगें। झारखण्ड की राजधानी मुख्यालय से मात्र 16 किलोमीटर की दूरी एन0 एच0-23 पर अवस्थित पिस्का नगड़ी समुद्र तल से 707.21 मीटर ऊँचा तथा हावड़ा से इसकी दूरी 425.4 किलोमीटर(रेलवे के अनुसार) है। नगड़ी के उतर में कोयल, दक्षिण में स्वर्ण रेखा और कारो नदी का उद्गम स्थल है इससे प्रतीत होता है कि यह ऊँचा स्थान में स्थित है। पुरूलिया से लोहरदगा तक छोटी लाईन की रेल 1909 ई0 में चली थी। इस रेल का स्टेशन पिस्का इसी प्रखण्ड में है। वर्तमान में यह बड़ी लाईन में परिणत हो गया है। नगड़ी में रेल सेवा, बस सेवा सहित यातायात के सभी साधन उपलब्ध है, कृषि और व्यापार का अच्छा केन्द्र है चूंकि इस क्षेत्र में कई गांव नगड़ी नाम के हैं। इसलिये इसे पिस्का नगड़ी कहा गया है। इसकी अतीत के संबंध में प्रमाणिक साक्ष्य के साथ कुछ तथ्य है। रामायण काल :- इस स्थल को रामायण काल में भी जाना गया था। इसका प्रमाण नगड़ी प्रखण्ड अन्तर्गत एड़चोरो पंचायत के बरसा गांव स्थित लदा टोंगरी में मिलता है जो प्रखण्ड मुख्यालय से मात्र तीन किलोमीटर की दूरी पर है। यहाँ एक चट्टान है इसके नीचे जल का सोता है जहाँ से निरंतर जल प्रवाहित होता रहता है। जेठ की दुपहरिया में जब सारा वातावरण तपता रहता है यह सोता भी सूख जाता है परन्तु जब कोई श्रद्धालु यहाँ पूजा के लिये पहुंचते हैं तो यहां स्वतः जल आ जाता है इसी टोंगरी में एक युगल पद-चिन्ह है जिसके संबंध में बताया जाता है कि यह पद चिन्ह भगवान राम का है। भगवान राम वनवास के समय यहां आये थें इस स्थान पर प्रतिवर्ष रामनवमी में मेला लगता है, भक्त गण पदचिन्ह का दर्शन करने बराबर यहां आते हैं और श्रावण में भगवान षंकर को जलाभिशेक के लिए लिए यहां से जल उठाते हैं। महाभारत काल :- पाण्डवों के वनवास में एक वर्ष अज्ञात वास का भी था। अज्ञातवास में एक शर्त था कि अज्ञात वास के क्रम में कोई भी पाण्डव पहचान लिया जाता तो उन्हें पुनः वनवास करना पड़ता। यह क्षेत्र उस समय घने जंगलों से आच्छादित था पाण्डवों को यहां छिपने का उपयुक्त स्थान मिला। अज्ञात वास के दौरान उन्हें जल की आवश्यकता पड़ी तो अर्जुन ने वाण मार कर पाताल से पानी निकाला कालान्तर में यह चुंआ बना। इसी चुंआ से जल प्रवाहित होता गया जो आगे चल कर स्वर्णरेखा नदी बन गई। इसके पार्श्व में बने वस्ती का नाम पाण्डवों के नाम पर रखा गया-पाण्डू गांव। बताया जाता है कि पाण्डवों के जाने के बाद एक राजा का महल बना उस महल के अन्दर से एक सुरंगनुमा रास्ता था। इसी रास्ता से रानी स्नान करने चुंआ पहुंचती थी। संभवतः इसी के लगता है तथा श्रावण में भक्त गण यहां से जल उठा कर पैदल रांची पहाड़ी पहुंच कर भगवान शंकर को जलाभिषेक करते हैं। गंगा धारा :- प्रखण्ड मुख्यालय से 5 किलोमीटर की दूरी पर दक्षिण पश्चिम कोने पर गंगा धारा है, जिसके सम्बंध में कहा जाता है कि यह पतीत पावनी गंगा का अंश है। हरही गांव में एक तालाब है जहां से धारा बहती रहती है, लोग इस बात पर आश्चर्य करते हैं इस जल का श्रोत कहां है। यह जल तालाब के बगल में स्थित एक प्राचीन शिवलिंग में गिरता है, बर्तमान में यहां एक मंदिर का निर्माण कराया गया है अनोखा सत्य :- नगड़ी चौक से 1 किलोमीटर पश्चिम में एक बांध है- खोजा बांध, इसके बगल में कुछ चिकने पत्थर थे अलग-अलग आकृतियों में इन पत्थरो में भी कुछ रहस्य छिपे थे। कहा जाता है कि उस समय लोग इस स्थल पर रंग बिरंगे कपड़े पहन कर नहीं आ सकते थे। नही ंतो परिणाम भयंकर होता था। बुजुर्गो के अनुसार रात होने के कारण यहां एक बारात रूक गयी थी सुबह तक सब पत्थर में परिणत हो थे, इस जगह पर घोड़े हाथी रथ सब पत्थर हो गये। यहां पर घोड़ा, हाथी, रथ, तलवार और बरतन कर आकृति वाले पत्थरो को इस लेख के लेखक ने स्वयं देखा था। बाद में अंग्रेज सैंनिक कुछ पत्थर ले गये थे और कुछ पत्थरो को ग्रामीण ले गये। द्वितिय विश्व युद्ध के दौरान यह इलाका अंग्रेज फौज से भरी हुई थी। उनकी छावनी सताईस पतरा(जंगल)में थी, सताईस भागो में बंटे रहने के कारण इसका नाम सताईस पतरा पड़ा। सैनिको की चांदमारी से क्षेत्र गुंजता रहता था। उनके द्वारा निर्मित मार्ग और पुल कुछ समय पहले तक थे। इसी के बगल में एक अंग्रेज औफिसर रहते थे जिनका नाम पिस्का था इन्हीं के नाम पर पिस्का बगान, पिस्का रेलवे स्टेशन, पिस्का मोड़ पड़ा। वर्ष 2008 में नगड़ी को प्रखण्ड का दर्जा मिला उसके बाद नगड़ी का विकास आरंभ हो गया। तेरह पंचायतों का नगड़ी प्रखण्ड की आबादी 2011 के जनगणना के