साहित्य को अंर्तराष्ट्र्रीय पहचान दिलायी पी ओ बोडिंग स्ांताली भाषा

|

तस्वीर द्वारा-

|

लेखक-शैलेन्द्र सिन्हा

image

image

साहित्य को अंर्तराष्ट्र्रीय पहचान दिलायी पी ओ बोडिंग स्ांताली भाषा के ओलचिकी लिपि में अब मुद्रित होंगेंं भारतीय रूपये स्ांताली भाषा,साहित्य के इतिहास में रेवरेन्ड पाउल ओलॉफ बोडिंग (पी ओ बोडिंग) का नाम अमर है।उन्होंने संताली लोक साहित्य,अनुवाद,शब्दकोश,पत्रकारिता के क्षेत्र में अनेक कार्य किये और संताली साहित्य को अंर्तराष्ट्रीय पहचान दिलायी।पीओ बोडिंग ने संताली साहित्य के लिए वही काम किया जो हिन्दी साहित्य के लिए फादर कामिल बुल्के ने किया,आज दोनों अमर हैं।विदेशी मूल के बोडिंग मुलतः नार्वे के रहनेवाले थे,वे ओस्लो विश्वविघालय से पढ़ाई की,वे आजीवन कई विषयों पर शोधकार्य करते रहे।19 वीं सदी के उत्तरार्ध में वे ईसाई धर्म प्रचारक बने,बोडिंग के माता पिता ने अपने संतान को संताल मिशन के नाम समर्पित कर दिया था।भारत प्रवास के दौरान वे दुमका जिले शिकारीपाडा प्रखंड के बेनागडिया नामक गांव में बैलगाडी से आये थे।वे हावडा से रामपुरहाट तक रेल की सवारी की और वहां से बेनागडिया मिशन आये थे।वे कुछ दिन मोहुल पहाडी क्रिश्चियन अस्पताल में रहे।वर्ष 1890 में वे भारत आये और वे रेवरेन्ड एल ओ स्क्रेफ्स्रूड के साथ रहे,एल ओ स्क्रेफ्स्रूड संतालों के बीच काम कर रहे थे।बोडिंग ने सबसे पहले संताली भाषा सीखी,संताली लोक कथाओं का अनुवाद किया।बेनागडिया मिशन में एक छापाखाना था,जिसमें मासिक समाचार पत्र होड होपोन रेन पेडा का प्रकाशन होता था।बोडिंग ने सर्वप्रथम बाईबल का संताली में अनुवाद किया,विश्व के किसी भी देश में संताली भाषा भाषी निवास करते हैं,वे बोंडंग के संताली में लिखे बाईबल ही पढ़ते हैं।आज संताली बाईबल के सौ वर्ष हो चुके हैं।वे साहित्य के साथ जडी,बुटी पर शोध कार्य किया,संताल मेडिसिन एंड कनेक्टेड फॉकलोर नामक पुसतक लिखी,जिसका प्रकाशन वर्ष 1925 में हुआ।आयूर्वेद व चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में संताली भाषा में दुर्लभ जडी बुटियों के गुणों के बारे में भी बोडिंग ने लिखा।बोडिंग विलक्षण प्रतिभा के स्वामी थे,उनके बारे में कहा जाता है कि संतालों के सामाजिक रीति रिवाजों,लोक कथा जो अलिखित था,उसका दस्तावेजीकरण बोडिंग ने किया,जो आज भी समीचीन है।उन्हें इसाई धर्म के बारे में गहरी समझ थी,वे स्थानीय संतालों की मदद से संताली लोक कथाओं के साहित्य का सृजन किया,वे मानवीकी के क्षेत्र में गहन शोध किया।बोडिंग द्वारा रचित संताल लोक कथा संकलन संताल फॉक टेल्स के माध्यम से दुनियां को संतालों के बारे में बताया।उनका हमेंशा ध्येय था कि लोग संतालों के बारे में जानें,संताली शब्दकोश आज विश्वकोश के बराबर हो गया,उनकी लिखी पुस्तक संताल डिक्सनरी वर्ष 1923 में प्रकाशित हुआ। बोडिंग संताली पत्रकारिता के जनक माने जाते हैं,संताली का पहला समाचार पत्र जिसका नाम होड होपोन रेन पेडा,जिसका हिन्दी अर्थ है,संतालों के अतिथि, के संपादक भी रहे,वे पेडा होड नामक पत्रिका के संपादक के रूप में साहित्यिक पत्रकारिता का नमूना पेश किया जो रोमन लिपि में प्रकाशित होता था।बोडिंग ने पत्रकारिता को एक उॅचाई प्रदान की, पेडा होड पत्रिका के माध्यम से वे संतालों के साथ संवाद करते थे।संताली साहित्य में बोडिंग के देन को कभी भुलाया नहीं जा सकता।बोडिंग ने 44 साल में 34 ग्रंथों की रचना की,उनकी रचना संताली,अंग्रेजी,एवं नार्वेजियन भाषा में प्रकाशित हुए,वे बहुमुखी प्रतिभा के व्यक्ति थे।उनकी पहली पुस्तक मेटेरियल्स फॉर संताली ग्रामर,वर्ष 1922 में बेनागडिया मिशन द्वारा प्रकाशित हुई।बोडिंग के कार्य को ठीक उसी प्रकार देखा जाना चाहिए जैसे मुंडा जनजाति के संबंध में लिखने से पहले फादर हॉफमैन लिखित इन्साइक्लोपिडीया मुंडारिका का अध्ययन आवश्यक है।संताली साहित्य को समग्रता में देखने पर पी ओ बोडिंग की देन अविश्वसनीय प्रतित होती है,एक अलिखित भाषा को लिखित रूप में विकसित करने,भाषा वैज्ञानिक पक्ष में मजबुती देने,लोक साहित्य के विशाल भंडार का संकलन करने,पत्रकारिता के क्षेत्र में इस भाषा को स्थापित करने,भाषा के व्याकरण को व्यावहारिक जामा पहनाने और विशाल संताली शब्दकोष की रचना जैसे कार्य पीओ बोडिंग ने किया है,उनका अद्भुत व्यक्तित्व था और वे दुरगामी सोच रखते थे। संताली भाषा में लिपि की समस्या रही है,संताली भाषा कई लिपि में लिखी जाती रही है।मुख्यतः संताली रोमन,देवनागरी,बांग्ला एवं ओल चिकी में लिखा जाता है,सभी लिपि में लिखनेवाले अपने को श्रेष्ट मानते हैं।संताली साहित्य में अधिकतर रचना रोमन और देवनागरी लिपि में हुई है,डा0 डोमन साहू समीर,डा0 बासुदेव बेसरा,बाबूलाल मुर्मू आदिवासी सहित दर्जनों लेखकों ने बहुमूल्य रचना की,लेकिन साहित्य अकादमी ने इन सबको पुरस्कृत नहीं किया।साहित्य अकादमी द्वारा ओलचिकी में लिखी साहित्य को पुरस्कार दिया गया।ऐसे में लिपि को लेकर मतभेद स्वाभाविक है।प्रसिद्व लेखक रघुनाथ हांसदाक् ने अपनी पुस्तक संताली भाषा की अग्निपरीक्षा में ओलचिकी लिपि को अवैज्ञानिक एवं दोषपूर्ण माना है,पुस्तक में लिखा है कि ओलचिकी का सीमित जनाधार है जो उडीसा,बंगाल एवं झारखंड के सिंहभूम जिला के आसपास सीमित है।संताल परगना में ओलचिकी में लिखनेवालों की संख्या कम है।ओलचिकी लिपि का प्रचार प्रसार बडे पैमाने पर नहीं है,इसलिए अधिकतर साहित्यकार रोमन और देवनागरी में लिख रहे हैं।लेकिन ओलचिकी लिपि को साहित्य अकादमी ने मान्यता प्रदान की है,अब भारतीय रिजर्व बैंक ने संताली भाषा के ओलचिकी लिपि को राष्ट्र्र्रीय व अंतराष्ट्र्रीय पहचान दिलाने के लिए रूपये में मुद्रित करने का काम शुरू कर दिया है।भारतीय रिजर्व बैंक के मुद्रा प्रबंध विभाग ने इस आशय का पत्र विश्व सरना संगठन के अध्यक्ष मंगल मांझी को दिया है।संताली भाषा रक्षा समिति के संयोजक सामूएल सोरेन ने कहा कि संताल परगना से ही संताल को जाना जाता है और यहां रोमन में साहित्य की रचना हो रही है,ऐसे में साहित्य अकादमी किस आधार पर ओलचिकी को मान्यता दे रही है।उन्होंने बताया कि