विकास एक हिंसक कार्यवाही है

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-राहुल सिंह

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इस देश में शब्दों की अर्थवत्ता का सबसे ज्यादा अवमूल्यन राजनीतिज्ञों ने किया है। ऐसे शब्दों की लम्बी सूची है, हाल के दिनों में जो शब्द इस अवमूल्यन का शिकार हुआ है, वह ‘विकास’ है। विकास के दिगन्तव्यापी शोर के तलहटी में जाकर देखें तो मालूम होता है कि यह मूलतः एक आर्थिक गतिविधि है। इस आर्थिक गतिविधि की पैकेजिंग इस ढंग से की गई है कि पहली निगाह में प्रतीत हो कि यह आम जन के लिए है, पर वस्तुतः इसके लाभुकों का अलग गिरोह है। इसमें राजनीतिज्ञ, औद्योगिक घराने, कारपोरेट जगत, मीडिया समूह आदि का एक गठबंधन काम कर रहा है। सरकार की आर्थिक विकास की नीतियों को राष्ट्रहित में और जनहित में प्रचारित कर उसके पक्ष में माहौल बनाने का काम यह मीडिया समूह करते हैं। इसमें इलेक्ट्रानिक और प्रिंट मीडिया दोनों शामिल हैं। इन मीडिया समूहों का मालिकाना हक भी औद्योगिक घरानों के पास ही है। सरकार के पक्ष में जनमत बनाने के एवज में उनके मीडिया समूहों को एक ओर तो विज्ञापन मिलता है, दूसरी ओर उसके कुछेक संपादक-पत्रकारों को वो गाहे-बगाहे राज्यसभा में भेजकर उपकृत भी करती रहती है और इन सबसे बढ़ कर उनके मालिकों के कर्जे माफी से लेकर देश के प्राकृतिक संसाधनों के दोहन का ठेका भी औने-पौने भाव में दे दिया जाता है। कोयला, लौह अयस्क की खानों की दोबारा तिबारा निलामी के पीछे यही खेल चल रहा है। प्राकृतिक संसाधन अब वहीं बचे रह गये हैं, जहाँ विकास का यह रथ नहीं पहुँचा है। कहना ना होगा कि इस देश में जंगल, पहाड़, नदियों को बचाने का काम उन समुदायों ने किया है जिन्होंने विकास की इस अंधी दौड़ में शामिल होने से इनकार कर दिया है। इन समुदायों में जनजातियाँ (आदिवासी समुदाय) सर्वप्रमुख है। उसके बाद किसान हैं। आदिवासी जो सदियों से नागर समाज और विकास की मुख्यधारा से दूरी बनाकर एक आत्मनिर्भर समाज के बतौर अस्तित्व में रहा है। सरकार विकास के नाम पर उनके आत्मनिर्भर जीवन की रीढ़ तोड़ रही है। एक ओर वह उनको जल, जंगल, जमीन से विकास के नाम पर बेदखल कर रही है, दूसरी ओर उनकी स्त्रियों की बच्चेदानी निकालने का राष्ट्रीय कार्यक्रम निर्लज्जता से चला रही है, तीसरी ओर उनके बच्चे बाल श्रमिक और बंधुआ के बतौर काम करने को अभिशप्त हैं। पिछले डेढ़ दशक में जितने किसानों ने इस देश में आत्महत्या की है, वह राष्ट्रीय शर्म का विषय है। इस देश की सरकारों ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों के ‘जेनेटिकली मोडिफाइड’ बीज और उर्वरकों के इस्तेमाल के जरिये ना सिर्फ इस देश की जैव विविधता को नुकसान पहुँचाने का काम किया है बल्कि धरती की बंजरता को भी बढ़ाने का काम किया है। भारी बहुमत से चुनकर आई इस बार की नमो सरकार इस मामले में और दो कदम आगे बढ़ चुकी है। ‘मेक इन इंडिया’ का डुगडुगी पूरी दुनिया में घूम-घूम कर बजानेवाला यह आदमी मोजाम्बिक से दाल आयात करने का समझौता कर आया है। इस समझौते की खासियत यह है कि मोजाम्बिक के किसान जितने दाल का उत्पादन करेंगे उसको एक निर्धारित दर पर खरीदने की गारंटी भारत सरकार दे आई है। हमारे देश के किसान गर बंपर उत्पादन करें तो उनको लागत निकालना मुश्किल हो जाता है। मंडियों में उनके फसलों को कोई उठाने वाला नहीं होता है। लखीमपुर खीरी (उत्तर प्रदेश) के गन्ना किसानों से जाकर सरकार के विकास के दावों के बारे में बात कीजिए। नासिक के प्याज उत्पादकों से जाकर पूछिये कि इस साल उनकी फसल का क्या दाम मिला है? यह सरकार औद्योगिक घरानों की जितनी सब्सिडी माफ कर देती है, उतने में इस देश के किसान कर्जमुक्त हो सकते थे। पर असल बात यह है कि वे चुनाव के वक्त प्रचार के लिए माफ किये गये सब्सिडी के पैसे उपलब्ध नहीं करा सकते हैं। इस सरकार ने केरोसिन से हर महीने पच्चीस पैसे की सब्सिडी खत्म करने का निर्णय लिया है। अगर पच्चीस पैसा बहुत मामूली लग रहा है तो मिसाल के लिए इसे ऐसे समझें कि हर महीने किरोसिन के दाम में होने वाली इस पच्चीस पैसे की बढ़ोत्तरी से ओएनजीसी जैसी कंपनी महीने का एक हजार करोड़ रुपया अतिरिक्त कमायेगी। अब गैस की सिलिंडरों में बढ़नेवाले दस-बीस रुपये से उन औद्योगिक घरानों की जेबें कैसे भरतीं होंगी इसका अनुमान भर ही किया जा सकता है। आजादी के बाद केरोसिन की कीमतों पर हाथ डालने का यह दुस्साहसिक फैसला आज तक कोई सरकार नहीं कर सकी थी। उनकी आंखों में इतना पानी बचा था। उन्हें मालूम था कि केरोसिन का इस्तेमाल किस आर्थिक आधार वालों के घर में होता है। यह सरकार उनकी ढिबरी भी बुझाने में लगी है। गरीबों की इन चवन्नियों से यह सरकार देश का विकास करना चाहती है। हर राज्य में एकाध स्मार्ट सिटी को विकसित करने की परिकल्पना के मूल में उस राज्य की प्राकृतिक संपदा के दोहन के लिए कारपोरेट घरानों को एक ठौर उपलब्ध कराना बुनियादी मकसद है। एक आम आदमी के लिए शुद्ध जल की उपलब्धता ज्यादा आवश्यक है या मुफ्त वाई-फाई? आखिर यह कैसा विकास है, जो ‘ग्रीनहंट’ के नाम पर आदिवासियों को उनके जल-जंगल-जमीन से ही नहीं जीवन से भी बेदखल करता है। यह कैसा विकास है जो अपने औद्योगिक आंकड़ो की वृद्धि पर तो झूमता है पर किसानों की मौत की नोटिस तक नहीं लेता है। यह कैसा विकास है जो एड्स की जागरुकता के नाम पर अरबों फूंक देता है और मामूली मलेरिया, हैजा, इंसेफाइलाइटिस से होनेवाली मौतों की अनदेखी करता है। यह कैसा विकास है जो अशिक्षित ग्रामीण महिलाओं को भेड़-बकरियों से भी बदतर तरीके से बंध्याकरण करता है। यह कैसा विकास है जो अल्पसंख्यकों में भय को बोने का काम कर रहा है। इन सब बुनियादी सवालों के बरक्स पिछले दो दशक के सरकारों के कार्यों का मूल्यांकन करेंगे तो पायेंगे कि विकास के नाम पर अपनी आबादी की जितनी हत्यायें इन्होंने की है, उतने तो आज तक किसी युद्ध में नहीं मारे गये होंगे। विकास के नाम पर जो नीतियाँ बनाई जा रहीं हैं, उनकी नीतिगत संरचना में ही हिंसा अन्तर्निहित है। कोई भी आर्थिक नीति आज के दिन में एक हिंसक गतिविधि बन गई है। चाहे वह हिंसा मनुष्य के साथ हो या प्रकृति के साथ हो। सरकारें सबसे ज्यादा