कुरमाली भाषा साहित्य एवं लोकगीत

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-डॉ० राजा राम महतो

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डॉ० राजा राम महतो राष्ट्रीय अध्यक्ष, कुरमाली भाषा परिषद कुरमाली एक अन्तर प्रान्तीय भाषा है। इसका विस्तार क्षेत्र ‘‘उड़िष्य षिखर, नागपुर, आधा-आधी खड़गपुर‘‘ लोकाक्ति से ज्ञात होता है। कुरमाली का क्षेत्र राजनीतिक मानचित्र द्वारा परिसीमित नहीं किया जा सकता। यह केवल झारखण्ड ही नहीं बल्कि प० बंगाल के पुरूलिया, बाँकुड़ा, मिदनापुर, उड़िसा राज्य के क्योंझार, बोनई, बामड़ा, मयुरभंज, सुन्दरगढ़, आसाम के डिबरूगढ़ जिला, बिहार के पुर्णिया जिला के दमदाहा प्रखण्ड का भाव विनिमय का माध्यम कुरमाली ही है। झारखण्ड राज्य में मुख्यतः राँची, हजारीबाग, रामगढ़, धनबाद, गिरीडीह, बोकारो, पूर्वी सिंहभूम, प० सिंहभूम, सरायकेला, खरसांवा, गोड्डा, देवघर, साहेबगंज में बोली जाती है। कुरमाली भाषा का लोकसाहित्य विषय-वैविध्य की दृष्टि से विषाल एवं उच्च काव्य मूल्य की दृष्टि से अत्यन्त समृद्ध है। काव्यरूप में लोकगीत है। लोकगीतों के भी विविध रूप है, जो मौसम के अनुसार गाये जाते हैं। ये गीत-करम, एड़ेया, बाँदना, ढप, टुसू, बिहा, डमकच, डाबका, सरहुल, डॉड़धरा, उधवा, कुँवारीझुपान नाम से जाने जाते हैं। इन लोकगीतों में कुरमाली जन-मानस के समस्त आचार-विचार, हर्ष-विवाद, रूढ़ियाँ, आषा-आकांक्षाएँ, प्रवृत्तियाँ एवं संस्कार प्रतिबिम्बित होते हैं। अधिकांष गीत प्रष्नोत्तर शैली में है। कुरमाली लोकगीतों की विषेषता है कि विविध प्रकार के गीतों के राग अलग-अलग है तथा अलग-अलग ताल भी है। किसी भी गीत की पहचान उसके राग से ही होती है। विविध प्रकार के गीतों के वर्ण्य-विषय भी पृथक-पृथक है। अधिकांष लोकगीत किसी न किसी अनुष्ठान या संस्कार से सम्बन्धित है। कुरमाली समाज को कोई पक्ष, भाव तथा क्रिया-कलाप ऐसा नहीं जो इन लोकगीतों की परिधि में न आता हो। कुरमाली समाज की समग्र सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक चेतना का दिग्दर्षन उनके लोकगीतों में किया जा सकता है। कुरमाली के अधिकांष लोकगीत नृत्यगीत है। सभी गीत मौसमी है, जिनके ताल, लय और बाजे के बोल मौसम के अनुसार अलग-अलग है। अधिकांष गीत किसी न किसी अनुष्ठान या पर्व-त्योहार से संबंधित है। एक मौसम के गीत दूसरे मौसम में गाने की परिपाटी नहीं है। सुरों के आधार पर ही कुरमाली लोकगीतों की पहचान होती है और सुर के आधार पर ही गीतों के पार्थक्य को जाना जा सकता है। कुरमाली के अधिकांष लोकनृत्य (।दजपबसवबा ूपेम) शैली में है। कुरमाली गीतों में अनेक राग-रागिनियाँ है। गीत के अनुसार ताल बजते हैं और मौसम के अनुसार गीत गाये जाते हैं। फलतः राग और ताल बदलते हैं। अनुष्ठान के अवसर पर स्त्री-पुरूषों का सामूहिक नृत्य-गायन होता है। कोई ऐसा संस्कार या अनुष्ठान नहीं जो गीत और नृत्यों के बिना पूरा होता हो। इन गीतों का एक बड़ा भाग विवाह गीत है। कुरमाली में इन्हें ‘बिहा गीत‘ कहा जाता है। विभिन्न नेग-दस्तूरों के अपने-अपने गीत हैं और ये गीत विवाह के हर्ष-उल्लास के साथ-साथ इन रस्मों के महत्व को स्पष्ट करते हैं। विवाह गीतों में प्रमुख लगन एवं विदाई के गीत हैं। विदाई के गीत बड़े ही कारूणिक होते हैं। किसी भी प्रकार के विवाह गीतों के साथ वाद्य-यन्त्रों का प्रयोग नहीं होता है। कुरमियों की वैवाहिक पद्धति का अपना वैषिष्ट्य है। विवाह योग्य लड़के पिता या अन्य सम्बन्धियों द्वारा कन्या ढँंढ़ने की प्रथापायी जाती है। कन्या का पिता लड़के की खोज नहीं करता है। कन्या ढूँढ़ने की बड़ी ही मनोरंजक प्रथा है। इनका पारम्परिक विवाह ‘हाँड़ी विवाह‘ कहलाता है। दो कोरी हाँड़ियों में वर एवं वधू सिन्दूर का टीका लगा कर बिना किसी आडम्बर के सिन्दूरदान के साथ विवाह सम्पन्न हो जाता है। ब्राह्मण की उपस्थिति विवाह में अनिवार्य नहीं है। यह तथ्य शोध का विषय बन जाता है कि जहाँ अन्य कई जातियां ब्राह्मण को पूजती हैं, वहाँ कुरमी ब्राह्मण का छुआ खाना नहीं खाते थे। कुरमियों में दहेज-जैसी घातक प्रथा का प्रचलन भी नहीं है। साथ ही, इनमें विधवा-विवाह को सामाजिक मान्यता प्राप्त है। इस प्रकार के विवाह को ‘सांघा‘ कहा जाता है। विभिन्न प्रथाओं की भांति ही विवाह गीत भी विविध है। इनमें सं ‘संगी छाड़ा‘ गीत बड़े ही प्रभावोत्पादक होते हैं। विवाह गीतों के अलावा व्रत-त्योहार के गीतों का भी कुरमाली लोकगीतों में महत्वपूर्ण स्थान है। इनमें प्रमुख हैं- करम गीत, सोहराय गीत, टुसू गीत, मनसा पूजा के गीत एवं सरहुल गीत। करम गीतों में से कुछ का सीधा सम्बन्ध व्रत और त्योहार से है, तो कुछ के वर्ण्य-विषय राम-सीता या कृष्ण हैं। कुछ गीत अन्य विषय से सम्बद्ध है। अधिकांष करम गीत नृत्य गीत हैं। ये युवतियों एवं बालिकाओं द्वारा गाये जाते हैं। सोहराय गीत सोहराय पर्व के अवसर पर विषेष रूप से गाये जाते हैं, लेकिन इनका गायन करम त्योहार की समाप्ति के साथ ही आरम्भ हो जाता है। इनके भी कई प्रकार हैं, जिनमें किसान और अहीर के प्रष्नोत्तर गीत बहुत ही मनोरंजक है। सोहराय गीत, अधिकांषतः पुरूषों द्वारा गाये जाते हैं। कुछ सोहराय गीत बहुत लम्बे होते हैं। टुसू गीतों का गायन एक महीना चलता है। मकर संक्रान्ति के दिन टुसू पर्व मनाया जाता है। व्रत करनेवाली बालिकाओं के द्वारा अगहन की समाप्ति से लेकर टुसू पर्व तक प्रतिदिन शाम को ये गीत गाये जाते हैं। नागों की देवी ‘मनसा‘ की पूजा से सम्बन्धित गीत भी हैं। इन गीतों में मनसा देवी के अलावा अन्य देवी-देवताओं के प्रति भी श्रद्धा अभिव्यक्त हुई है। इस पूजा से सम्बन्धित कथा भी गीतों में मिलती है। ‘सरहुल गीत‘ सरहुल त्योहार से सम्बन्धित तथा सामान्य जीवन की बातों के गीत होते हैं। कुरमाली ऋतुगीतों में प्रमुख ‘भादरिया‘ गीत वर्षा ऋतु में गाये जाते है- में गीत युवकों के द्वारा रात्रि के समय गाये जाते हैं। इन गीतों के साथ मुख्य रूप से ढोल, नगाड़ा, बंसी, शहनाई आदि वाद्य-यन्त्रों का प्रयोग होता है। कुछ कुरमाली वर्षा गीतों में वर्षा की चार ऋतुओं का वर्णन पाया जाता है, में गीत ‘चौमासा‘ कहे जाते हैं। इनमें भी अन्य भाषाओं के चौमासों की तरह वर्षा द्धतु की उद्दीपक रू