वयस्क शिक्षा तथा सामाजिक विकास

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-राजीव करण

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किसी भी राष्ट्र की मूल शक्ति उसके शिक्षित और साक्षर नागरिक होते हैं जो उसके सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक तथा आर्थिक विकास के मूल उपादान भी हैं। विशेष रूप से भारत के सामाजिक विकास में साक्षरता का विशेष महत्व है। विकास के मानकों में मानव विकास सूचकांक का महत्व सर्वप्रथम है तथा शिक्षा और साक्षरता इसके अंतर्गत एक तय मानक है। आजादी के पश्चात भारत में प्रारंभिक शिक्षा तथा वयस्क शिक्षा के लिए किये गये प्रयासों के परिणामस्वरूप साक्षरता की दर में वृ( हुयी है। वर्ष 1951 की तुलना में जब कुल साक्षरता 18.33 प्रतिशत तथा महिला साक्षरता का प्रतिशत 8.86 था, के मुकाबले वर्ष 2011 में क्रमशः 74.02 तथा 65.46 प्रतिशत साक्षरता अवश्य ही प्रगति का सूचक है। परंतु वर्तमान समय में देश की एक बड़ी आबादी का अभी भी निरक्षर रहना चिंता का विषय है साथ ही बड़ी चुनौती भी है। विभिन्न आंकड़ों के आधर पर पूरे विश्व की निरक्षर आबादी का दो तिहाई हिस्सा भारत में निवास करता है। आज भी देश के ऐसे जिलों की संख्या सैकड़ों में है जहां महिला साक्षरता की दर 50 प्रतिशत या इससे कम है और ये जिले अध्किंश बिहार, राजस्थान, झारखंड, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा तथा आंध््र प्रदेश जैसे राज्यों से हैं। अमूमन शिक्षा तथा साक्षरता को अलग-अलग नहीं बल्कि एक साथ देखा जाता है जबकि कार्यक्रम के स्तर पर औपचारिक शिक्षा तथा वयस्क साक्षरता के रूप में इनका कार्यान्वयन होता है। अनौपचारिक शिक्षा के तौर पर संचालित वयस्क साक्षरता अपेक्षाकृत उपेक्षित विषय रहा है। कई वजहों से साक्षरता कार्यक्रम अंतर्गत साक्षर बने लोगों को हस्ताक्षर भर कर लेनेवाले व्यक्तियों का समूह मान लिया जाता है। शिक्षित, विशेष कर शहरी शिक्षित वर्ग वयस्क साक्षरता कार्यक्रम को अनपढ़ों का कार्यक्रम के रूप में देखते हैं तथा यह मान लेते हैं कि पढ़े-लिखे होने के कारण उनका इस कार्यक्रम से कोई लेना-देना नहीं है। बेशक, वयस्क साक्षरता की स्पष्ट परिभाषा के बावजूद यह सर्वमान्य परिचय बनाने में असपफल रही हो परंतु कार्यात्मक साक्षरता हेतु स्थापित मानदंडों के आधर पर इसकी व्यापकता का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। कार्यात्मक साक्षरता के तात्पर्य है कि कोई व्यक्ति अंक-अक्षर यानी पढ़ने-लिखने और गणित में आत्मनिर्भर हो तथा साक्षरता से प्राप्त हुनर का दैनिक जीवन के कार्यां में उपयोग करें। साथ ही संगठित प्रयास से समुदाय में सामाजिक एवं आर्थिक बदलाव का प्रयास करे। साक्षरता की स्वीकृत परिभाषा के अनुसार साक्षरता कक्षाओं में नामांकित सभी शिशिक्षु सार्थक अर्थ में साक्षर नहीं हो पायें हो। परंतु इन शिशिक्षुओं के संगठित प्रयासों से कई सामाजिक बदलाव स्पष्ट दिखते हैं। भारत में वयस्क साक्षरता भारत में प्रौढ़ शिक्षा का इतिहास पुराना है हांलाकि इसके स्पष्ट साक्ष्य नहीं है। भारत का स्वाध्ीनता आंदोलन के दौरान देश के कई हिस्सों में रात्रि पाठशाला के माध्यम से वयस्क शिक्षण का कार्यक्रम चलाया गया परंतु यह मौखिक ज्यादा था और लिखित कम। इस कार्यक्रम में ऐतिहासिक महत्व की बातें, स्वास्थ्य, सपफाई तथा प्राथमिक चिकित्सा आदि विषय प्रमुखता से शामिल थे। परंतु यह स्पष्ट है कि साक्षरता के साथ सामाजिक बदलाव एक स्तंभ के रूप में रहा। वर्ष 1938-39 में विभिन्न प्रांतीय सरकारों के द्वारा प्रांतीय जन साक्षरता अभियान की शुरूआत हुयी। एक अनुमान के अनुसार लगभग 4 लाख लोग कार्यक्रम अंतर्गत साक्षर बने। दूसरी ओर, जन साक्षरता अभियान ने समाज सुधर आंदोलनों को गति प्रदान करने में उल्लेखनीय भूमिका अदा किया। भारत की आजादी के उपरांत वर्ष 1949 में ‘सिविक’ साक्षरता को लागू किया गया जो बाद के वर्षों में समेकित रूप से सामाजिक विकास कार्यक्रम के साथ संचालित रहा। वर्ष 1960 में पहली बार कार्यात्मक साक्षरता की अवधरणा उभर कर आयी हांलाकि इसका ज्यादा पफोकस कृषि तथा व्यावसायिक शिक्षा पर रहा। वयस्क साक्षरता तथा इसके सामाजिक प्रभाव को ध्यान में रखकर वर्ष 1978 में राष्ट्रीय वयस्क शिक्षा कार्यक्रम ;छ।म्च्द्ध घोषित हुआ। लक्ष्य समूह की उत्पादकता तथा राष्ट्रनिर्माण में योगदान जैसी बातों को ध्यान में रखकर कार्यक्रम अंतर्गत 15-35 आयुवर्ग के सभी असाक्षरों को साक्षर बनाना तथा उन्हें अध्किर एवं कर्तव्यों पर जानकारी प्रदान करने का उद्देश्य निर्धरित किया गया। वयस्क साक्षरता में बड़ा बदलाव वर्ष 1988 में आया। इसी वर्ष राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की स्थापना हुयी तथा केरल के एर्नाकुलम मॉडल पर पूरे देश में संपूर्ण साक्षरता अभियान की शुरूआत हुयी। मिशन मोड में संचालित इस अभियान अंतर्गत चरणब( तरीके से 513 जिले शामिल किये गये। लाखों स्वयंसेवक शिक्षकों के द्वारा संचालित साक्षरता कक्षाओं में 7 करोड़ से अध्कि असाक्षर नामांकित एवं साक्षर हुये। नब्बे के दशक के अंत तक दो अन्य कार्यक्रम-उत्तर साक्षरता तथा सतत शिक्षा कार्यक्रम के जुड़ने से ग्रामीण पुस्तकालय, कौशल विकास तथा स्वयं सहायता समूह का गठन आदि गतिविध्यिं तेज हुयी। लगभग 20 वर्षों तक संचालित इन कार्यक्रमों से प्राप्त अनुभवों, मजबूत तथा कमजोर पक्षों की समीक्षा के आधर पर वयस्क साक्षरता कार्यक्रम को ठोस आधर देने का कार्य शुरु किया गया। वर्ष 2009 में वयस्क शिक्षा कार्यक्रम को नया रूप देते हुए साक्षर भारत कार्यक्रम की घोषणा की गयी। साक्षरता कार्यक्रम को पहली बार संस्थागत ढांचे में रखा गया तथा कंप्यूटर टेक्नोलॉजी का उपयोग प्रारंभ हुआ। इस कार्यक्रम अंतर्गत 7 करोड़ वयस्क असाक्षरों को साक्षर बनाने का लक्ष्य रखा गया। इस कार्यक्रम की दो खास बातें हैं- पहला, उम्र के बंध्न को समाप्तकर 15 वर्ष एवं इससे ऊपर आयुवर्ग के सभी वयस्क लाभार्थी होंगे तथा दूसरा, सभी नामांकित शिशिक्षु आकलन परीक्षा में शामिल होकर राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान से प्रमाण-पत्रा प्राप्त कर सकेंगे। वर्तमान में 367 जिलों में संचालित इस कार्यक्रम अंतर्गत 5.50 करोड़ शिशिक्षुओं का प्रमाणीकरण किया गया है। सामाजिक पहलु को ध्यान में रख