अभिव्यक्ति की आजादी देता ‘‘कला और संस्कृति’’

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-आलोका

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जितना उंचा पहाड़ उतनी उंची हमारी संस्कृति, जितनी लम्बी नदियां उतना लम्बा हमारा इतिहास, कला संस्कृति लोगां के सामाजिक जीवन को अभिव्यक्ति से जुड़ा है। सुख, दुःख, विवाह, त्यौहार, श्रम, जन्म, मृत्यू तक लोग की कला संताल समाज में उभर कर आती है। जिसमें लोगकला के पहलू और कल्पना से उकेरे तमाम पहलू को अभिव्यक्त करती है। संताल समाज कल्पनाशील होने के साथ वे प्रकृति प्रेमी भी है। सामूहिक जीवन शैली के तमाम पहलू पर पैनी नजर है उनके कला में देखने को मिलता है। संताल समुदाय जीवन के कला को खूद के बल पर खड़ा किया। कला इस दुनिया को उन्हें शायद प्रकृति प्रेम से प्राप्त होता है। स्ांताल आदिवासी मूलतः नेपाल बांगलादेश और भारत में है। भारत के अन्य राज्य में 18 लाख लगभग आबादी है। जिसमें झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, उडिसा, असम में इनकी बड़ी आबादी सबसे अधिक निवास करते है। वहां अपनी लोक संस्कृति के कारणा गांव में अलग पहचान मौजूद है। इनकी चित्रकला के शैली या रहन- सहन, या खान- पान जीवन जीने के सलिके में कला विधमान है। खेती करना परम्परागत कला रहा है। वहीं घर सजानें की विधा उनकी अपनी परम्परागत उसे प्राकृति ने दे दिया है। रंगों से सामाहित रंगों का प्राकृति रूप से जोड़कर चयन करना अन्य समाज से अलग करता है साफ- सुथरे जीवन शैली के बीच चित्रकला का उभार, उस उभार में वन पशु- पक्षी और पालतू पशु- पक्षी से लेकर तितली और मछली तक का सफर को अभिव्यक्त ही नहीं करता बल्कि इनके जीवन के सबसे नजदीक होने का एहसार करता है। 32 आदविसी समुदाय में से एक समुदाय संताल झारखण्ड के संथालपरगाना इलाके के अलावा हजारीबाग, गिरिडीह, जमशेदपूर के इलाकों में निवास करते है जिसमें अच्छी खासी गांव का नाम संताल आदिवासी की है। जिनका मुख्या पेशा खेती करना और शिकार करना प्राचीनतम कलाओं में एक था। सभ्यता का विकास और बाजारवाद का प्रवेश ने संताली चित्रकला के साथ उनके जीवन की अभिव्यक्ति के तमाम साधन को लूट कर गायब कर दिया है। जिससे समाज में नये चीजों का प्रवेष हो चुका है। भूमंडलीकरण के इस दौर में विकास की आंधी ने उनके मूल पेशा से दूर कर दिया है। जिससे अब मात्र 30 प्रतिशत ही खेती से जुडे हुए है। शिकार करना अब कहावत बनकर रह गयी। संताल समाज की अपनी परम्परागत सामाजिक और सांस्कृति व्यवस्था के साथ अपना राजनीति व्यवस्था बहुत मजूबत रही है। सभ्यता के विकास के साथ क्लासिकल युग अब पीछे होते गये और नयी पद्वित और नयी विधा से वो अपने को भारत के अन्य समुदाय के साथ मिलने चलने और बनने लगे। विस्थापन पलायन के बावजूद उनके गांव बसाने के अपने तौर तरीके अब बदल रहें है। गांव अब भी गांव है पर वह सुदूर में छिपा हुआ है। है वह संस्कृति पर उसे खोजने की जरूरत आन पड़ी है। 15 नवम्बर 2000 को झारखण्ड अलग राज्य अस्तित्व में आया। रांची झारखण्ड की राजधानी बनी और दुमका झारखण्ड राज्य की उपराजधानी बनी। क्षेत्र के बंटवारा के साथ भाषा-संस्कृति गांव की संरचना का आधार पहले से बना हुआ था। अपनी शासन व्यवस्था मांझी परगनैत की गांव को संचालित करने के लिए मौजूद रहा है। संताल समूदाय यू तो अपनी कला संस्कृति से प्राचीन काल से पहचाना जाता रहा है। जहां अपनी शासन व्यवस्था के साथ अपनी संस्कृति आम जनता से जुडे हुए रहे है। ब्रिटिश काल से संताल की संस्कृति के प्रति आकृर्षत का केन्द्र बिन्दू संताली चित्रकला के साथ उनके गीत, नृत्य गोदना कपडे ने बहारी लोगो को आकर्षित किया। यही कला ने अन्या समूदाय के बीच समजस्य स्थापित किया। किसी भी समुदाय की पहचान वहां के संस्कृति ताकत से देखा जा सकता है इस मामले में संताली समाज विश्व के अन्य आदिवासियों के तुलना में तीसरा स्थान रखता है। जिन्होंने अपनी संस्कृति को अपने जीवन में पिरों कर अभिव्यक्ति किया है। जो पूरी तरह प्रकृति के नजदीक संताल समुदाय के सामुहिकता को इंगित करता है। साहित्यो के प्रति संतालो का लगाव- 1852 में संताली भाषा में पहली किताब छप कर जो फिल्पस के सहयोग से कोलकता स्कूल बुक सोसाइटी प्रेस से प्रकाशित हुआ था। 1873 में संताली व्यांकरण की प्रति छप कर प्रकाशित हो गयी और साहित्य कला का यह सिलसिला चल पड़ा। धीरे- धीरे साहित्य कला के विकास के लिए कई नये पूराने परम्परागत चीजों को संग्रह करना शुरू हो गया 1914 में बाइबल का संताली में अनुवाद कर पूर्ण कर दिया गया। 1925 में रधुनाथ मूर्म ने ओलचिकी लिपि का आविष्कार कर प्रकाशित किया। अपनी लिपि को एक आधार दिया। देखते ही देखते 21वीं सदी आते आते साहित्य के दुनिया में संताली लेखक और किताबों के अम्बर हो गये जिसमें अपने जीवन के हर पहलू को गाते और नृत्य करते चले जा रहे है। आज के वक्त संताली साहित्य अन्य आदिवासी भाषा और साहित्य में प्रथम स्थान और भारत में अन्य साहित्य के तुलना में तीसरा स्थान माना गया है। सबसे अधिक साहित्य लिखने पढने का काम संताल समुदाय के बीच हुआ है। संताली संस्कृति - लोककला - संगीत, गीत के अपने पहलू है। लोककला के क्षेत्र में संगीत का जबरजस्त महत्व रखता है। जिसमें हर घर गाते और सुनते हुए मिल जाएगे। जिसमें अपने संधर्ष के गीत के साथ जीवन के हर पहलू को गीतों में स्थान दिया यही कारण है हर जुबान पर अपने गीत आज भी मौजूद है। नृत्य - समय और मौसम एवं अपने घर के उत्सव, त्यौहारों, पूजा पाठ में अलग- अलग नृत्य करते हुए खास कर महिलाओं के बीच काफी लोकप्रिय है। हर गांव के अपनी शैली और नृत्य का रिदम होता रहा है। जिसे संताली समाज नजदीक से व्यक्त करते है। इसके अपने अलग पहलू को समझने और जाने की अभी भी जरूरत है। गोदना - अपने समुदाय के बीच के पहचान और विवाह के बाद के पूरे शरीर पर गोदना का उपयोग करते है। वही कुमारी का अलग तरह का गोदना का उपयोग होता है। यह गोदना संताल के इतिहास को बताता है। विवाह- संताल आदिवासी में लडका लडकी की खोजते है पंसद आ जाने पर बीचवाई यानि की दोनों परिवार के खुबी के बारे में जानकारी इकटठा करते है जिसमे आर्थिक व्यवस्था समाजिक व्यवस्था के बारे में