सवाल विकास की समझ का

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-सत्येंद्र रंजन

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1970 के दशक में बड़े होते हुए यह चर्चा हम अक्सर सुनते थे कि कहां श्विकासश् पहुंचा है और कहां नहीं। तब इसका तात्पर्य अक्सर सड़क और बिजली से होता था। अगर आसपास कोई फैक्टरी लग गई हो या रेल लाइन भी पहुंच गई होए तो उस स्थान को और भी ज्यादा श्विकसितश् बताया जाता था। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखें तो उस दौर में श्विकासश् को मापने का एकमात्र पैमाना सकल घरेलू उत्पाद की मात्रा थी। यानी जिस देश का जितना जीडीपीए वह उतना विकसित। बाद में प्रति.व्यक्ति औसत आय का पैमाना इसमें जुड़ा। मगर 1980 के दशक में श्विकासश् को देखने.समझने का पूरा नजरिया बदल गयाए जब संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के तहत मानव विकास सूचकांक तैयार करने की कोशिश हुई। उल्लेखनीय है कि इसे विकसित करने में भारत के अमर्त्य सेन और पाकिस्तान के अर्थशास्त्री महबूब.उल.हक की सर्वोपरि भूमिका रही। यह सूचकांक मानव जीवन के प्रमुख पहलुओं पर गौर करते हुए तैयार किया गया। मोटे तौर पर इसे तैयार करने में औसत जीवन.कालए स्वास्थ्यए सूचना एवं ज्ञान की उपलब्धता तथा उपयुक्त जीवन स्तर को पैमाना बनाया गया। गुजरते वक्त के साथ इसमें नई कसौटियां जोड़ी जाती रहीं। अब यूएनडीपी की हर साल आने वाली इस रिपोर्ट पर सारी दुनिया का ध्यान रहता है। मगर यह समझ वहीं सीमित नहीं रही। सकल आंकड़ों को और तोड़ने. अर्थात जनसंख्या के विभिन्न वर्गों की अलग.अलग मामलों में स्थिति देखने के प्रयास लगातार आगे बढ़े हैँ। मसलनए किसी देश की कुल बाल मृत्यु दर को वहां की असली सूरत मानने के बजाय यह देखने का प्रयास हुआ कि वहां के कमजोर और उत्पीड़ित तबकों के बीच यह दर क्या है। इसी प्रयास में एक संस्था ने सामाजिक प्रगति सूचकांक विकसित किया। किसी देश में बुनियादी मानवीय जरूरतों की पूर्तिए सुखी जीवन की शर्तों के पूरा होने और अधिकार एवं स्वतंत्रता संबंधी अवसरों की उपलब्धता पर गौर करते हुए इसे तैयार किया जाता है। विकास के विमर्श में अब इस रिपोर्ट को भी काफी महत्त्व दिया जाता है। और गहराई में जाएंए तो साफ होगा कि आज विकास का अर्थ सिर्फ भौतिक संसाधनों की उपलब्धता तक सीमित नहीं रह गया है। बल्कि सबको जीवन की संपूर्ण संभावनाओं को प्राप्त करने का अवसर मुहैया है या नहीं. यह इसकी अधिक स्वीकार्य कसौटी है। यह समझ बनाने में अमर्त्य सेन की बड़ी भूमिका रही है। उनकी किताब ष्डेवलपमेंट ऐज फ्रीडमष् ने दुनिया को विकास को देखने का नया नजरिया दिया। मोटे तौर पर कहें तो इसका निहितार्थ है कि विकास वह नियोजित परिघटना हैए जिससे नागरिकोंध्व्यक्तियों की स्वतंत्रता में विस्तार हो। मतलब कि उनके सामने विकल्प बढ़ें। अतीत की जिन बेड़ियों से वे जकड़े हुए हैंए वे ढीली पड़ें। जाहिर हैए दुनिया में आज विकास की समझ काफी बदल और आगे बढ़ चुकी है। इसी तरह गरीबीए शोषणए अपवर्जन ;एक्सक्लूज़नद्ध आदि से संबंधित समझ भी बदलती गई है। मगर अपने देश में विकास के विमर्श पर गौर करें तो अक्सर 1970 का दशक याद हो आता है। इसका बेहतरीन नमूना 2014 का आम चुनाव थाए जिसके बारे में माना जाता है कि वह विकास के एजेंडे पर लड़ा गया। भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री के ;तत्कालीनद्ध उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने विकास के श्गुजरात मॉडलश् को सारे देश के सामने पेश किया। उन्हें मिले स्पष्ट जनादेश के पीछे इस मॉडल के लिए पैदा हुए जन.आकर्षण की बड़ी भूमिका मानी जाती है। उस दौर को याद करें। आम चर्चाओं में श्गुजरात मॉडलश् छाया हुआ था। इसे तमाम समस्याओं के हल की तरह पेश किया गया। जनसंख्या एक बड़े हिस्से ने इस बात को स्वीकार किया। बिना यह पूछे कि क्या सचमुच गुजरात के श्विकासश् से वहां सबकी स्वतंत्रता का विस्तार हुआ हैघ् दरअसलए इतना आगे जाने की जरूरत भी नहीं थी। सिर्फ उन संबंधित आंकड़ों पर गौर किया जाना चाहिए थाए जिन पर संयुक्त राष्ट्र की मानव विकास सूचकांक रिपोर्ट तैयार होती है। आज भी ऐसा किया जाए तो गुजरात की कुछ दूसरी ही सूरत सामने आती है। मगर ऐसा कौन करताघ् आखिर किस दूसरे दल ने विकास की नई समझ को अपनाने और उसको लेकर जनता के बीच जाने की कोशिश पहले की थीघ् अथवाए 2014 के आम चुनाव के बाद भी क्या किसी राजनीतिक पार्टी ने इसकी जरूरत महसूस की हैघ् पिछले आम चुनाव के लिए बनते माहौल के बीच नीतीश कुमार ने अपने श्बिहार मॉडलश् की चर्चा जरूर छेड़ी थी। यह दिखाने का प्रयास किया था कि श्गुजरात मॉडलश् जहां बड़े उद्योगपतियों के लिए फायदेमंद रहा हैए वहीं श्बिहार मॉडलश् में आम जनए समाज के कमजोर वर्गोंए महिलाओं आदि का सशक्तीकरण हुआ है। इस दावे का विश्लेषण करने का यहां पर्याप्त स्थान नहीं है। मगर गौरतलब है कि 2005 में मुख्यमंत्री बनने के बाद नीतीश कुमार की ष्विकास पुरुषष् की छवि बनी ;या प्रचारित की गईद्ध। मोटे तौर पर इसके दो आधार रहे. राज्य भर में सड़कों का निर्माण और कानून.व्यवस्था की स्थिति मे सुधार। बाद में स्कूली लड़कियों के बीच साइकिल बांटनेए पंचायती संस्थाओं में महिलाओं के लिए पचास फीसदी आरक्षणए अति पिछड़ा.महा दलित और पसमांदा मुसलमानों के लिए अलग योजनाएं शुरू करने के उनके सरकार के रिकॉर्ड ने उनकी इस छवि को और पुख्ता किया। लेकिन 2014 में बिहार की जनता ने भी श्गुजरात मॉडलश् को ही तरजीह दी। कांग्रेस तो इस बहस से ही बाहर रही। तब यूपीए.2 शासनकाल से संबंधित भ्रष्टाचार का कथानक इतना प्रचारित और स्वीकार्य हो चुका था कि यूपीए के दस वर्ष के दौर में अपनाई गई ष्अधिकार आधारित विकास की अवधारणाष् पर आम तौर पर मतदाताओं ने ध्यान नहीं दिया। इस समझ के तहत जिन सरकारी पहल को पहले कल्याण योजनाओं के रूप में लागू किया जाता थाए उन्हें नागरिकों का अधिकार बनाने की ओर बढ़ा गया। सूचना का अधिकारए वनाधिकारए ग्रामीण रोजगार गारंटीए मुफ्त एवं अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा का अधिकार के लिए बने कानून इसके कुछ उदाहरण हैँ। इनके अलावा महिलाओं को घरेलू हिंसा से बचाने तथा पैतृक संपत्ति में अधिकार देनेए खोमचे वालों को उनके स्थान पर हक देने तथा सबको खाद्य सुरक्षा प्