विकास की नई सोच डगर

|

तस्वीर द्वारा-

|

लेखक-सत्येन्द्र कुमार सिं

image

image

भारत में आजादी के पश्चात् ‘‘विकास’’ शब्द की अन्धड़-तूफान प्रत्येक लोकसभा, विधान सभा एवं पंचायती राज चुनावों के साथ चलती है। वैसे भारतीय जन-मानस के दिलो-दिमाग पर ‘‘विकास’’ शब्द-वाण निरन्तर गुंजते रहता है। ‘‘संस्कृति’’ एक भौगोलिक क्षेत्र एंव गाँव की साझी होती है। जिसमें समाज के सभी वर्गां/समुदायों की साझीदारी, भागादारी, जिम्मेवारी एवं जवाबदेही सुनिश्चित होता है। ‘‘संस्कृति’’ से सामूहिक सह-जीवन, सामूहिक सकारात्मक संघर्ष, सामूहिक कर्म का परिणाम सामूहिक फल प्राप्त होना है। जिससे ‘‘सर्व जन हिताय, सर्व जन सुखाय’’ की संभावना अधिकतम होती है। ‘‘संस्कृति’’ में समाज का कोई समुदाय, वर्ग, समूह, परिवार या व्यक्ति दाता और कोई प्राप्तकर्त्ता नहीं होता है। सभी ही दाता, कर्त्ता एवं प्राप्तकर्त्ता होते हैं। जबकि ‘‘विकास’’ शब्द एंकागी है। समाज, समुदाय इसे आत्मसात नहीं करता है। एक छोटा वर्ग लेकिन सबसे ताकतवर (राजनैतिक, प्रशासक वर्ग, वौद्धिक एवं औद्यौगिक वर्ग) दाता के रूप में विकास प्रदाता वर्ग की भूमिका में हैं और 95 प्रतिशत जनता जनार्दन प्राप्तकर्त्ता (लाभार्थी) के भूमिका में टकटकी लगाये अपनी-अपनी अन्तहीन बारी का इंतजार करती रहती है। जबकि लोकतंत्र की सफलता का मूल-मंत्र यह है कि न कोई दाता एंव न कोई प्राप्तकर्त्ता (लाभार्थी) हो, बल्कि सभी नागरिक अपने वर्त्तमान एवं भविष्य के रचियता बनने में साक्षेदार, भागीदार, जिम्मेदार एवं जवाबदेह के रूप में अपना श्रेष्ठ कर्म कर सकें। दाता - लाभार्थी के व्यवस्था में भ्रष्टाचार फलता-फूलता है। विकास की संस्कृति की पूर्ण अवधारण यह है कि प्रत्येक मानव की गरिमा बनी रहे। प्रत्येक मानव का मानवाधिकार सुरक्षित रहें। प्रत्येक मानव गरीबी के दुश्चक्र को तोड़ने का निरंतर सकारात्मक अवसर पाये, न कि सदैव गरीबी रेखा के नीचे रहकर अकर्मण्य, अकर्मठ बनकर आत्मनिर्भर रूपी गरिमा, आत्म स्वाभिमान और आत्म उत्थान रोकने की दिशा में पथभ्रष्ट होकर राहत रूपी योजनाओं के दुश्चक्र में डूबते जाए। व्यक्ति, परिवार, वर्ग, समुदाय गरीब हो सकता है। उसे तत्काल जीवन-यापन सहायता मिलना ही चाहिए, लेकिन इस सहायता का दुरगामी लक्ष्य तो सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक, शैक्षणिक एवं पर्यावरण स्तर पर आत्मनिर्भर, सबल बनाना ही होना चाहिए। अब समस्त कल्याणकारी कृषि, पशुपालन, जल प्रबंधन, हरियाली प्रबंधन, कुटीर उद्योगों, स्वरोजगार, पशुपालन शिक्षा, स्वास्थ्य एवं औद्योगिक विकास पर्यावरण मित्रवत सह मानव मित्रवत वीजन एवं मिशन लक्ष्य में होना चाहिए। जल,जंगल, जमीन, जैव -विविधता का संरक्षण एवं संवर्द्धन करें क्योंकि जंगल, पहाड़, नदी-नाले, जोरिया, झरना एवं जैव-विविधता प्रकृति प्रदत है। मानव समाज पुनः जंगल नहीं लगा सकता है। पहाड़ नदी-नाले, झील, झरने, जोरिया नहीं बना सकता है। झारखण्ड के आदिवासी एवं अन्य ग्रामीण किसानों, खेतीहर मजदूरों के लिए सरकारी क्रियान्वित कल्याणकारी योजनाओं का अंतिम लक्ष्य सर्वागीण स्वावलम्बन होना चाहिए, न कि दाता (सरकार) और लाभार्थी/जनता जनार्दन के रूप में होना चाहिए। जल, जंगल, जमीन, जैव-विविधता के विकास के लिए प्रत्येक गाँव/टोले का एक सहभागी दीर्घकालीन योजना बनाना चाहिए। जिसमें वर्षवार अल्पकालीन, मध्यकालीन एवं दीर्घकालीन लक्ष्यों के प्राप्त करने वाली कार्यक्रमों का स्पष्ट समय रेखा के साथ रोड मैप होना चाहिए। उदाहरण के लिए जन वितरण प्रणाली एवं मनरेगा योजनाआें का लक्ष्य यह हो कि अगले पाँच वर्षों में इन दोनों योजनाओं से लाभ पाने वाले परिवार स्वरोजगार, खेती-बाड़ी, पशुपालन, मछली पालन उद्यानिकी , वानिकी इत्यादि द्वारा आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन जाये। पाँच वर्षों के पश्चात् इन परिवारों को जन वितरण प्रणाली एवं मनरेगा जैसी योजनाआें का सहारा नहीं लेना पड़े। इस प्रकार सभी प्रकार के सरकारी आवास योजनाओं का प्रोटोटाइप स्थानीय आवास कला, संस्कृति के साथ-साथ स्थानीय रोजगार एवं मकान बनाने की कुशलता, दक्षता एंव मकानों की शिल्प कला, विविधता को नष्ट करता है। इसलिए इन परिवारों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने की आवश्यकता है। जिससे वे अपनी मनपसंद आवश्यकता एवं स्थानीय पर्यावरण के अनुकूल मकान निर्माण कर सके। आज झारखण्ड की जैव-विधिवता का विनाश बड़े पैमाने पर हो रहा है। बड़ी संख्या में पेड़-पौधे, झाड़िया, जड़ी-बुटियाँ नष्ट हो रही है। अनाजों की विविधता समाप्त होने के कगार पर हैं। देशज बीजों का वंश समाप्त हो रहा है। देशज बड़े - छोटे पशु धनों की नश्ल बचाने की दीर्घकालीन जन सहभागिता से योजनाएँ बनें। छोटे-बडे़ प्राकृतिक जल स्त्रोंतो का विनाश हो रहा है। इसलिए अगर झारखण्ड को समृद्ध बनाना है तो जल, जंगल, जमीन एवं जैव-विविधता के संरक्षण एवं संवर्द्धन के लिए प्रत्येक गांव/टोले का जन सहभागिता के आधार पर एक दीर्घकालीन रोड मैप बनें। किसानों को विशेष रूप से महिला किसानों को खेती बाड़ी छोटे पशुपालन के लिए स्टार्टअप कृषि पूंजी मिलना चाहिए। मनरेगा जैसी योजनाओं में प्रत्येक परिवार को खेती बाड़ी करने के लिए अपने खेतों पर ही कार्य करने के लिए कम से कम पचास दिनों का अग्रिम मजदूरी प्रत्येक खरीफ और रब्बी खेती के पहले मिलना चाहिए, तभी छोटे किसानों में कृषि समृद्धि संभव है। जंगल और जैव-विविधता के संरक्षण के लिए भी स्थानीय ग्रामीणों को मनरेगा से मजदूरी मिलने का प्रावधान होना चाहिए। झारखण्ड के भी नौनीहालों, तरूणों, नौजवानों को प्राथमिक पाठशाला से ही यह व्यवहारिक ज्ञान मिले कि शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य सरकारी, गैर सरकारी नौकरी पाना ही नहीं है, बल्कि शिक्षित होकर स्वरोजगारी, पर्यावरण रक्षी, कुशल पशुपालक, किसान, शिक्षक इत्यादि भी बन सकते हैं। आज की शिक्षा व्यवस्था तरूणों एवं नौजवानों में तनाव, कुंठा भरती है। तभी तो मैट्रिक फेल, पढ़े-लिखे छात्रों के माता-पिता कहते हैं कि मेरा बेटा-बेटी तो दोनों लाईन से गया। न खेती या परम्परागत व्यवसाय का रहा न ही उसे सरकारी नौकरी मिली। शिक्षा का मूल लक्ष्य सभी धर्मो, स