पूजा की परंपराओं में जीवंत है अतीत

|

तस्वीर द्वारा-

|

लेखक-

image

image

150 वर्षो से पौराणिक विधि से हो रही दूर्गा पूजा ऽ वक्त के साथ और गहरी हुई आस्था की जड़ें ऽ 19वीं शताब्दी के सातवें दशक में हुई थी परम्परा की शुरुआत ऽ यहां की पूजा देखने छतीसगढ़, उडीसा, बंगाल से आते हैं लोग रातू। रातू किले में शारदीय नवरात्र पर अनूठा माहौल रहता है। पौराणिक पूजा विधि को यहां के राजपरिवार ने पीड़ी दर पीड़ी संजोकर रखा है। तकरीबन 150 वर्षो से यहां शक्ति की अराधना का स्वरुप नहीं बदला। न पूजा का विधान और न ही बलि की प्रथा। दुर्गा पूजनोत्सव में आम लोगों के लिए रजमल के द्वारा तब भी खोल दिये जाते थे, जैसा की अब। राजवंशी व्यवस्था गुजरे समय की बात हो गयी। लेकिन स्वर्णित अतीत की झांकी आज भी हमसाया है, जिसे न वक्त बदला और न ही नयी पीढ़ी के राजपरिवार के सदस्यों ने। रातू के राजकिले का गौरवशाली इतिहास है। किले की स्थापना 1870 के दशक में छोटानागपुर के तत्कालीन महाराजा फणी मुकुटराय ने की थी। उन्होनें यहां दशहरा पूजा की शुरुआत की, तब से आज तक यह परंपरा विद्यमान है। राजपरिवार के अलावा रातू के लोगों के लिए दशहरे का विशेष महत्व है। यहां होनेवाले अनुष्ठा की काफी पुराने है। लोग दशहरा पूजा को लेकर काफी उत्साहित रहते हैं। जैसे -जैसे दशहरा पूजा नजदीक आता है, पूजा को लेकर रातू के लोगों में उत्साह चरम पर पहुंच जाता है। नौवमी व दशमी के दिन यहां झारखण्ड के अलावा पश्चिम बंगाल, उडीसा, यूपी व छतीसगढ़ आदि राज्यों के हजारों श्रद्वालु माँ का दर्शन व किले का भ्रमण करने सपरिवार आते हैं। शक्ति की अराधना, उपासना के लिए रातू किले में माँ दुर्गा की प्रतीमा बंगाल के शिल्पकार अशोक कुमार बनाते आ रहे हैं। किले में राजतंत्रीय व्यवस्था के कई अवशेष आज भी सुरक्षित हैं, जो पर्यटकों के आकषर्ण का केन्द्र बने हुए हैं। परम्परा के अनुसार नवमी और विजयादशमी के दिन यहां दशहरा मेले का आयोजन किया जाता है। मेले में लाखों लोग आते हैं। वह न केवल मेले का लुथ्प उठाते हैं बल्कि शक्ति शवरुपा माता दुर्गा पूजा कर मन्नतें भी मानते हैं। दशहरा पूजा के लिए रजमहल मंदिर में कलश स्थापित होते ही यहां का वातावरण भक्तिमय हो जाता है। राजमहल की इस परम्परा को फिलहाल आगे बढ़ाने वाला अब राजमहल में कोई नहीं बचे हैं। महल पूरी तरह विरान हो गया है। किले में अब न तो महाराजा रहे और न ही युवराज गोपाल शरण नाथ शाहदेव। दो अप्रैल 1969 को राजमहल के एकलौते वारिस युवराज श्री शाहदेव की 28 जून 2010 को आकस्मिक मृत्यु हो गयी। किले की धरोहर को बचाने के लिए अब स्व० शाहदेव की पत्नी प्रियदर्शनी देवी हैं। युवराज से उनकी शादि 15 फरवरी 1989 को हुई थी। श्रीमति शाहदेव उत्तर प्रदेश इलाहाबद जिले के शंकर गढ़ राज घाराने की राजकुमारी हैं। उन्हें अपने चार नन्दों का भी सहयोग मिलने की उम्मीद हैं। महाराजा स्व० चिंतामणि शरण नाथ शाहदेव का विवाह 3 मार्च 1952 को प्रेममजरी देवी के साथ हुआ था। महारानी की मृत्यु के बाद श्री शाहदेव ने समृति में महारानी प्रेममंजरी प्रोजेक्ट बालिका उच्च विद्यालय की स्थापना की। महाराजा ने इस विद्यलाय के अलावा महारानी की याद में अस्पताल भी बनवाया। बालिका मध्य विद्यालय, मध्य विद्यलाय रातू राज, छोटानागपुर राज उच्च विद्यलाय, आदिवासी बाल विकास विद्यालय, कार्तिक उरांव महाविद्यालय बेलांगी, व गुमला, गोस्नर कॉलेज, रांची, जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डायट), प्रखण्ड व अंचल कार्यालय, जीईएल चर्च कॉम्पेक्स, व रांची कॉलेज आदि संस्थानों के लिए सैकड़ों एकड़ जमीन दान कर सबकी दिलों में जगह बना ली थी। मृदु स्वभाव के धनी चिंतामणि शरण नाथ शाहदेव दीन दुखियों की सेवा के लिए सदैव तत्पर रहते थे। पुत्र युवराज की असमय मृत्यु ने महाराजा को झकझोर दिया। इसके बाद भी व करीब चार साल तक वह जीवित रहे। वह छोटानागपुर राज के अंतिम और 62वें महाराजा थे। छोटानागपुर में एक 1950 वर्षो से हो रही रथयात्रा पूजा। ऽ महाराजा फणिमुकुटराय ने सन् 64 में की इसकी शुरुआत ऽ उड़ीसा से मगायी गयी थी भगवान जगन्नाथ बलभद्र व सुभद्रा की प्रतिमाएं रातू। छोटानागपुर में रथयात्रा पुजा का इतिहास करीब 1950 वर्ष पुरानी है। नागवंशी इतिहास के मुताबिक इसकी शुरुआत प्रथम महाराजा फणिमुकुटराय ने इस्वी सन् 64 में पिठौरिया स्थित सुतियांबे गढ़ से की थी। राज्य का सिंहासंन संभालने के बाद उन्होनें अपने विशेष दुत को जगरनाथ पुरी (उड़सा) भेजकर भगवान जगनाथ, बलभद्र, व सुभद्रा की प्रतिमा मगायी। 61वें महाराजा प्रतापउदय नाथ शाहदेव ने अपने कार्यकाल के दौरान वर्तमान राजमहल के मुख्य द्वारा के ठिक सामने जगरनाथ मंदिर का निर्माण कराया जहां भगवान जगरनाथ समेत अन्य विग्रहों की प्रतीमा स्थापित कर पुजा अर्चना शुरु की गयी। तब से आज तक राजमहल में रथ यात्रा पूजा की परम्परा कायम है। प्रत्येक वर्ष आसाढ़ माह के द्वितीय शुक्लपक्ष को यहां रथयात्रा पूजनोत्सव मनाया जाता है। भगवना जगरनाथ समेत सभी विग्रहों को गर्भगृह वैदिक मत्रोच्चारण के बीच सुसज्जि रथ में बैठाकर रस्सी से खींचते हुए श्रद्वालु मौसी बाड़ी ले जाते हैं। इसके ठीक नौवे दिन घुरती रथ पुजा अनुष्ठान के बाद विग्रहों को रथ में आरुढ़ कर मुख्यमंदीर लाया जाता है। चलती एवं घुरती रथ यात्रा को किला मैदान में रथ मेले का आयोजन किया जाता है। राजमहल का ऐतिहासिक महत्व रातू। छोटानागपुर के 50वें महाराजा रघुनाथ शाह के पुत्र युवराज यदुनाथ की शादि भोजपुर में तय हुई थी। किले से बारात निकली। भोजपुर जाने के रास्ते में बक्सर के निकट युवराज की मृत्यु हो गयी। महाराजा शोक में डुब गये और विलाप करने लगे। वहां के स्थानीय लोगों ने सलाह दी कि समीप में नदी के किनारे बाबा चेतनाथ का मठ है वहां जाकर बाबा से मिले और युवराज को पुर्नर्जीवित करने का आग्रह करें। महाराजा ने वैसा ही किया। बाबा चेतनाथ ने मृत युवराज यदुनाथ शाह को फिर से जीवित कर दिया। इसपर महाराजा को अपार खुशी हुई। अन्होनें बाबा को छोटानागपुर राज्य की गद्दी दान में दे दी। इसपर चेतनाथ बाबा ने महाराजा से उनका राज्य लेन