दलित उपयोजना में निहित अधिकार सुनिश्चित हो

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-सुनील मिंजए सामाजिक

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अनुसूचित जनजाति उपयोजना (ज्ैच्) और अनुसूचित जाति उपयोजना (ैब्ैच्) में जनसंख्या के अनुपात में बजट का आवंटन नहीं हो पा रहा है। बजट के आवंटन होने पर भी इस राशियां का उपयोग अनुसूचित जनजाति और अनुसूचि जाति के समुदायां के विकास के लिए नहीं किया जा रहा है। इस पैसों का डाइवर्सन कर दिया जा रहा है। 34 वें राष्ट्रीय खेल के लिए इसकी राशि का डाइवर्सन सबसे अच्छा उदाहरण है। कल्याण विभाग से अनुसूचित जनजाति/अनुसूचित जाति के छात्रों को जो छात्रवृति दी जाति है, उससे उन्हें काफी मदद मिलती है, लेकिन पिछले सालों से यह देखा जा रहा है कि स्कॉलरशिप के मद में मिलने में राशि नाकाफी है। अब तक इन मदों में 300 करोड़ मिलते हैं, लेकिन इस मद में 550 करोड़ की राशि की आवश्यकता है, इतनी कम राशि मिलने के वावजूद झारखंड के कई जिलों में एसटी छात्रों की छावृति करोड़ों रुपये सरेंडर कर दिये गये, वहीं कई जिलों में एससी छात्रों की छात्रवृति के लाखों रुपये प्री मैट्रिक छात्रवृति के पैसे सरेंडर कर दिये गये। राज्य के डेढ़ लाख ओबीसी छात्रों को 2012-2013 को पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशीप का लाभ नहीं मिल पा रहा है। छात्रवृति की राशि कम और अनियमित मिलती है। जिसके, छात्र पढ़ाई छोड़ने को मजबूर होना पड़ रहा है। वहीं दूसरी ओर बीआईटी, पॉलिटेक्निक में भी छात्रों की हालत अच्छी नहीं है। पिछले दो सालों से एसटी, एससी और ओबीसी के छात्रों को स्कॉलरशीप नहीं मिली है। छात्र इसलिए परेशान है, क्योंकि इसी पैसे वे सलाना फीस भरते हैं। हमारे राज्य के हर जिले में महिला कॉलेज का अभाव है, गरीबी के कारण लडकियां बड़े शहरों में स्थित कॉलेजों में पढ़ाई नहीं कर पाती हैं और जहां वे पढ़ाई करती भी हैं, तो वहां शिक्षकों की संख्या बहुत कम है। कई कॉलेजों में एक शिक्षक के भरोसे 100 से अधिक छात्रों को पढ़ाई करना पड़ता है। नतीजतन कई विषयों में छात्र फेल हो जाते हैं। अतः हर जिले में महिला कॉलेज खुले। उन कॉलेजों में शिक्षकों की संख्याएं बढ़ाई जाये और वहां छात्रों के लिए टियूशन और कोचिंग की व्यवस्था करायी जाये, ताकि कुव्यवस्था की वजह से छात्रों का भविष्य बिगड़ न जाये। बहुत से गांव के आदिवासी व दलित समुदाय के बच्चे उच्च शिक्षा ग्रहण करने शहरों में आते हैं। लेकिन वहां पर अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति के छात्रों के लिए छात्रावास का अभाव है। इस वजह से छात्रों को भाड़े के तंग कमरों रहना पड़ता है, जिससे उनकी पढ़ाई बाधित होती है। वहीं कुछ जिलों में अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति के समुदाय के छात्रों के लिए छात्रावास हैं , तो बिना देख-रेख और मरम्मत के कारण वे जीर्णर्शीन हालत में पड़े हुए हैं। वहां न तो चाहरदिवारी है, न शौचालय है, न पीने के पानी की ही उत्तम व्यवस्था है। अतः कुछ नये छात्रावास का निर्माण कराया जाये और पुराने छात्रावासों की यथाशीघ्र मरम्मती करायी जाये। इन सभी घोषणाओं को ध्यान में रखते हुए नयी सरकार के पहले बजट में अनुसूचित जाति उपयोजना एवं जन जाति उपयोजना का विश्लेषण करना अति आवश्यक हो जाता है. 2015.16 के लिए झारखंड बजट में आदिवासी उप योजना 2013.14 ए.ई 2014.15 बी.ई 2014.15 आर.ई 2015.16 बी.ई झारखंड का कुल प्लान बजट 11152ण्26 26754ण्97 26591ण्66 32136ण्84 आदिवासी उप योजनान्तर्गत कुल बजट 4682ण्59 7808ण्33 7758ण्85 9405ण्61 आदिवासी उप योजना का प्रतिशत 41ण्99 29ण्18 29ण्18 29ण्27 26 प्रतिशत जनसंख्या के हिसाब से आदिवासी उपयोजना 2899ण्5876 6956ण्2922 6913ण्8316 8355ण्5784 वास्तविक आवंटन से फर्क .1783ण्00 .852ण्04 .845ण्02 .1050ण्03 2015-16 के लिए झारखंड बजट में अनुसूचित जाति उपयोजना 2013.14 ए.ई 2014.15 बी.ई 2014.15 आर.ई 2015.16 बी.ई झारखंड का कुल प्लान बजट 11152ण्26 26754ण्97 26591ण्66 32136ण्84 अनुसूचित जाति उप योजनान्तर्गत कुल बजट 591ण्53 1589ण्74 1628ण्74 1747ण्22 अनुसूचित जाति उपयोजना का प्रतिशत 5ण्3 5ण्9 6ण्1 5ण्4 26 प्रतिशत जनसंख्या के हिसाब से अनुसूचित जाति उपयोजना 1449ण्7938 3478ण्1461 3456ण्9158 4177ण्7892 वास्तविक आवंटन से फर्क 858ण्26 1888ण्40 1828ण्17 2430ण्57 आदिवासी उपयोजना आवंटन के उपरोक्त आंकड़ों से पता चलता है कि 2015-16 में उपयोजना का प्रतिशत 28.27 था, जो कि राज्य की आदिवासी जनसंख्या से कहीं अधिक है. परन्तु अधिकतर आवंटन सामान्य प्रकृति की योजनाओं में किया गया है जिसका आदिवासियों के सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों पर कोई सीधा असर नहीं है. वहीं दूसरी ओर राज्य की कुल दलित जनसंख्या 13 प्रतिशत है, पर दलित उपयोजना मात्र 5.4 प्रतिशत आवंटित की गयी है. इस तरह राज्य के दलितों को कुल 2430.57 करोड़ रु. आवंटन से वंचित किया गया है. यदि हम झारखण्ड के पिछले पांच वर्षों के दलित आदिवासी उपयोजना का मूल्यांकन करें तो स्पस्ष्ट पता चलता है कि एक ओर जहां आदिवासी उपयोजना के हिसाब से अधिक आवंटन हुआ, वहीं दलित उपयोजना में लगातार कम आवंटन हुआ है. जहां तक आदिवासी उपयोजना के अतिरिक्त आवंटन का सवाल है, यह देश भर में एक मात्र उदाहरण है एवं योजना आयोग के दिशा निर्देशों का गंभीर उल्लंघन है. राज्य सरकार द्वारा आदिवासी उपयोजना के अंतर्गत चलाये जाने वाले कार्यक्रमों से पता चलता है कि इस राशि का इस्तेमाल आदिवासी हित अथवा विकास में बिरले ही हुआ है. यदि हम झारखण्ड सरकार के आदिवासी उपयोजनान्तर्गत सभी योजनाओं को उनके सामान्य वास्तविक एवं किताबी प्रकृति के आधार पर वर्गीकृत करें तो पता चलता है कि पूरी राशि का मात्र 12 प्रतिशत ही वास्तविक योजनाओं में आवंटित किया गया एवं फर्जी योजनाएं कुल आवंटन का 46 प्रतिशत रहा है. इसी प्रकार हमारे विश्लेषण के आधार पर दलित उपयोजना का मात्र 19 प्रतिषत ही दलित समुदाय के वास्तविक जरूरतों को पूरा करता है, जबकि शेष राशि का उपयोग सामान्य कार्यक्रम के उपयोग करने में किया जाना है. 2015-16 झारखंड बजट में विश्लेषण में आदिवासी उपयोजन के मुख्य बिन्दू :- 1. वर्ष 2015-16 में आदिवासी उपयोज