आदिवासियों की दशा और दिशा

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-ग्लैडसन डुंगडुंग

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आज पूरी दुनियां जलवायु संकट (इंकोलोजिकल क्राईसिस) के दौर से गुजर रहा है। असमयिक वर्षा, बर्फबारी और असहनीय गर्मी के से जनजीवन अस्त-व्यस्त है और दुनियां के विकसित देश चिंतित हैं लेकिन हमारे देश की सरकार को सिर्फ पूंजीनिवेश की चिंता है। देश में सिर्फ 21 प्रतिशत जंगल बचा हुआ है जबकि पर्यावरण संतुलन बनाये रखने के लिए हमें कम से कम 33 प्रतिशत चाहिए। बावजूद इसके विकास एवं आर्थिक तरक्की के नाम पर पेड़ काटने और जंगल उजाड़ने का काम जारी है। 11 मई 2016 को केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जावेडकर ने संसद में जो ऑंकड़ा पेश किया है वह चिंतनीय है। भारत में जंगल बहुत तेजी से उजड़ रहा है, जिसका मूल कारण केन्द्र सरकार द्वारा परियोजनाओं के लिए दी गई वन एवं पर्यावरण स्वीकृति है। वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने पिछले सिर्फ दो वर्षों (अप्रैल 2014 से मार्च 2016 तक) में 1,557 परियोजनाओं को वन एवं पर्यावरण मंजूरी (स्टेज -2) देते हुए 34,620 हेक्टेअर वनभूमि का हस्तांतरण कर दिया। इसके अलावा वन एवं पर्यावरण की स्टेज-2 की मंजूरी के लिए लाईन में खड़े 1,557 परियोजनाओं को अंतिम मंजूरी मिलने ही कुछ ही दिनों में 40,476 हेक्टेअर वनभूमि विकास परियोजनाओं के हवाले कर दिया जायेगा। ये परियोजनाएं आदिवासी एवं वनाश्रित समुदायों को वनाधिकार देने के मामलों का निपटाना नहीं होने के कारण रूका हुआ है। झारखंड में 1980 से 2015 तक 26 हजार हेक्टेअर वनभूमि को विकास कार्यां में लगा दिया गया। फलस्वरूप, पारिस्थितिकी संकंट ने आदिवासियों के लिए आजीविका का संकट भी खड़ा कर दिया है। आदिवासि यों के लिए यह सिर्फ एक संकट नहीं है बल्कि आदिवासी समाज कई ज्वलंत मुद्दों से जुझ रहा है। 1. स्थानीयता (डोमिसाईल) : झारखंड के आदिवासियों के लिए स्थानीयता नीति एक ज्वलंत मुद्दा है। स्थानीयता का आधार किसी भी राज्य की भाषा, संस्कृति एवं रीति-रिवाज होती है न कि सिर्फ नौकरी पाने के लिए किसी को भी उस राज्य का निवासी मान लिया जाये। सवाल उठता है कि जो लोग झारखंडी बनना चाहते हैं क्या उन्हें खूंखड़ी, पुटु और करील का स्वाद पता भी है? क्या उन्हें झारखंड की कोई भाषा आती है? क्या वे झारखंडी संस्कृति को स्वीकार भी करते है? अगर नहीं तो फिर उन्हें झारखंडी कैसे स्वीकार किया जा सकता है? क्यों वे अपनी भाषा, संस्कृति और परंपरा झारखंडियों पर थोपना चाहते है? 2. वन अधिकार : भारत सरकार ने पहली बार यह माना कि आदिवासियों के साथ ऐतिहासिक अन्याय हुआ है। और इसी अन्याय को न्याय में बदलने के लिए वन अधिकार कानून 2006 लागू कि या गया। लेकिन ऑकड़े बताते हैं कि यह न्याय यात्रा अभी बहुत लंबी है। भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा जारी एफआरए स्टेटस रिपोर्ट के अनुसार 31 दिसंबर 2015 तक झारखंड में ग्रामसभाओं के द्वारा 23,991 वन अधिकार समितियों का गठन किया गया था। इन समितियों ने 83,553 दावा-अभिलेख ग्रामसभाओं में जमा की, जिसकी जांच-पड़ताल करने के बाद ग्रामसभाओं ने 53,253 दावा-अभिलेखों को वन अधिकार के लिए सिफारिश के साथ अनुमंडल स्तरीय वनाधिकार समितियों को भेजा। इन अभिलेखों की जांच करने के बाद अनुमंडल स्तरीय समितियों ने 46,269 दावा-अभिलेखों को वन अधिकार के लिए उचित मानते हुए अनुशंसा के साथ जिला स्तरीय वनाधिकार समिति को सुपुर्द कर दिया। जिला स्तरीय वनाधिकार समितियों ने 43,721 दावा-अभिलेखों को स्वीकृति प्रदान की, जिसका कुल रकबा 87,989.80 एकड़ यानी प्रत्येक पट्टाधारी को दो एकड़ वन भूमि पर अधिकार दिया गया है। अबतक 43,125 वन पट्टे का वितरण किया जा चुका है, जिसमें 41,691 व्यक्तिगत एवं 1,424 सामुदायिक पट्टे शामिल हैं। वनाधिकार कानून में दावा-अभिलेखों को खारिज करने का अधिकार सिर्फ ग्रामसभा को दिया गया है। अनुमंडल एवं जिला स्तरीय वनाधिकार समितियां जिन दावा-अभिलेखों से असहमत हैं उन्हें पुनर्विचार के लिए ग्रामसभा के पास भेज सकते हैं। प्रतिवेदन में यह दर्शाया गया है कि 30.2 प्रतिशत दावा-अभिलेख ग्रामसभा स्तर पर खारिज किये गये हैं लेकिन हकीकत यह है कि ग्रामसभाओं में पारित करने के बाद जब इन दावा-अभिलेखों को अनुमंडल स्तरीय समिति में जमा करने के लिए अंचल कार्यालय को सुपूर्द कर दिया जाता है तब चालाकी करते हुए वन विभाग के अधिकारी, राजस्व कर्मचारी एवं अंचल अधिकारी मिलकर अधिकांश दावा-अभिलेखों को अंचल कार्यालय में ही खारिज कर देते हैं और रिकॉर्ड में ग्रामसभा द्वारा खारिज दर्शाया जाता है। इस तरह से उक्त दावा-अभिलेख अनुमंडल एवं जिला स्तरीय वनाधिकार समितियों तक पहुंचते ही नहीं हैं। 3. औद्योगिक विकास और आदिवासीः औद्योगिकरण राज्य के आर्थिक विकास के लिए जरूरी है। लेकिन प्रश्न यह है कि आर्थिक विकास का मकसद क्या है? किसके लिए आर्थिक विकास चाहिए? भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहार लाल नेहरू जिन्हें देश के आधुनिक विकास का जनक कहा जाता हैं। उनके अनुसार औद्योगिकरण गरीबी उन्मुलन के लिए सबसे सरल उपाय है। सिद्धांत के आधार पर देखें तो औद्योगिकरण का मकसद देश को आर्थिक रूप से सक्षम बनाना, गरीबी उन्मूलन एवं आर्थिक असमानता दूर करना है। लेकिन 13वें वितीय आयोग का रिपोर्ट बताता है कि झारखण्ड में अभी भी 44 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन बसर करते हैं, साक्षरता मात्र 53.5 प्रतिशत है, आदिवासी साक्षरता मात्र 40.7 प्रतिशत, दलित साक्षरता मात्र 34.5 प्रतिशत, बिजली मात्र 11 प्रतिशत गांवों तक पहुॅंची है, सिर्फ 34.2 प्रतिशत बच्चों का पूर्ण टीकाकरण होता है, मातृत्व मृत्यु दर प्रति हजार 371 तथा बाल मृत्युदर 68 है। इतना ही नहीं राज्य में लगभग 100 लोगों की भूख से मौत हो चुकी है, वर्ल्ड हंगर इंडेक्स में झारखण्ड देश में दूसरे स्थान पर है, ईस्पात नागरियों में झुग्गी बस्तियों की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है तथा आर्थिक असमानता में जमीन-असमान का अंतर आ चुका है, जिससे यह साबित होता है कि औद्योगिकरण का फायदा आदिवासियों, मूलवासियों एवं गरीबों को नहीं मिला है। ‘इंडियन