पत्रकार

|

तस्वीर द्वारा-

|

लेखक-

image

image

हाल में छत्तीसगढ़ के जेलों में बंद दो पत्रकारों से मिलने का मौक़ा मिला | उनमें से एक ने कहा “मैं नक्सलियों को अखबार पहुंचाता था और वो उसके बराबर पैसे भी देते थे | मुझे पुलिस ने भी पैसे दिए पर मैंने उनको भी कोई जानकारी नहीं दी” | “मैं जिन अखबारों के लिए काम करता हूँ वो मुझे कोई तनख्वाह नहीं देते तो अपनी आजीविका के लिए मैं ठेकेदारी जैसे छोटे मोटे काम करता हूँ | हम जिस तरह के इलाके में रहते हैं वहां ज़िंदा रहने के लिए आप को यह सब करना ही पडेगा | आप दरिया में रहकर मगरमच्छ से बैर नहीं ले सकते” | पत्रकार का काम ही मगरमच्छ से बैर लेने का है | यहाँ फर्क यह है कि यहाँ दो तरह के मगरमच्छ हैं तो इन बेचारों का जीवन दूभर हो गया है पर ग्रामीण पत्रकार क्या सच में पत्रकारिता कर सकता है? ट्रेन में लोगों से बातचीत करने से देश के मध्य वर्ग की आजकल की सोच का पता चलता है | आजकल कई मोदी-भक्त मिलते हैं और जो नया है वह यह कि लोग अब मीडिया की विश्वसनीयता पर शक करने लगे हैं | “हम पहले मीडिया में जो आता था उसे सच मानते थे पर अब कैसा भ्रम सा होने लगा है” थोड़े दिन पहले एक ट्रेन के पड़ोसी साथी ने कहा | छत्तीसगढ़ की परिस्थितियाँ ख़ास हैं पर पूरे देश में भी आमतौर पर किसी ग्रामीण पत्रकार को तनख्वाह नहीं मिलती | यह काम उसका पूर्णकालिक नहीं होता | अधिकतर समय वह अखबारों का वितरक होता है और उसे अखबार बेचने के बाद उसका कमीशन मिलता है पर उसकी पत्रकारिता के लिए अक्सर कोई पैसे नहीं मिलते | क्या यह एक स्वस्थ परम्परा है? क्या इसे बदलना चाहिये? क्या इसे बदला जा सकता है? अंग्रेज़ी में एक कहावत है देयर इज नो फ्री लंच | यानी दुनिया में कोई भी चीज़ मुफ्त नहीं होती | और मुफ्त में मिली चीज़ का आदर भी नहीं होता तो ग्रामीण खबर मुफ्त में क्यों आनी चाहिए? यद्यपि भारत ७०% अब भी गाँव में ही बसता है पर शहरी अखबारों में गाँव कम ही दिखता है | गाँव के मुद्दों को जितनी जगह मिलनी चाहिए वो नहीं मिलती है | और विषयों के विशेषग्य तो ढेरों मिलते हैं पर खेती और ग्रामीण विषयों पर लिखने वाले इक्का-दुक्का ही मिलते हैं | टीवी में हिन्दी समाचार के बारे में यह बताया जा रहा है कि सिर्फ ७% लोग ही टीवी में समाचार देखते हैं बाकी ९३% उसे उपयोगी नहीं पाते | समाचार से उनके जीवन में कोई असर नहीं पड़ता | रेडियो का भी वही हाल है | यद्यपि रेडियो का हाल खराब तो उसे निजी हाथों में न देकर सरकार ने अधिक खराब कर रखा है पर जहां रेडियो ही एकमात्र न्यूज़ का माध्यम है उस आदिवासी इलाकों में भी लोग कहते हैं “रेडियो कुछ ओबामा ओसामा की बात करता है और हमारी बोली में नहीं बोलता” | वही लोग जो न्यूज़ नहीं देखते लोकतंत्र में हमारे भाग्य का फैसला करते हैं | मनोरंजन के अफीम में जी रही अधिसंख्य जनता क्या स्वस्थ लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत है? क्या हम खबर को अधिसंख्य ग्रामीण के लिए उपयोगी और रोचक बना सकते हैं? जी, पर उसके लिए पैसे खर्च करने होंगे | ग्रामीण भारत एक बहुत बड़ा बाज़ार है और उसके लिए उपयोगी समाचार एक बहुत बड़ा व्यापार हो सकता है | इसके लिए हमें किसी मदर टेरेसा की ज़रुरत नहीं है | वह व्यापार शुभ होगा | इस देश के लोकतंत्र, भविष्य और जेल में बंद उन ग्रामीण पत्रकारों और उनके जैसे और बहुत के लिए भी बेहतर होगा |