संताल परगना काश्तकारी कानून- एक एतिहासिक मीमांसा

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-डा0 सुरेन्द्र झा

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संताल परगना के भू-राजस्व कानून अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं। बंगाल और बिहार के रैयती कानूनों से भिन्न होने के साथ-साथ ये कानून छोटानागपुर के कानूनों से भी भिन्न हैं। से कानून, जो क्रमशः विकसित हुए, एक बिशेष परिस्थिति में तथा विशिष्ट उद्येश्यों की पूर्ति के लिये निर्मित किये गये थे। अतः इन कानूनों की उपादेयता, गुणों एवं अवगुनों के वस्तुनिष्ठ बिश्लेषण के पूर्व इनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का अवलोकन आवश्यक है। संताल परगना के लिए बंदोबस्ती कानून एवं भूमि के हस्तांतरण पर प्रतिबंध तथा इस क्षेत्रा के लिये नन-रेग्यूलेशन पद्धति की प्रशासनिक व्सवस्था वस्तुतः ब्रिटिश औपनिवेशिक व्यवस्था की विरासत है। हाल के ऐतिहासिक शोधों से यह स्पष्ट हुआ है कि उपनिवेशवाद एक खास ऐतिहासिक चरण तथा सामाजिक आर्थिक व्यवस्था को इंगित करता है। भारत मे ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने कुछ समुदायों को ‘ट्राइब’ का नाम दिया तथा उन्हें क्षेत्रों में ‘‘घेर कर’’ राष्ट्रीय मुख्य धारा से पृथक रखने का प्रयास किया क्योंकि जनजातीय समाज के लोग ‘‘बहुधा विद्रोह कर देते थे’’ तथा उनका विद्रोह अधिक तीव्र और हिंसक होता था। (कुमार सुरेश सिंह अध्यक्षीय भाषण भारतीय इतिहास कांग्रेस भुवनेश्वर 1977, पेज 374) अफ्रिका के विपरित ब्रिटिश उपनिवेषवादियों ने भारत में जनजातीय क्षेत्रों में प्रत्यक्ष शासन की नीती अपनाई। अफ्रिका में अंग्रेजों ने जनजातीय सरदारों के माध्यम से शासन करने की नीति अपनाई थी लेकिन ब्रिटिश भारत में अधिकांश जनजातीय आबादी को मुख्य सामाज से एकीकृत करने की नीति अपनाई गई। लेकिन इसके बाबजूद कुछ ऐसे क्षेत्र थे जहाँ जनजातीय आबादी अपेक्षाकृत अधिक थी तथा वहाँ अक्सर विद्रोह होते रहता था। इन इलाकों को ‘‘सभ्यता का पाठ’’ पढ़ाने के निए इन्हें पृथक् व्यवस्था के अधीन लाया गया तथा इनकी पृथक् पहचान कायम की गई। ‘जंगलतराई’ के नाम से जाना जाने वाला क्षेत्र, जिसे आज संताल परगना के नाम से जाना जाता है भी उन्हीं इलाकों में से एक था जहाँ पहाड़िया जनजाती को ‘सभ्य’ बनाने के लिये क्लीवलैण्ड ने अपनी पद्धति कायम की थी। (क्लीवलैण्ड की पद्धति पर बिशेष जानकारी के लिये देखें- ऑल्डहॉम द्वारा संपादित जर्नल ऑफ फ्रांसिस बुकानन, परिशिष्ट प्रकाशक- अधीक्षक गवर्नमेन्ट प्रिन्टिंग प्रेस, पटना 1930, मैक्फर्सन सेट्लमेंट रिपोर्ट, प्रकाशक बंगाल सेक्रेटेरिमेंट बुक डिपो, कलकत्ता, 1909, पृष्ठ 27-28, ओंमेली संताल परगना गजेटियर, लोगोस प्रेस नई दिल्ली, 1984 पृष्ठ 38-40) पहाड़िया जनजाती के अलावे इस इलाके में बहुत सी जातियों के लोग काफी पहले से रह रहे थे। इनमें खेतौरी, लोहार, यादव, धांगड़, बैरागी, बाउरी, डोम, हाड़ी, जुलाहा, कलवार, कुम्हार महुली, मोमीन एवं तेली प्रमुख थे। इनके अलावे ब्राह्मण भी बड़ी संख्या में मुगलकाल से ही बसे हुए थे। (बिशेष विवरण के लिये देखे डा0 सुरेन्द्र झा की रीडिंग्स इन रीजनल हिस्ट्री आफ बिहार एण्ड झारखण्ड, जानकी प्रकाशन, पटना - 2004) इस क्षेत्र के जमींदारों तथा अन्य लोगों ने ईस्ट इण्डिया कंपनी की सत्ता के विस्तार का जमकर प्रतिरोध किया था। (बिशेष विवरण के लिये देखें डा0 लीला प्रसाद की पुस्तक अपोजिसन टू ब्रिटिश सुप्रीमेसी, जानकी प्रकाशन पटना) अतः अंग्रेज साम्राज्यवादी प्रारंभ से ही जंगलतराई को लेकर संशंकित रहा करते थे और इस इलाके को मुख्य धारा से पृथक करने का उपाय सोच रहे थे। उनके इस चिंतन का प्रतिबिम्ब क्लीवलैण्ड-व्यवस्था एवं 1796 के रेगयूलेशन प्रथम में दिखाई पड़ता है। संताल परगना के उपायुक्त मि0 ओल्डहैम ने इसे स्वयं स्वीकार किया है कि 1855 के एक्ट-37, जिसके द्वारा संताल परगना का नामकरण एवं सृजन हुआ, के बीज 1796 के रेग्यूलेशन प्रथम में निहित थे। (देखें संताल परगना मैनुअल, पटना, 1911 प्राक्कथन) इस बीच में 18वीं शताब्दी के अंतिम दशक में संतालों का आगमन प्रारंभ हुआ। उनका आगमन मुख्यतः छोटानागपुर और मिदनापुर तथा वीरभूम की ओर से हुआ। संतालो के प्रवजन के मुख्यतः दो कारण थे। छोटानागपुर के जंगल साफ हो चुके थे तथा वहाँ आबादी बढ़ रही थी। दूसरा कारण यह था कि 1793 के स्थायी बंदोबस्ती के बाद नये जमीन्दार इन इलाको में जंगल साफ कराना चाहते थे तथा वीरभूम के जमींदार उन्हें तंग कर रहे थे। जिस समय वहाँ कॉर्नवालिस की स्थायी बंदोबस्ती का कार्यक्रम चल रहा था, उसी समय संताल यहाँ आकर बस रहे थे। (देखें मैक्फर्सन सेट्लमेन्ट रिर्पोट, पृष्ठ-30) इस बीच में क्लीवलैण्ड की व्यवस्था ध्वस्त हो रही थी और प्रशासन के विरूद्ध अनेक षिकायतें आ रही थीं। इनकी जाँच के लिये भागलपुर के संयुक्त मैजिस्ट्रेट मि0 सदरलैण्ड को प्रभार दिया गया। मि0 सदरलैण्ड ने 1819 में अपना रिर्पोट दिया तथा अनुशंसा की कि पहाड़िया जनजातीय इलाकों को पृथक कर सरकारी जमींदारी के अंतर्गत लाया जाय। 1823 में सरकार ने इसे स्वीकार कर लिया और 1824 में मि0 वार्ड ने पैमाइस की। 1833 मे यह कार्य पूरा हो गया तथा इस इलाके को दामिन-ए-कोह का नाम दिया गया जिसका शाब्दिक अर्थ पहाड़ियों का घांघरा होता है। मि0 मैक्फर्सन का कथन है कि इस इलाके के अधिकांश जंगलों को संतालों ने तथा भुइयां लोगो ने 1818 के पूर्व साफ कर उसे कृषि योग्य बना दिया था। मि0 वार्ड ने भी संतालों को बसने के लिये प्रोत्साहित किया। मि0 पॉन्टेट, जो 1837 में दामिन-ए-कोह के प्रथम अधीक्षक नियुक्त किये गये थे, ने संतालों को बसाने में काफी रूची ली। वे संतालों से सहानूभूति रखते थे। संतालों को बसाने के पीछे ब्रिटिश साम्राज्यवादियों का मुख्य उद्येश्य दामिन के राजस्व में वृद्धि करना था। इसके अलावे वे संतालों को पहाड़िया जनजाति के विरूद्ध संतुलन बनाने के लिये भी प्रयत्नशील थे। कंपनी को इसमें शीघ्र ही सफलता भी मिली और दामिन का राजस्व 2611 रूपये बढ़कर 58033 रूपये हो गया (मैक्फर्सन रिपोर्ट पृष्ठ-35) लेकिन शीघ्र ही संतालों ने 1855 में विद्रोह कर दिया। संताल विद्रोह के मुख्य कारणों में इतिहासकारों ने जमीन्दारों के शोषण, महाजनों के उत्पीड़न और पुल