वन अधिकार कानून 2006 को निष्क्रिय करने का प्रयास

28.11.2016

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक- मेघा शिरोमणि किडो

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झारखण्ड राज्य के गढवा जिले में वन भूमि पर लोगों द्वारा अपनी आजीविका के लिए किये गए दखल को अवैध कब्जा बताकर हटाने की जो मुहिम वन विभाग द्वारा चलाई गई है वह पूरी तरह से वनाधिकार कानून 2006 की अवमानना है. गढवा जिला, भंडरिया प्रखंड के ग्राम सीजो में 7 अक्टूबर 2016 को वन विभाग के द्वारा जेसीबी मशीन के द्वारा आदिवासियों के 24 घरों को ध्वस्त कर दिया गया. उन्होंने न सिर्फ घरों को ध्वस्त किया, बल्कि उनकी फसलों को नुकसान पहुंचाया. साथ ही साथ उनके द्वारा लगाये गए धान, मकई के तैयार फसलों को काटकर अपने साथ ले गए. गौरतलब है, कि वन अधिकार कानून 2006 की यहां पर अवहेलना की गयी, क्योंकि वन अधिकार 2006 के अंतर्गत आदिवासी एवं अन्य परम्परागत वन निवासी का अधिकार वन भूमि पर है. अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परम्परागत वन निवासी अधिनियम 2006 भारत सरकार का एक महत्वकांक्षी और जनहित का कानून है. वनों की बंदोबस्ती के समय लोगों को वनों पर अपने परम्परागत अधिकारों कि अनदेखी करने के कारण जो ऐतिहासिक अन्याय हुआ है, उसी को दूर करने के लिए यह कानून बना. वहीं करचाली पंचायत के जमवती गांव, जहां 23 परिवार है, जो वन भूमि पर खेती करते हुए अपना जीवन यापन करते है, 6 अक्तूबर 2016 को चार घरों को धवस्त कर दिया गया. ऐसी ही एक और घटना है- भंडरिया प्रखंड के मर्दा गांव की, जहां दस घरों को गिरा दिया गया. बगवार तथा महगाई गांव में भी इसी तरह से वन बिभाग ने अपनी मुहिम को जारी रखा. यहां भी उन्होंने सोलह घरों को तबाह कर दिया और फसलों को भी नष्ट कर दिया. झारखण्ड के नाम से ही वन का आभास होता है. इसके बाद अपने आप सारे सवालों का जवाब मिल जाता है. वर्ष 2006 में वन अधिकार कानून लागू होने के बाद दशकों के संघर्ष का नतीजा निकला और अनुसूचित जनजाति व अन्य परम्परागत वन निवासी अधिनियम के तहत वनवासियों को बहुत हद तक वनों पर अधिकार मिल गया. हालाँकि वन अधिकार कानून नाम देने से लगता है कि वन का पूरा स्वामित्व सौंप दिया जा रहा हो जबकि ऐसा नहीं है. कई व्यक्तिगत तथा सामुदायिक दावे विचाराधीन पड़े है और सरकार इसमें कोई दिलचस्पी नहीं ले रही है. इस कानून के अंतर्गत अधिकार सिर्फ उन्हें प्राप्त है जो कम से कम 75 सालों से वन में निवास करते आ रहे है और यह अधिकार तब तक बना रहेगा. जब तक ये वन में निवास करते रहेंगे, चाहे वह अनुसूचित जनजाति हो या फिर अन्य परम्परागत वनवासी.