लोकपाल लाने के लिए सरकार के पास इच्छाशक्ति नहीं

03.12.2016

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-जगदीप छोकर

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तकरीबन साढ़े चार दशक से ज्यादा समय से लटका हुआ लोकपाल बिल साल 2013 में पास तो हो गया था, लेकिन अभी तक देश में लोकपाल नहीं आ पाया है. बिल पास होने के बाद भी अभी तक लोकपाल क्यों नहीं आ पाया है, इसके पीछे की राजनीतिक हकीकत को समझना जरूरी है. इसको पूरी तरह से समझे बगैर हम यह नहीं समझ सकते कि आखिर लोकपाल के आने में राजनीतिक तौर पर क्या समस्या है. दरअसल, हमारी भारतीय राजनीति में एक सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि इसमें इस्तेमाल होनेवाल धन सही तरीकों से नहीं आता है. राजनीतिक दलों की आमदनी का हिसाब-किताब किसी को पता नहीं है. वे हर साल आयकर विभाग को अपनी आमदनी दिखाते हैं. हालांकि वे टैक्स नहीं देते, क्योंकि इनकम टैक्स कानून की धारा-13ए में लिखा हुआ है कि राजनीतिक दलों की आय पर आयकर की सौ प्रतिशत छूट है. खैर यह तो कानून है, इसमें कोई बात नहीं. मसला यह है कि राजनीतिक दल जो सालाना आमदनी दिखाते हैं, यह नहीं पता चलता कि यह आमदनी कहां से आयी है. कानून में यह भी है कि दलों को बीस हजार से ऊपर के मिलनेवाले पैसों की सूची चुनाव आयोग को देनी होती है. इस आमदनी का जब हमने हिसाब-किताब लगाया, तो मालूम हुआ कि महज 20-25 प्रतिशत आमदनी का ही पता चल पाता है कि वह कहां से आयी है, बाकी 75-80 प्रतिशत के स्राेत का किसी को पता नहीं है. इसी स्रोत का पता लगाने के लिए हमने आरटीआइ डाली, तो राजनीतिक दलों का जवाब आया कि हम आरटीआइ के दायरे में नहीं आते. फिर हम केंद्रीय सूचना आयोग (सीआइसी) के पास गये, तो वहां से जवाब मिला कि कोई और ठोस सबूत लाइये. फिर हमने दो साल में तमाम सरकारी विभागों में दो हजार आरटीआइ डाल कर छह राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के बारे में पूरा मसौदा इकट्ठा किया. यह मसौदा पूरी तरह से सरकारी सूत्रों से प्राप्त जानकारियों पर ही आधारित था. इस मसौदे को हमने सीआइसी को दिखाया और इसमें वे छह दल भी अपने तर्क लेकर आये. इस तरह सबकी सुनने-सुनाने के बाद सीआइसी की एक फुल बेंच ने 3 जून, 2013 को यह फैसला दिया कि छह राष्ट्रीय पार्टियां- कांग्रेस, भाजपा, माकपा, भाकपा, राकांपा और बसपा- सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत सार्वजनिक प्राधिकार हैं, इसलिए इन दलों को आरटीआइ आवेदनों का जवाब देना चाहिए. लेकिन इन छह दलों ने सीआइसी के इस फैसले को मानने से इनकार कर दिया. इस संबंध में सीआइसी इन दलों को दो साल तक नोटिस भेजता रहा, लेकिन दलों ने कोई जवाब नहीं दिया, तो अंतत: सीआइसी ने मार्च 2015 में लिख कर दे दिया कि वह इस फैसले को लागू नहीं करवा सकता. इसके बाद हम सुप्रीम कोर्ट गये. सुप्रीम कोर्ट में भारत सरकार ने एक हलफनामा फाइल किया कि राजनीतिक दल आरटीआइ के दायरे में नहीं आने चाहिए. इस राजनीतिक हकीकत का निहितार्थ यह है कि हमारे राजनीतिक दल और राजनीतिक दलों की बनायी हुई सरकार, ये दोनों राजनीतिक दलों की आय को स्रोत और इकट्ठा पैसों का ब्योरा उजागर करना चाहते ही नहीं हैं. मसला यहीं है. जब राजनीतिक दल अपने पैसे को छुपा कर रखने के लिए इतनी मेहनत कर रहे हैं, तो जरूर इसमें कुछ छुपानेवाली बात होगी ही. ऐसे में यह कैसे मुमकिन है कि लोकपाल इतनी आसानी से आ जायेगा? क्योंकि अगर लोकपाल आ गया, तो इस तरह की चीजें छुपानी मुश्किल हो जायेंगी. सच्चाई यह है कि पिछले 48 साल से लोकपाल लाने की बात चल रही है और हर दफा कोई न कोई रोड़ा अटका दिया जाता है. इन सब रोड़ा-ओड़ा से गुजरते हुए अंतत: किसी तरह थोड़ा लचीला बना कर लोकपाल बिल पास तो हुआ, लेकिन वह भी कोई बहुत बढ़िया और प्रभावी लोकपाल बिल नहीं है. लेकिन, इस बात की तसल्ली है कि चलो लोकपाल बिल पास हो गया है. दूसरी समस्या, बिल पास होने के बाद भी अब इसे लागू नहीं किया जा रहा है. यह लागू इसलिए नहीं हो पा रहा है, क्योंकि लोकपाल के लिए चयन समिति में विपक्ष के नेता को शामिल किया जाना है. लेकिन, इस समय लोकसभा में कोई विपक्ष का नेता ही नहीं है और न ही मौजूदा सरकार यह चाहती है कि विपक्ष का कोई नेता हो. तब यह कहा गया कि जब नेता विपक्ष नहीं है, तो उसकी जगह सबसे ज्यादा सांसदों वाले विपक्षी दल के नेता को लोकपाल के लिए चयन समिति में डाल दिया जाये. इसी तरह की बदली सीआइसी और सीवीसी की नियुक्ति वाले कानून में कर दी गयी, लेकिन यही बदली लोकपाल की नियुक्ति वाले कानून में नहीं की गयी. ऐसा करने की सरकार की इच्छा बिल्कुल भी नहीं दिखती है. लोकपाल लाने का मसला राजनीतिक इच्छाशक्ति का मसला है. लेकिन, यहां यह नहीं कहना चाहिए कि राजनीतिक दलों और सरकार में लोकपाल लाने की इच्छाशक्ति नहीं है, बल्कि यह कहना चाहिए कि लोकपाल न लाने की इच्छाशक्ति बहुत मजबूत है. इस पूरे मसले की जड़ है राजनीतिक दलों की आमदनी और खर्चे का हिसाब-किताब. जब तक इसका ब्योरा हम सबके सामने नहीं आयेगा, तब तक न तो लोकपाल बननेवाला है, न ही भ्रष्टाचार खत्म होनेवाला है. और न ही नोटबंदी से भ्रष्टाचार के भस्मासुर का कुछ होनेवाला है. सुप्रीम कोर्ट ने लोकपाल लाने को लेकर जो टिप्पणी की है, उसके बाद में मुझे अंदेशा है कि कुछ हासिल नहीं हो पायेगा. सरकार और सुप्रीम कोर्ट का आपस में कोई प्रेम तो है नहीं, इसलिए यह मामला ऐसे ही लटकते हुए चलता रहेगा, क्योंकि राजनीतिक दल किसी भी हालत में लोकपाल लाने के पक्ष में नहीं होंगे. इस बात का सबसे अच्छा उदाहरण प्रकाश सिंह की पुलिस सुधार की याचिका पर आया फैसला है. दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने साल 2006 में ही सेवानिवृत्त वरिष्ठ पुलिस अधिकारी और उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक प्रकाश सिंह की याचिका पर पुलिस सुधार पर फैसला दिया था, लेकिन दस साल के बाद भी उस फैसले पर अमल नहीं किया गया. इस ऐतबार से देखें, तो लोकपाल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तो अभी एक टिप्पणी ही की है. अभी सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में कोई फैसला देना होगा, उसके बाद देखना होगा कि सरकार लोकपाल लाती है या नहीं. मेरा ख्याल है कि इसमें भी कुछ नहीं होगा. एक कहावत है कि अगर कोई आदमी सो रहा हो, तो उसे आप जगा सकते हैं, लेकिन अगर वह सोने