‘सड़क सुरक्षा- कदम उठाने का समय’

07.12.2016

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-अर्चना दत्तास

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भारत में वर्षों से सड़क सुरक्षा पर बहस चलती रही है। फिर भी कुछ बेहतर नतीजे निकलकर सामने नहीं आए हैं। आलम यह है कि रोज–ब–रोज सड़क हादसों की फेहरिस्त लंबी होती जा रही है और इन्हें लेकर जनता में न तो भय है और न ही घृणा। यातायात को नियंत्रित–व्यवस्थित करने के लिए कानून की कमी नहीं है। सड़कों पर तेज गति से भागती हुई लंबी कारें किसी की परवाह किए बिना दौड़ रही हैं। सरकारी और गैर सरकारी सर्वे यह बता रहे हैं कि प्रतिवर्ष सड़क दुर्घटना में बढोत्तरी हो रही है। भारत का नाम दुनिया के उन देशों में शामिल है, जिनका सड़क सुरक्षा के मामले में बेहद खराब रिकार्ड है। देश में प्रत्येक वर्ष पांच लाख सड़क दुर्घटनाएं होती हैं और दुर्घटनाओं के कारण तक़रीबन 1,42,000 लोग दम तोड़ देते हैं, पांच लाख से ज्यादा घायल और कितने ही ज़िन्दगी भर के लिए अपंग। इसका अर्थ है कि हर एक मिनट में एक सड़क दुर्घटना होती है और चार से कम मिनट में दुर्घटना के कारण एक व्यक्ति दम तोड़ देता है। यह बात यही पर नहीं ख़तम हो जाती, दुर्घटना के शिकार व्यक्ति के परिवार पर जो गुज़रती है उसका कोई हिसाब नहीं है। किसी चौराहे पर लाल बत्ती को धता बताकर रोड पार कर जाना, गलत तरीके से ओवरटेकिंग, बेवजह हार्न बजाना, निर्धारित लेन में न चलना और तेज गति से गाड़ी चलाकर ट्रैफिक कानूनों की अवहेलना आज के नवधनाढय युवकों का प्रमुख शगल बन गया है। विकास के साथ–साथ जिस सड़क संस्कृति की जरूरत होती है वह हमारे देश में अभी तक नहीं बन पाई है। सुप्रीम कोर्ट सख्त सुड़क सुरक्षा को लेकर हाल में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से सवाल पूछा कि केंद्र सरकार लापरवाही से गाड़ी चलाने वालों पर और ऐसे लोगों द्वारा लोगों की जान लेने वालों को सख्त सजा दिलाने के लिए क्या कर रही है ? कोर्ट ने हिदायत देते हुए कहा भी है कि केंद्र सुरक्षा को लेकर कानून में संशोधन करें, कोर्ट ने टिप्पणी कर कहा कि रोजाना सड़कों पर लोग दुर्घटनाओं में मर रहे है या अपंग हो रहे है. ऐसे में जो लोग शराब के नशे में धुत होकर लापरवाही से, तेज गति में गाड़ी चलाते है, उनके मन में कानून का डर होना चाहिए. वहीं केंद्र की ओर से अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कोर्ट को बताया कि संसद में इस विषय को लेकर कानून लंबित है, सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि सड़क सुरक्षा फंड पर विचार किया जा रहा है. अधिनियम में संशोधन करने का प्रयास किया जा रहा है. इस पर बेंच ने सवाल किया कि यानी आप करदाताओं से पैसे वसूल करेंगे. पीठ ने कहा कि बीमा कंपनियों से क्यों नहीं वसूल किया जाना चाहिए. वहीं इस मामले में अमाइकस क्यूरी गौरव अग्रवाल ने सुझाव दिया है कि बीमा कंपनियों को बीमा राशि में 10 रुपये की बढ़ोतरी कर देनी चाहिए और बढ़ी हुई रकम से एक कोष बनाना चाहिए. इससे सालाना करीब 200 करोड़ रुपये जमा हो सकते हैं. इस पर कोर्ट ने केंद्र सरकार को स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है. साथ ही जनरल इंश्योरेंस काउंसिल को भी नोटिस जारी करते हुए जवाब दाखिल करने के लिए कहा है. परिवहन नेटवर्क का विस्तातर वृद्धि के लिए पहली जरूरत है और शहरीकरण उसका लगभग निश्चित परिणाम है। इसलिए, अब जबकि भारत वृद्धि के पथ पर अग्रसर है, हमारे यहां शहरीकरण का बढ़ता स्तसर और शहरों में जनसंख्या् का भारी घनत्वस है। जैसा कि अपेक्षित था, वाहनों की संख्या में समग्र व़द्धि के साथ हम देश में सड़क नेटवर्क का तेजी से विस्ताकर होते भी देख रहे हैं। भारत का सड़क नेटवर्क आज दुनिया के विशालतम सड़क नेटवर्क्सर में से एक है। वर्ष 2003-13 की अवधि के दौरान मोटर वाहनों की तदाद यहां 10.5 प्रतिशत की संयोजित वार्षिक वृद्धि दर की रफ्तार से बढ़ी है। यह व़द्धि जहां पूरी तरह व्य्वस्थित और उभरती अर्थव्य वस्थाि के लिए आवश्यीक भी है, वहीं चिंता की बात यह है कि सड़क पर बढ़ते दबाव से निपटने के लिए हमने खुद को तैयार नहीं किया है। हमने समकालीन यातायात नियम बनाने और इन नियमों को अपनाने के बारे में जागरूकता जगाने सहित आधुनिक यातायात प्रबंधन प्रणालियां और पद्धतियां भी नहीं अपनायीं। इसके परिणामस्वारूप देश में सड़क दुर्घटनाओं की संख्याि बहुत अधिक है और सड़क यातायात में सुरक्षा चिंता का विषय है और सार्वजनिक स्वायस्य्त का प्रमुख मुद्दा बन चुकी है। देश में हर एक घंटे में 56 सड़क दुर्घटनाएं और उनमें 16 व्याक्तियों की मौत होती हैं। सड़क यातायात की ‘सुरक्षित प्रणाली’ सुनिश्चित करने के लिए, सड़क अवसंरचना में वृद्धि, वाहनों में सुरक्षा प्रणाली विकसित करना, चालकों और सड़क का उपयोग करने वालों के व्‍यवहार में परिवर्तन लाना और आपातकालीन सेवाएं और दुर्घटना के बाद की सेवाएं उपलब्ध् कराया जाना आवश्यरक है। सड़क सुरक्षा में ये चार-ई शामिल हैं- शिक्षा, प्रवर्तन, अभियांत्रिकी, पर्यावरण और आपातकालीन सेवा। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2009 में सड़क सुरक्षा पर अपनी पहली वैश्विक स्थिति रिपोर्ट में सड़क दुर्घटनाओं की दुनियाभर में “सबसे बड़े कातिल” के रूप में पहचान की। रिपोर्ट में कहा गया है कि हर साल दुनियाभर में सड़क हादसों में 1.2 मिलियन लोगों की मृत्यु हो जाती है और 50 मिलियन लोग इससे प्रभावित होते है। सड़क हादसों में होने वाली मौतों में 50 प्रतिशत तक कमी लाने के लक्ष्य के साथ सड़क सुरक्षा के लिए कार्रवाई का दशक “(2011-2020)” अंगीकृत किया गया। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत की पहचान ऐसे देश के रूप में की है, जो सड़क हादसों में होने वाली मौतों के मामले में सबसे आगे है, जहां अनुमानित तौर पर प्रति मिनट एक सड़क दुर्घटना होती है और हर चौथे मिनट में सड़क दुर्घटना में एक मौत होती है। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार हर साल एक लाख से ज्यादा लोगों की सड़क दुर्घटनाओं में मौत होती है। अकेले 2014 में ही सड़क दुर्घटनाओं में 1.39 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हुई। सरकार ने वर्ष 2010 में राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा नीति में अपनायी, जिसमें सड़क सुर