करमा प्रकृति की सहजता और बहुरंगी धार्मिक आस्थाओं का समागम है

16-01-2017

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-मेघा शिरोमणि किरो

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भाई बहन के प्यार का प्रतीक पर्ब करम प्रकृति की सहजता और बहुरंगी धार्मिक आस्था का समागम है इसके अनेक रूप प्रचलित है पर सबमें प्रकृति के प्रति समर्पण और श्रद्धा ही निहित है झारखण्ड के सर्वाधिक लोकप्रिय पर्वों में से एक है करम पर्व. सामूहिकता, बंधुत्व तथा भाई- बहन के पवित्र प्रेम का प्रतीक पर्व. करमा भादो के ऐसे माह में मनाया जाता है, जब प्रकृति कि हरियाली पर सभी मोहित हो रहे होते है. करमा प्रकृति की सहजता और बहुरंगी धार्मिक आस्थाओं का समागम है. वस्तुतः यह सृष्टिकर्ता के रूप में निराकर ईश्वर की आराधना का प्रतीक है कर्म के साथ भक्ति के संयोग का अनूठा उदाहरण है यह पर्व. करम पर्व आदिवासी बंधुओं के धर्म और संस्कृति से जुडी हुई धरोहर है . करम पर्व भाद्रपद की एकादशी को, जिसे पहना एकादशी कहते है, माना जाता है. रोपा डोभा से निवृत होने के बाद आदिवासी बंधु इसे पुरे हर्सौल्लास के साथ मनाते है .करम पर्व के वैसे तो अनेक रूप है यथा, करम, दसई करम, बूढी करम,जितिया,ईद करम, राजी करम, इत्यादि जो अलग अलग समय पर अलग अलग जगहों में मनाया जाता है .जहाँ तक इसके विधि विधान का प्रशन है, यह मुख्यतः बहनों का पर्व है. जो अपने भाइयों के दीर्घजीवी तथा सुखी संपन्न होने के लिए करती है. पर्व की शुरुआत करम से सात अथवा नौ दिन पूर्व से ही हो जाती है. तीज पर्व के अगले ही दिन जावा रखने कि विधि प्रारंभ होती है . पूजा करने वाली बहनें नहाने के बाद पास कि नदी के किनारे जाकर बांस कि बनी विशेष टोकरी में बालू लाती है. तथा एक साथ पर साथ साथ रखकर संग संग नाचती-गाती है. इसके उपरांत बहनें अपनी अपनी टोकरी लेकर वापस आती है इस बालू की टोकरी में सात प्रकार के अनाजों के बीज यथा ; जौ, मकई,धान,चना,उरद,कुर्थी,और सुरगुजा बोये जाते है. इसे ही "जावा रखना " कहते है. सात दिनों तक इन जावा फूलों कि श्रधापुर्बक देखभाल की जाती है. बीज से अंकुर निकलते ही हल्दी पानी क छिडकाव किया जाता है. करम पूजा के दिन भाई जंगल से करम की तीन डलियाँ काट कर लाते है . डालियाँ एक बार में ही कटनी चाहिए. इस दिन भाई भी उपवास रखते है. यह डाली आंगन में डाली जाती है. इस अवसर पर भी गीत गाये जाते है अखरा के लिए यह डालियाँ लाने पाहन गाजा – बाजा के साथ जाते है पेड़ के समीप जाकर पाहन करम देवता का स्मरण करते है. पेड़ की तीन या पांच बार प्रदक्षिणा करते हुए वृक्ष में सूत लपेटते है, जिसे सूत पहनाना कहते हैं. तत्पश्चात वृक्ष कप तीन या पांच बार सिंदूर से टीकते हैं . अरवा चावल का अक्षत छिडकते हुए वृक्ष की पूजा पूर्ण की जाती हैं. इसके उपरांत पाहन वृक्ष पर चढ़कर तीन डालियाँ, प्रत्येक एक ही बार में ,काटते है, जिसे जमीन पर नहीं गिरने नहीं दिया जाता. इन डालियों को लाकर, गोबर से लीपे आंगन अथवा अखरा के बीच में मिट्टी के पिंड में गाड़ कर, पूजन किया जाता है . बहनें भी पूजा सामग्री के साथ डाल के चारों ओर बैठकर पूजा करती है पूजा सामग्री में पुत्र- प्रतीक रूप में खीरा भी रखा जाता है इसके पश्चात समाज के बुजुर्ग अथवा पाहन करमा-धरमा की कथा सुनाते हैं रात भर संगीत नृत्य का कार्यक्रम ढोल-मंदार-नगाड़ों के साथ चलता हैं. यह मेल मिलाप सामाजिक समरसता एवं एकता का परिचायक हैं इन अर्थों में करम झारखण्ड की सांस्कृतिक पहचान हैं. यह पर्व विशेष रूप से भाई और बहन के सम्बन्ध को प्रगाढ़ करने वाला पर्व है. भारतवर्ष कि नारियाँ त्याग की मूर्ति होती है. बहन करम पूजा करते हुए कहती है कि मेरे कर्म का सुफल भी मेरे भाई को मिल जाए. भाई-बहन को एक सूत्र में बांधे रखने वाला यह पर्व,न सिर्फ परिवार बल्कि पुरे समाज को,एक सूत्र में बांधता हैं .