इंडिया की यह जगह कहलाती है- मिनी लन्दन

21-01-2017

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तस्वीर द्वारा- गोपी चंद चौरसिया

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लेखक-गोपी चंद चौरसिया

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कालांतर में एंग्लो इन्डियन की नगरी में बंगाली समुदाय के लोगों का रुझान बढ़ा और मैकलुस्की गंज धीरे धीरे पर्यटन नगरी के रूप में बदल गई. मैकलुस्की गंज आज एक पर्यटन स्थल के रूप में प्रसिद्ध हो चुका है. यहाँ आने वाले बंगाली परिवार को इन बंगलों में बतौर पेइंग गेस्ट के रूप में एंग्लों इंडियन समुदाय न्र रखना शुरू कर दिया जिसके चलते मैकलुस्की गंज में पर्यटन उद्योग फलने – फूलने लगा. 60 के दशक में कैप्टेन डी. आर. कैमरोन का मैकलुस्की गंज में पदार्पण हुआ. उन्होंने होलैंड गेस्ट हाउस को खरीद लिया और मैकलुस्की गंज के पुराने गौरव को लौटाने की दिशा में कार्य शुरू किया. बेरोजगारी का दंश झेल रहे अपने अपने समुदाय के लोगों के लिए उन्होंने स्कूल संत एंडरज के नाम से खोला जिसमें समुदाय के दिलों में आज भी है. एक अन्य एंग्लो इंडियन नोबेल गार्डेन ने उनके द्वारा छोड़े गए अधूरे कार्यों को पूरा करने का बीड़ा उठाया. पर्यटकों की असुविधा को ध्यान में रखकर एक गेस्ट हाउस गार्डेन गेस्ट हाउस सभी सुविधाओ से परिपूर्ण खोला. जहाँ दुसरे राज्य से आने वाले पर्यटक ठहरते रहे है. दुर्भाग्यवश गार्डेन साहब भी मैकलुस्की गंज के लिए कुछ करने की ललक के लिए इस दुनिया से चल बसे. नौ हजार नौ सौ निन्यानवे एकड़ जमीन पर बसा हुआ था मैकलुस्की गंज में एंग्लो इंडियन का विरासत : यह कहानी है विश्व के मात्र एंग्लो इन्डियन गाँव मैकलुस्की गंज की राजधानी से 55 किलोमीटर की दुरी पे पहाड़ों की तलहटी में अवस्थित है.आज से साठ दशक पूर्व कलकत्ता के अर्नेस्ट ठिमकी मैकलुस्की गंज जो उस समय ब्रिटिश सरकार में एंग्लो समुदाय का प्रतिनिधित्व M.L.C के रूप में करते थे. उस समय यह क्षेत्र रातू महराज के अधीन था. अपने समुदाय का कुनबा बसाने से पूर्ब मैकलुस्की यहाँ शिकार खेलने आया करते थे. कोलोनाईजेशन सोसाइटी ऑफ़ इंडिया के नाम से एक संस्था का निर्माण किया जिसके लिए मैकलुस्की गंज मने बरवाडीह गोमो रेल खंड पर कोनका,लपरा,दुली,हरहु ,रमदगा,मायापुर,महुलिया,बघमारी आदि गांवों में 9999 एकड़ जमीन खरीदी. उन्होंने देश के अलग अलग हिस्सों में बसे एंग्लो इंडियन लोगों को बुलाना शुरू किया. सुरम्य वातावारण वाले इस गाँव में लगभग 400 एंग्लो इंडियन परिवार इन गांवों में आकर बसे. 1935 में मैकलुस्की का निधन हुआ. उनके निधन के बाद इन गाँव को मैकलुस्की साहब के नाम पर मैकलुस्की गंज हुआ. यहाँ की छठा निराली थी. मैकलुस्की गंज की सड़कों पर बगहियो की सवारी करते तथा घोडों की सवारी करते एंग्लो समुदाय के लोग नजर आते. अपनी जरुरत की सारी सुविधायें इन्होने मुहैया कर राखी थी.इनका अपना कल्ब,डांस घर था. जहाँ साम होते ही महफिल जमती थी. इनका अपना इंतजाम था बिजली का. ये एक पुराने लोको इंजन से पुरे गाँव में रोशनी कि व्यवस्था किये थे.द्वितीय विश्व युद्ध के बाद एंग्लो इन्डियन के बड़े हो रहे बच्चो के समक्ष रोजी रोटी और पढाई की समस्या उत्पन्न हो गई. इसलिए कुछ एंग्लों परिवार यहाँ से पलायन कर गए.रोजगार के लिहाज से यह जगह उन्हें राश नहीं आने लगा. आजादी के बाद 250 परिवार ही यहाँ बचे हुए थे. ये भी रोजगार की तलाश में धीरे धीरे यहाँ से कूच करना शुरू कर दिए. आज इनके द्वारा बनाए गये कई आलीशान बंगलों के मालिक अवकाश प्राप्त उच्च अधिकारी और धनाढ्य बंगाली समुदाय के लोग है. फलस्वरूप मैकलुस्की गंज में बंगाल से भारी संख्या में पर्यटकों का आगमन शुरू हुआ. इससे न सिर्फ यहाँ के एंग्लो इंडियन परिवार को बल्कि अन्य लोगों को भी रोजगार मिला. आज कैमरोन साहब नहीं रहे लेकिन पर्यटन उद्योग में उनके दें यहाँ के लोग अपने ह्रदय में संजोग कर रखे है. झारखण्ड सरकार के पर्यटन विभाग ने लाखों रुपए खर्च कर यहाँ पर्यटन सुचना केंद्र बनवाया है जो उदघाटन का बाट जोह रहा है.साथ ही केन्द्रीय विभाग भी लगभग चार करोड़ की राशि खर्च कर यहाँ के पर्यटन स्थलों का काया कल्प किया. जिसका श्रेय तत्कालीन पर्यटन मंत्री को जाता है मैकलुस्की गंज का मौसम : मैकलुस्की गंज की आबोहवा और मौसम से प्रभावित होकर ही एंग्लो इंडियन समुदाय के लोग मैकलुस्की गंज में बसे थे. बसने से पूर्ब यहाँ का पानी और मिट्टी का परीक्षण इंगलैंड में हुआ था. लोग बताते है कि गर्मी के दिनों में भी रात में यहाँ कंबल की आवश्यकता पड़ती थी. उन दिनों ठण्ड के दिनों में यहाँ का तापमान -3 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता था . जगह जगह बर्फ जमे नजर आते थे. बरसाती नालों की धार जम जाया करती थी. पेड़ो पर,झाड़ियो पर बर्फ ही बर्फ नजर आता था. लेकिन अब वह बात नहीं रह गई है. प्रकृति के अत्याधिक दोहन और ग्लोबल वार्मिंग का असर यहाँ दिखने लगा है.