ऊंची उड़ान उड़ने को आतुर बेटियां

30-01-2017

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-जीवेश रंजन सिंह

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च तरा जिले के कान्हाचट्टी प्रखंड से 22 किलोमीटर दूर बिहार सीमा पर पहाड़ की तलहटी में बसे गड़िया गांव की लड़कियां मैट्रिक की पढ़ाई के लिए 12 किलोमीटर दूर पैदल तुलबुल हाई स्कूल जाती हैं. स्कूल तक जाने के लिए पहाड़ी रास्ता के साथ-साथ नदी भी पार करना पड़ता है. 
नदी के कारण बरसात में काफी दिक्कत होती है. कई बार तो घंटों पानी उतरने के इंतजार में जंगल में लड़कियों को बैठना पड़ता है. पिछले वर्ष स्कूल में छुट्टी के बाद जब लड़कियां नदी के पास पहुंचीं, तो अचानक उस पहाड़ी नदी में पानी का सैलाब आ गया. एक लड़की किसी तरह पार हो सकी थी. काफी देर सबने बैठ कर पानी कम होने का इंतजार किया. शाम भी होने लगा था, घर की चिंता और किसी खतरे से भयभीत लड़कियों ने हिम्मत से काम लिया और सबने अपने दुपट्टे को जोड़ कर दूसरे किनारे खड़ी अपनी सहेली के पास फेंका. फिर दोनों अोर उसे पेड़ से बांधा गया. 
 
फिर उसके सहारे लड़कियों ने नदी पार किया. इतना सब होने के बाद भी उनके हौसले में कमी नहीं आयी. इसमें सबसे ज्यादा साथ मिला मां का और हालात यह है कि अभी तक गांव की 30 लड़कियां मैट्रिक पास कर चुकी हैं. पिछले वर्ष तीन लड़कियाें ने इंटर की परीक्षा पास की जिनमें उर्मिला, नीलम व ज्ञानति शामिल थीं. 
 
इस वर्ष भी गांव की 12 लड़कियां नौवीं व दसवीं की पढ़ाई कर रही हैं. ये सभी पैदल स्कूल जाती और आती हैं. इसके अलावा घर का काम तो प्रतिदिन के रूटीन में शामिल है हीं. अभी जो रोज स्कूल जा रही उनमें शामिल हैं कलावती, पिंकी, प्रेमा, अनीता, कुसमी, सुषमा, गीता, बबिता, नीतू, ममता व सुमन.
 
कोई बेटी अनपढ़ न रहे : गांव की ही एक अन्य बेटी रिंकी कुमारी गांव के स्कूल में पारा टीचर हैं. जब पारा शिक्षक की बहाली के लिए आवेदन मांगा गया, तो उसने भी फॉर्म भरा. उस समय उसे बाहर के लोगों ने भयभीत करने की भी कोशिश की, पर वह हिम्मत नहीं हारी. बाद में उसका हौसला और अंक देख उसे पारा शिक्षक के रूप में चुन लिया गया. आज वह गांव के ही स्कूल में पारा शिक्षक है. रिंकी का कहना है कि गांव का हर बच्चा पढ़े, यही उसकी कामना है.
 
अभिभावकों का है समर्थन : गड़िया गांव की बेटियों की इस हिम्मत के पीछे उनके माता-पिता का हाथ है.  उनका कहना है कि उनकी जिंदगी तो बरबाद हो गयी, बच्चों की क्यों हो.
 
नहीं है स्वास्थ सुविधा : गड़िया गांव के लोगों को डॉक्टर को दिखाने के लिए भी 12 किलोमीटर दूर उपस्वास्थ केंद्र जाना पड़ता है. बेहतर इलाज के लिए कान्हाचट्टी या फिर चतरा की शरण लेते हैं लोग. कोई गंभीर बीमारी हुई नहीं कि मरना तय है.
 
अभी भी नहीं पढ़ते अधिकतर बच्चे : गांव के अधिकांश लोग अनपढ़ हैं. कक्षा सात के बाद बच्चे पढ़ाई बंद कर देते हैं. कुछ ही लोगों ने अपने बेटों को पढ़ने के लिए गया व चतरा भेजा है.