बस्तर में कानून कहाँ है!!!!!

04-02-2017

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-ज्यां द्रेज

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मानवाधिकार की रक्षा के लिए काम कर रहे लोगों को परेशान करने की हाल की एक घटना में बड़ी बेशर्मी से डा. बेला भाटिया को निशाना बनाया गया. बेला भाटिया एक स्वतंत्र अध्येता हैं और पिछले दो सालों से बस्तर में रहने और शांतिपूर्वक काम करने की कोशिश कर रही हैं. बीते 23 जनवरी कोतकरीबन 30 गुण्डों की उग्र भीड़ ने बेला भाटिया के परपा गांव(जगदलपुर स्थित) स्थित घर पर धावा बोला, घर को जलाने की धमकी दी और कहा कि 24 घंटे के भीतर यहां से निकल जाओ वर्ना अंजाम भुगतने को तैयार रहो. दबाव में आकर बेला भाटिया और उनकी मकान मालकिन को एक बयान में यह लिखकर कि अगले दिन घर छोड़ देंगे, उसपर दस्तखत करने पड़े. इस घटना से तुरंत पहले बेला भाटिया ने बीजापुर के नजदीक सुरक्षा-बलों के हाथों यौन-हिंसा का शिकार हुई महिलाओं की शिकायत की छान-बीन के काम के लिए आई राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की टीम की मदद की थी. पुलिस ने घटना की वीडियो फुटेज मौजूद होने के बावजूद किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की. बेला भाटिया को पहले भी कई बार ऐसे उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है. बीते कुछ महीनों में बस्तर में मानवाधिकार कार्यकर्ता, वकील, पत्रकार तथा अध्येताओं को सताने की ऐसी कई घटनाएं हुई हैं. जगदलपुर लीगल ऐड(जगलग) नाम के समूह को इलाका छोड़ना पड़ा क्योंकि उनके मकान-मालिक पर पुलिस ने ऐसा करने के लिए दबाव डाला था. स्क्रॉल की पत्रकार मालिनी सुब्रमण्यम और बीबीसी के आलोक पुतुल को भी इलाका छोड़ने के लिए मजबूर किया गया और कई स्थानीय पत्रकारों( लिंगराम कोडोपी, संतोष यादव, समरु नाग तथा अन्य) को एक ना एक तरीके से सताया गया है. सोनी सोरी, मनीष कुंजम तथा आम आदमी पार्टी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी(सीपीआई) के अन्य मुखर नेताओं को रोज धमकी मिलती है या उनपर हमले हुए हैं. आंध्रप्रदेश और तेलंगाना के वकील, पत्रकार तथा मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की एक टोली के सदस्यों ने हाल ही में बस्तर का दौरा किया तो उन्हें तुरंत ही छत्तीसगढ़ स्पेशल पब्लिक सिक्युरिटी कानून के तहत गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस ने समाजशास्त्री नंदिनी सुंदर और उनके सहयोगियों के खिलाफ एक बेमानी-मतलब का एफआईआर दर्ज किया है जिसमें इन पर हत्या के आरोप मढ़े गये हैं. बस्तर में मानवाधिकार के उल्लंघन का मुद्दा उठाने वाले लोगों को सताने की हाल में कई और घटनाएं हुई हैं. हमारी जानकारी में ऐसा एक भी मामला नहीं है जिसमें किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई की गई हो. राष्ट्रीय मीडिया की नजर में अगर बस्तर की ऐसी कुछ घटनाएं आ सकी हैं तो इसलिए कि पीड़ित अपनी सुरक्षा करने में सक्षम हैं. इससे कहीं ज्यादा बड़ी तादाद में स्थानीय लोग, मर्द-औरत पुलिस और सुरक्षा बलों के हाथों भारी प्रताड़ना का शिकार हुए हैं,उनके मानवाधिकारों का बरसों से उल्लंघन होता चला आया है. नागरिक अधिकारों तथा मानवाधिकारों की निगरानी और रक्षा के लिए बनाये गए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, राष्ट्रीय महिला आयोग, पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टिज(पीयूसीएल), एमनेस्टी इंटरनेशनल, सुप्रीम कोर्ट सहित अन्य जानी-मानी संस्थाओं ने बस्तर में मानवाधिकारों के हनन की लगातार आलोचना की है. स्वतंत्र अध्येताओं के उत्पीड़न की हालिया घटनाओं में पुलिस और सुरक्षा बलों के अतिरिक्त दबंगई करने वाली निजी जमातों ने भी हिस्सा लिया है. इस बात के सबूत हैं कि इन जमातों को पुलिस का समर्थन हासिल है—पहले सलवा जुडूम(सुप्रीम कोर्ट ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया है), फिर सामाजिक एकता मंच और हाल के समय में तथाकथित एक्शन ग्रुप फॉर नेशनल इंटीग्रेशन(अग्नि) को पुलिस ने शह दिया है. बेला भाटिया पर हुए हमले की वीडियो फुटेज ‘अग्नि’ के एक सदस्य ने सोशल मीडिया पर फैलायी है. बीते अक्तूबर माह में छत्तीसगढ़ सहायक सशस्त्र पुलिस बल( छत्तीसगढ़ अक्जिलियरी आर्म्ड फोर्स) के वर्दीधारियों ने छह मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का खुलेआम पुतला जलाया और उन्हें “राष्ट्रविरोधी” करार दिया. लेकिन, इनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई. धमकाने और दुश्मनी निभाने की इन गतिविधियों का मकसद यही जान पड़ता है कि इलाके में चल रही मनमानी के खिलाफ बोलने वाला कोई ना बचे और पुलिस तथा सुरक्षा बलों को खुली छूट मिल जाय. अपने सख्त तौर-तरीकों के लिए बदनाम पुलिस महकमे के इंस्पेक्टर जनरल एसआरपी कल्लुरी का यह मकसद अब किसी से छुपा नहीं है. इन सब बातों के कारण बस्तर में बड़ी खतरनाक हालत पैदा होने की आशंका है जहां सुरक्षा बल बिना किसी जवाबदेही के अपना डंडा फटकारेंगे और जन-साधारण के पास अपनी रक्षा के लिए कुछ ना बचेगा. देश के नागरिक के रुप में हमलोग इस स्थिति को लेकर बहुत चिन्तित हैं और हमें यह भी लग रहा है कि बस्तर के बाहर भी ऐसी स्थिति बन सकती है. तात्कालिक सुरक्षा के ख्याल से हमारी मांग है कि : 1. बस्तर में कानून का पालन हो. सुरक्षा बल तथा राज्य की अन्य संस्थाएं हमेशा कानून और संविधान के दायरे में रहकर काम करें. 2. सभी अध्येता, कार्यकर्ता, वकील, पत्रकार तथा मानवाधिकारों के उल्लंघन को लेकर चिन्तित अन्य लोगों को इलाके में बिना किसी बाधा के पहुंचने-रहने दिया जाय. 3. जोर-जबर्दस्ती और दबंगई पर उतारु कानून और मानवाधिकार का सम्मान ना करने वाले किसी भी समूह को राज्य की ओर से समर्थन ना दिया जाय. 4. उत्पीड़न और मानवाधिकार के उल्लंघन की हाल की घटनाओं के जिम्मेदार लोगों पर जल्द और कड़ी कार्रवाई हो. शांतिपूर्वक रह रहे लोगों और आगन्तुकों पर हिंसा हर हाल में बंद होनी चाहिए चाहे वह राजकीय तंत्र के जरिए हो रही हो या राज्य की शह पाकर दबंगई करने वाली जमातों या फिर माओवादी कैडरों के हाथों. और, इलाके में चल रहे हथियारबंद झगड़े को खत्म करने के लिए बातचीत तुरंत शुरु की जानी चाहिए